भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 733, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 733

६८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥ दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥ | विरहित करनेवाला पुरुष कर्मके 'समग्र' फलसे मुक्त होता हुआ अंतमें मोक्ष | पाता है (गीतार. प्र. ११, पृ. ३४६-३५०)। ब्रह्मार्पणरूपी इस बड़े यज्ञकाही | वर्णन अगले श्लोकमें पहले किया गया है; और फिर उसकी अपेक्षा कम | योग्यताके अनेक लाक्षणिक यज्ञोंका स्वरूप बतलाया गया है; एवं तेंतीसवें | श्लोकमें समग्र प्रकरणका उपसंहार कर कहा गया है, कि ऐसा "ज्ञानयज्ञही | सबमें श्रेष्ठ है," ] (२४) अर्पण अर्थात् हवन करनेकी क्रिया ब्रह्म है, हवि अर्थात् अर्पण करनेका द्रव्य ब्रह्म है, ब्रह्माग्निमें ब्रह्मने हवन किया है - (इस प्रकार) जिसकी बुद्धिमें (सभी) कर्म ब्रह्ममय, हैं, उसको ब्रह्मही मिलता है। | [शांकरभाष्यमे 'अर्पण' शब्दका अर्थ "अर्पण करनेका साधन अर्थात् | आचमनी इत्यादि" है; परंतु यह जरा कठिन है। इसकी अपेक्षा, अर्पण = | अर्पण करनेकी या हवन करनेकी क्रिया, यह अर्थ अधिक सरल है। यह | ब्रह्मार्पणपूर्वक अर्थात् निष्कामबुद्धिसे यज्ञ करनेवालोंका वर्णन हुआ। अब देव- | ताके उद्देश्यसे अर्थात् काम्य-बुद्धिसे किये हुए यज्ञका स्वरूप बतलाते हैं:- ] (२५) कोई कोई (कर्म)-योगी (ब्रह्मबुद्धिके बदले) देवता आदिके उद्देश्यसे यज्ञ किया करते हैं; और कोई ब्रह्माग्निमें यज्ञसेही यज्ञका यजन करते हैं। | [पुरुषसूक्तमें विराट्रूपी यज्ञपुरुषके देवताओं द्वारा, यजन होनेका जो | वर्णन है - "यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः ।" (ऋ. १०. ९०. १६), उसीको लक्ष्य- | कर इस श्लोकका उत्तरार्ध कहा गया है 'यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति' ये पद ऋग्वेदके | 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त' के समानार्थकही दीख पड़ते हैं। प्रकट है, कि इस यज्ञमे, | जो सृष्टिके आरंभमें हुआ था, जिस विराट्रूपी पशुका हवन किया गया था, वह | पशु, और जिस देवताका यजन किया गया था, वह देवता, ये दोनों ब्रह्मस्वरूपीही | होंगे। सारांश, चौबीसवें श्लोकका यह वर्णनही तत्त्वदृष्टिसे ठीक है, कि सृष्टिके | सब पदार्थोंमें सदैवही ब्रह्म भरा हुआ है, इस कारण इच्छारहित बुद्धिसे सब | व्यवहार करते करते ब्रह्मसेही ब्रह्मका सदा यजन होता रहता है; केवल बुद्धि | वैसी होनी चाहिये। पुरुषसूक्तको लक्ष्य कर गीतामे वही एक श्लोक नहीं है; | प्रत्युत आगे दसवें अध्यायमेंभी (१०. ४२) इस सूक्तके अनुसार वर्णन है। | देवताके उद्देश्यसे किये हुए यज्ञका वर्णन हो चुका; अब अग्नि, हवि इत्यादि