भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 735

६९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥ अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥ संन्याससे अथवा आध्यात्मिक ज्ञानसे परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेनेके मार्ग अधिका- धिक प्रचलित होने लगे, तब 'यज्ञ' शब्दका अर्थ विस्तृतकर उसीमें मोक्षके समग्र उपायोंका लक्षणासे समावेश करनेका आरंभ हुआ होगा। इसका मर्म यही है, कि पहले जो शब्द धर्मकी दृष्टिसे प्रचलित हो गये थे, उन्हीका उपयोग अगले धर्ममार्गके लियेभी किया जावे। कुछभी हो; मनुस्मृतिके विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है, कि गीताके पहले या कम-से-कम उस कालमें तो उक्त कल्पना सर्वमान्य हो चुकी थी।] (२८) इस प्रकार तीक्ष्ण व्रतका आचरण करनेवाले यति अर्थात् संयमी पुरुष कोई द्रव्यरूप, कोई तपरूप, कोई योगरूप, कोई स्वाध्याय अर्थात् नित्य स्वकर्मानुष्ठानरूप, और कोई ज्ञानरूप यज्ञ किया करते हैं। (२९) प्राणायाममें तत्पर होकर प्राण और अपानकी गतिको रोक करके, कोई प्राणवायुका अपानमें (हवन किया करते हैं) और कोई अपानवायुका प्राणमें हवन किया करते हैं। [इस श्लोकका तात्पर्य यह है, कि पातंजलयोगके अनुसार प्राणायाम करनाभी एक यज्ञही है। यह पातंजलयोगरूप यज्ञ उनतीसवें श्लोकमें बतलाया गया है, अतः अठ्ठाईसवें श्लोकके 'योगरूप यज्ञ' पदका अर्थ कर्मयोगरूपी यज्ञ करना चाहिये। प्राणायाम शब्दके 'प्राण' शब्दसे श्वास और उच्छ्वास, दोनों क्रियाएँ प्रकट होती हैं; परंतु जब प्राण और अपानका भेद करना होता है, तब प्राण = बाहर जानेवाला अर्थात् उच्छ्वास वायु, और अपान = भीतर आनेवाला श्वास, यह अर्थ किया जाता है (वे. सू. शां. भा. २. ४. १२; छांदोग्य. शां. भा. १. ३. ३)। ध्यान रहे, कि प्राण और अपानके ये अर्थ प्रचलित अर्थोंसे भिन्न हैं। इस अर्थमेंसे अपानमें अर्थात् भीतर खींचे हुए श्वासमें प्राणका - उच्छ्वासका - होम करनेसे पूरक नामका प्राणायाम होता है; और इसके विपरीत प्राणमें अपानका होम करनेसे रेचक प्राणायाम होता है। प्राण और अपान, इन दोनोंकेही निरोधसे वही प्राणायाम कुम्भक हो जाता है। अब इनके सिवा व्यान, उदान और समान ये तीन वायु बचे रहे। इनमेंसे व्यान, प्राण और अपानके संधिस्थलोंमें रहता है, धनुष्य खींचने, वजन उठाने आदि दम रोककर या आधे श्वासका दमन करके शक्तिके काम करते समय व्यक्त होता है (छां. १. ३. ५)। मरणसमयमें निकल जानेवाले वायुको उदान