भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 736

चौथा अध्याय ६९१ अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥ यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥ । कहते हैं ( प्रश्न ३.७), और शरीरके सब स्थानोंपर एक-सा अन्नरस पहुँचाने- । वाले वायुको समान कहते हैं (प्रश्न. ३.५) – इस प्रकार वेदान्त- । शास्त्रमें इन शब्दोंके सामान्य अर्थ दिये गये हैं। परंतु कुछ स्थलोंपर इनसे । निराले अर्थ अभिप्रेत होते हैं; उदाहरणार्थ, महाभारतके वनपर्वके २१२ वें । अध्यायमें प्राण आदि वायुओंके निरालेही लक्षण दिये गये हैं और उसमें कहा । है, कि प्राण मस्तकका वायु है और अपान नीचे सरकनेवाला वायु है (प्रश्न. । ३.५ मैत्र्यु. २.६ ) । ऊपरके श्लोकमें जो वर्णन है, उसका यह अर्थ है, कि । इनमेंसे जिस वायुका निरोध करते हैं, उसका अन्य वायुओमें होम होता है । ] (३०-३१) और कुछ लोग आहारको नियमित कर प्राणोंकाही प्राणोंमें होम किया करते हैं। ये सभी लोग सनातन ब्रह्ममें जा मिलते हैं, कि जो यज्ञके जाननेवाले हैं, जिनके पाप यज्ञसे क्षीण हो गये हैं, (और जो) अमृतका अर्थात् यज्ञसे बचे हुएका उपभोग करनेवाले हैं। यज्ञ न करनेवालेको (जब) इस लोगमें सफलता नहीं होती। (तब) फिर हे कुरुश्रेष्ठ ! (उसे) परलोक कहांसे (मिलेगा) ? । [सारांश, यज्ञ करना यद्यपि वेदकी आज्ञाके अनुसार मनुष्यका कर्तव्य । है, तोभी यह यज्ञ एकही प्रकारका नहीं होता। प्राणायाम करो, तप करो, । वेदका अध्ययन करो, अग्निष्टोम करो, पशुयज्ञ करो, तिल-चावल अथवा घीका । हवन करो, पूजापाठ करो या नैवेद्य-वैश्वदेव आदि पाँच गृहयज्ञ करो; फला- । सक्तिके छूट जानेपर ये सब व्यापक अर्थमें यज्ञही हैं और फिर यज्ञशेष- । भक्षणके विषयमें मीमांसकोंके जो सिद्धान्त हैं, वे सब इनमेंसे प्रत्येक यज्ञके । लिये उपयुक्त हो जाते हैं। इनमेंसे पहला नियम यह है, कि "यज्ञके अर्थ किया । हुआ कर्म बंधक नहीं होता", और इसका वर्णन तेईसवें श्लोकमें हो चुका है । (गीता ३. ९ पर टिप्पणी देखो) । अब दूसरा नियम यह है, कि प्रत्येक । गृहस्थ पंचमहायज्ञ कर अतिथि आदिके भोजन कर चुकनेपर फिर अपनी पत्नी- । सहित भोजन करे; और इस प्रकार बर्तनेसे गृहस्थाश्रम सफल होकर सद्गति । देता है। "विघसं भुक्तशेषं तु यज्ञशेषमथामृतम्” (मनु. ३. २८५) – । अतिथि वगैरहके भोजन कर चुकनेपर जो बचे, उसे 'विघस' और यज्ञ करनेसे । जो शेष रहे, उसे 'अमृत' कहते हैं; इस प्रकार व्याख्या करके मनुस्मृति और । अन्य स्मृतियोंमेंभी कहा है, कि प्रत्येक गृहस्थको नित्य विघसाशी और अमृताशी । होना चाहिये (गीता ३. १३; गीतारहस्य प्र. १०, पृ. २९४) । अब भगवान्