भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 734

चौथा अध्याय ६८९ श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥ सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥ । शब्दोंके लाक्षणिक अर्थ लेकर बतलाते हैं, कि प्राणायाम आदि पातंजलयोगकी । क्रियाएँ अथवा तपश्चरणभी एक प्रकारका यज्ञ होता है :— ] (२६) और कोई श्रोत्र आदि ( कान, आँख आदि ) इंद्रियोंका संयमरूप अग्निमें होम करते हैं; और कुछ लोग इंद्रियरूप अग्निमें ( इंद्रियोंके ) शब्द आदि विषयोंका हवन करते हैं । (२७) और कुछ लोग इंद्रियों तथा प्राणोंके सब कर्मोंको अर्थात् व्यापारोंको ज्ञानसे प्रज्वलित आत्मसंयमरूपी योगकी अग्निमें हवन किया करते हैं । । [ इन श्लोकोंमें दो-तीन प्रकारके लाक्षणिक यज्ञोंका वर्णन है । जैसे । (१) इंद्रियोंका संयमन करना अर्थात् उनको योग्य मर्यादाके भीतर अपने अपने । व्यवहार करने देना; (२) इंद्रियोंके विषय अर्थात् उपभोगके पदार्थ सर्वथा । छोड़कर, इंद्रियोंको बिलकुल मार डालना; (३) न केवल इंद्रियोंके व्यापारोंको, । प्रत्युत प्राणोंकेभी व्यापारोंको बंद कर, अर्थात् पूरी समाधि लगा करके, केवल । आत्मानंदमेंही मग्न रहना । अब इन्हें यज्ञकी उपमा दी जाय, तो पहले प्रकारमें । इंद्रियोंको मर्यादित करनेकी क्रिया ( संयमन ) अग्नि हुई, क्योंकि दृष्टान्तसे । यह कहा जा सकता है, कि इस मर्यादाके भीतर जो कुछ आ जाय, उसका । उसमें हवन हो गया । इसी प्रकार दूसरेमें साक्षात् इंद्रियाँ और तीसरे प्रकारमें । इंद्रियाँ एवं प्राण मिलकर दोनों होम करनेके द्रव्य हो जाते हैं और आत्मसंयम । अग्नि है; इसके अतिरिक्त कुछ लोग ऐसे हैं, जो निरा प्राणायामही किया करते । हैं; उनका वर्णन उनतीसवें श्लोकमें हैं। 'यज्ञ' शब्दके मूल अर्थ द्रव्यात्मक यज्ञको । लक्षणासे विस्तृत और व्यापक कर तप, संन्यास, समाधि एवं प्राणायाम प्रभृति । भगवत्प्राप्तिके सब प्रकारके साधनोंका एक 'यज्ञ' शीर्षकमेंही समावेश कर । देनेकी भगवद्गीताकी यह कल्पना कुछ अपूर्व नहीं है । मनुस्मृतिके चौथे अध्यायमें । गृहस्थाश्रमके वर्णनके सिलसिलेमें पहले यह बतलाया गया है, कि ऋषियज्ञ, । देवयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और पितृयज्ञ – इन स्मार्त पंचमहायज्ञोंको कोई । गृहस्थ न छोड़े; और फिर कहा है, कि इनके बदले कोई कोई " इंद्रियोंमें वाणीका । हवनकर, अथवा वाणीमें प्राणका हवन करके या अंतमे ज्ञानयज्ञमेभी परमेश्वरका । यजन करते हैं" ( मनु. ४. २१–२४ ) । इतिहासकी दृष्टिसे देखें, तो विदित । होता है, कि इंद्र-वरुण प्रभृति देवताओंके उद्देश्यसे जो द्रव्यमय यज्ञ श्रौत ग्रंथोंमे । कहे गये हैं, उनका प्रचार धीरे धीरे घटता गया; और जब पातंजलयोगसे, गी. र. ४४