भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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६९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥ | कहते हैं कि सामान्य गृहयज्ञको उपयुक्त होनेवाला यह सिद्धान्तही सब प्रकारके , | उक्त यज्ञोंको उपयोगी होता है। यज्ञके अर्थ किया हुआ कोईभी कर्म बंधक नहीं | होता, यही नहीं, बल्कि उन कर्मोंमेंसे अवशिष्ट काम यदि अपने निजी उपयोगमें | आ जावें, तोभी वे बंधक नहीं होते ( गीतार. प्र. १२, पृ. ३८६ ) । “ बिना | यज्ञके इहलोकभी सिद्ध नहीं होता ” यह अंतिम वाक्य मार्मिक और महत्त्वका | है। उसका अर्थ इतनाही नहीं है, कि यज्ञके बिना पानी नहीं बरसता; और | पानीके न बरसनेसे इस लोककी गुजर नहीं होती; किंतु 'यज्ञ' शब्दका | व्यापक अर्थ लेकर, इस सामाजिक तत्त्वकाभी उसमें पर्यायसे समावेश हुआ है, | कि अपनी कुछ प्यारी बातोंको छोड़े बिना न तो सबको एक-सी सुविधा मिल | सकती है; और न जगतके व्यवहारभी चल सकते हैं। उदाहरणार्थ, पश्चिमी | समाजशास्त्रप्रणेता जो यह सिद्धान्त बतलाते हैं, कि हरएकके अपनी स्वतंत्रताको | परिमित किये बिना औरोंको एक-सी स्वतंत्रता नही मिल सकती है, वही इस | तत्त्वका उदाहरण है; और, यदि गीताकी परिभाषामें इसी अर्थको कहना हो, | तो इस स्थलपर ऐसी यज्ञप्रधान भाषाकाही प्रयोग करना पड़ेगा, कि “ जबतक | प्रत्येक मनुष्य अपनी स्वतंत्रताके कुछ अंशकाभी यज्ञ न करे, तबतक इस लोकके | व्यवहार चल नहीं सकते । ” इस प्रकारके व्यापक और विस्तृत अर्थसे जब यह | निश्चय हो चुका, कि यज्ञही सारी समाजरचनाका आधार है, तब कहना नहीं | होगा, कि केवल कर्तव्यकी दृष्टिसे उक्त 'यज्ञ' करना जबतक प्रत्येक मनुष्य न | सीखेगा, तबतक समाजकी व्यवस्था ठीक न रहेगी । ] ( ३२ ) इस प्रकार भाँति भाँतिके यज्ञ ब्रह्मके ( ही ) मुखमें जारी हैं। यह जान, कि वे सब कर्मसे निष्पन्न होते हैं। यह ज्ञान हो जानेसे तू मुक्त हो जायगा । | [ ज्योतिष्टोम आदि द्रव्यमय श्रौतयज्ञ अग्निमें हवन करके किये जाते | हैं और शास्त्रमें कहा है, कि देवताओंका मुख अग्नि है, इस कारण ये यज्ञ उन | देवताओंको मिल जाते हैं। परंतु यदि कोई शंका करे, कि देवताओंके मुख - | अग्नि - में उक्त लाक्षणिक यज्ञ नहीं होते, अतः लाक्षणिक यज्ञोंसे श्रेयःप्राप्ति | होगी कैसे, तो उसे दूर करनेके लिये, कहा है, कि अब ये यज्ञ साक्षात् ब्रह्मकेही | मुखमें होती हैं। दूसरे चरणका भावार्थ यह है, कि जिस पुरुषने यज्ञविधिके इस | व्यापक स्वरूपको - केवल मीमांसकोंके संकुचित अर्थकोही नहीं - जान लिया, | उसकी बुद्धि संकुचित नही रहती, किंतु वह ब्रह्मके स्वरूपको पहचाननेका अधि- | कारी हो जाता है। अब बतलाते हैं, कि इन सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ यज्ञ कौन है :- ]