श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ६५७ नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥ [ क्योंकि न केवल इसी श्लोकमें, वरन् फिर पाँचवें अध्यायके आरंभमें और अन्यत्रभी, यह स्पष्ट कह दिया गया है, कि संन्यास-मार्गसेभी कर्मयोग अधिक योग्यताका या श्रेष्ठ है (गीतार. प्र. ११, पृ. ३०९-३१०) । इस प्रकार जब कर्मयोगही श्रेष्ठ है, तब अर्जुनको उसी मार्गका आचरण करनेके लिये अब उपदेश करते हैं :- ] (८) (अपने धर्मके अनुसार) नियत अर्थात् नियमित कर्म तू कर । क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना कहीं अधिक अच्छा है। इसके अतिरिक्त (यह समझ ले, कि यदि) तू कर्म न करेगा, तो (भोजनभी न मिलनेसे) तेरा शरीर- निर्वाहतक न हो सकेगा। [ 'अतिरिक्त' और 'तक' (अपि च) पदोंसे शरीरयात्राको कम-से-कम हेतु कहा है। अब यह बतलानेके लिये यज्ञ-प्रकरणका आरंभ किया जाता है, कि 'नियत' अर्थात् नियत किया हुआ 'कर्म' कौन-सा है? और दूसरे किस महत्त्वके कारण उसका आचरण करना चाहिये? आजकल यज्ञयाग आदि श्रौतधर्म लुप्त-सा हो गया है, इसलिये इस विषयका आधुनिक पाठकोंको कोई विशेष महत्व मालूम नहीं होता। परंतु गीताके समयमें इन यज्ञयागोंका पूरा पूरा प्रचार था; और 'कर्म' शब्दसे मुख्यतः इन्हींका बोध हुआ करता था। अतएव, गीताधर्ममें इस बातका विवेचन करना अत्यावश्यक था, कि ये धर्मकृत्य किये जावें या नहीं; और यदि किये जावें, तो किस प्रकार? इसके सिवा, यहभी स्मरण रहे, कि यज्ञ शब्दका अर्थ केवल ज्योतिष्टोम आदि श्रौतयज्ञ या अग्निमें किसीभी वस्तुका हवन करनाही नहीं है (गीता. ४. ३२) । सृष्टिका निर्माण करके, उसका काम ठीक ठीक चलते रहनेके लिये, अर्थात् लोकसंग्रहार्थ, ब्रह्माने प्रजाको चातुर्वर्ण्यविहित जो जो काम बाँट दिये हैं, उन सबका 'यज्ञ' शब्दमें समावेश होता है (मभा. अनु. ४८. ३; गीतार. प्र. १०, पृ. २९१- २९७) । धर्मशास्त्रोंमें इन्हीं कर्मोंका उल्लेख है; और यहाँ 'नियत' शब्दसे वेही विवक्षित हैं। इसलिये कहना चाहिये, कि यद्यपि आजकल श्रौत यज्ञ-याग लुप्तप्राय हो गये हैं; तथापि यज्ञ-चक्रका यह विवेचन अबभी निरर्थक नही है। शास्त्रोंके अनुसार ये सब कर्म काम्य हैं, अर्थात् इसलिये बतलाये गये हैं, कि मनुष्यका इस जगत्में कल्याण हो और उसे सुख मिले। परंतु पीछे दूसरे अध्याय (गीता २. ४१-४४) में यह सिद्धान्त किया है, कि मीमांसकोंके ये सहेतुक या काम्यकर्म मोक्षके लिये प्रतिबंधक हैं, अतएव वे नीचे दर्जेके हैं; और गी. र. ४२