श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 701, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें६५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥ यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥ | होती हैं :- ( १ ) नैष्कर्म्य कर्मशून्यता नहीं है, ( २ ) कर्मोंको त्याग देनेका | कोई कितनाभी प्रयत्न क्यों न करे, परंतु वे छूट नहीं सकते; और ( ३ ) | कर्मोंको त्याग देना सिद्धि प्राप्त करनेका उपाय नहीं है; और यही बातें | ऊपरके श्लोकोंमें बतलाई गई हैं। जब ये तीनों बातें सिद्ध हो गई, तब अठारहवें | अध्यायके कथनानुसार 'नैष्कर्म्यसिद्धि'की ( गीता १८. ४८, ४९ ) प्राप्तिके लिये | यही एक मार्ग शेष रह जाता है, कि कर्म तो छोड़े नहीं; पर ज्ञान-द्वारा | यद्यपि आसक्तिका क्षय करके सब कर्म सदा करते रहें । क्योंकि ज्ञान मोक्षका | साधन हो, तोभी कर्मशून्य रहनाभी कभी संभव नहीं, इसलिये कर्मोंके | बंधकत्वको ( बंधन ) नष्ट करनेके लिये आसक्ति छोड़कर उन्हें करना | आवश्यक होता है। इसीको कर्मयोग कहते हैं; और अब बतलाते हैं, कि | यही ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक मार्ग विशेष योग्यताका अर्थात् श्रेष्ठ है - ] ( ६ ) जो मूढ ( हाथ-पैर आदि ) कर्मेन्द्रियोंको रोककर मनसे इंद्रियोंके विषयोंका चिंतन किया करता है, उसे मिथ्याचारी अर्थात् दांभिक कहते हैं। ( ७ ) परंतु हे अर्जुन ! जो मनसे इंद्रियोंका आंकलन करके, ( केवल ) कर्मेन्द्रियों-द्वारा अनासक्त- बुद्धिसे 'कर्मयोग'का आरंभ करता है, उसकी योग्यता विशेष अर्थात् श्रेष्ठ है । | [ पिछले अध्यायमें जो यह बतलाया गया है, कि कर्मयोगमें कर्मकी | अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है ( गीता २. ४९ ), उसीका इन दोनों श्लोकोंमें स्पष्टी- | करण किया गया है । यहाँ साफ़ साफ़ कह दिया है, कि जिस मनुष्यका मन | तो शुद्ध नहीं है; पर जो केवल दूसरोंके भयसे या इस अभिलाषासे कि दूसरे | मुझे भला कहें, केवल बाह्येंद्रियोंके व्यापारको रोकता है, वह सच्चा सदाचारी | नहीं है, वह ढोंगी है। जो लोग इस वचनका प्रमाण देकर - कि “ कलौ कर्ता च | लिप्यते ” कलियुगमें दोष बुद्धिमें नहीं, किंतु कर्ममें रहता है, यह प्रतिपादन | किया करते हैं, कि बुद्धि चाहे जैसी हो; परंतु कर्म बुरा न हो; उन्हें उक्त | श्लोकमें वर्णित गीतातत्त्वपर विशेष ध्यान देना चाहिये । सातवें श्लोकसे यह | बात प्रकट होती है, कि निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेके योगकोही गीतामें 'कर्मयोग' | कहा है । कुछ संन्यास-मार्गीय टीकाकार इस श्लोकका ऐसा अर्थ करते हैं, कि | यद्यपि यह कर्मयोग छठे श्लोकमें बतलाये हुए दांभिक मार्गसे श्रेष्ठ है, तथापि | यह संन्यास-मार्गसे श्रेष्ठ नहीं है । परंतु यह युक्ति सांप्रदायिक आग्रहकी है ।