श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ६९३ श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥ § § तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥३४ ॥ यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥ ( ३३ ) हे परंतप ! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ है। क्योकि, हे पार्थ ! सब प्रकारके समस्त कर्मोंका पर्यवसान ज्ञानमें होता है। | [ 'ज्ञानयज्ञ' शब्द आगेभी दो बार गीतामें आया है ( गीता ९. १५; | १८. ७० ) । हम जो द्रव्यमय यज्ञ करते हैं, वह परमेश्वरकी प्राप्तिके लिये | किया करते हैं। परंतु परमेश्वरकी प्राप्ति, उसके स्वरूपका ज्ञान हुए बिना नहीं | होती। अतएव परमेश्वरके स्वरूपका ज्ञान प्राप्तकर, उस ज्ञानके अनुसार | आचरण करके परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेनेके मार्ग या साधनको 'ज्ञानयज्ञ' | कहते हैं। यह यज्ञ मानस और बुद्धिसाध्य है, अतः द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा | इसकी योग्यता अधिक समझी जाती है। मोक्षशास्त्रमें ज्ञानयज्ञका यह ज्ञानही | मुख्य है, और इसी ज्ञानसे सब कर्मोंका क्षय हो जाता है, कुछभी हो; गीताका | यह स्थिर सिद्धान्त है, कि अंतमें परमेश्वरका ज्ञान होना चाहिये, बिना ज्ञानके | मोक्ष नहीं मिलता। तथापि "कर्मका पर्यवसान ज्ञानमें होता है" इस वचनका | यह अर्थ नहीं है, कि ज्ञानके पश्चात् कर्मोंको छोड़ देना चाहिये - यह बात | गीतारहस्यके दसवें और ग्यारहवें प्रकरणमें विस्तारपूर्वक प्रतिपादन की गई | है। अपने लिये नहीं, तो लोकसंग्रहके निमित्त कर्तव्य समझकर सभी कर्म | करनेही चाहिये; और जब कि वे ज्ञान एवं समबुद्धिसे किये जाते हैं, तब उनके | पापपुण्यकी बाधा कर्ताको नहीं होती (आगे ३७ वाँ श्लोक देखो) और यह | ज्ञानयज्ञ मोक्षप्रद होता है। अतः गीताका सब लोगोंको यही उपदेश है, कि यज्ञ | करो, किंतु ज्ञानपूर्वक निष्काम बुद्धिसे करो । ] ( ३४ ) ध्यानमें रख, कि प्रणिपातसे, प्रश्न करनेसे और सेवा करनेसे तत्त्ववेत्ता ज्ञानी पुरुष तुझे उस ज्ञानका उपदेश करेंगे; ( ३५ ) जिस ज्ञानको पाकर, हे पांडव ! फिर तुझे ऐसा मोह नहीं होगा, और जिस ज्ञानके योगसे समस्त प्राणियोंको तू अपनेमें और मुझमें भी देखेगा । | [ सब प्राणियोंको अपनेमें और अपनेको सब प्राणियोंमें देखनेका, समस्त | प्राणिमात्रमें आत्माकी एकताका आगे जो जो ज्ञान, वर्णित है ( गीता ६. २९ ),