भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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६९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥ यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥ §§ न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥ श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥ | उसीका यहाँ उल्लेख किया गया है । मूलमें आत्मा और भगवान्, दोनों एकरूप | हैं, अतएव आत्मामें सब प्राणियोंका समावेश होता है, अर्थात् भगवान्‌मेंभी | उनका समावेश होकर, आगे आत्मा (मैं), अन्य प्राणी और भगवान् यह | त्रिविध भेद नष्ट हो जाता है । इसीलिये भागवत पुराणमें भगवद्भक्तोंका | लक्षण देते हुए कहा है, कि " सब प्राणियोंको भगवान्में और अपनेमें जो देखता | है, उसे उत्तम भागवत कहना चाहिये " ( भाग. ११. २. ४५ ) । इस महत्त्वके | नीतितत्त्वका अधिक स्पष्टीकरण गीतारहस्यके बारहवें प्रकरणमें ( पृ. ३९१- | ३९९) और भक्ति-दृष्टिसे तेरहवें प्रकरणमें (पृ. ४३०-४३१) किया गया है । ] ( ३६ ) सब पापियोंसे यदि अधिक पाप करनेवाला हो, तोभी ( इस ) ज्ञान- नौकासेही तू सब पापोंको पारकर जावेगा । (३७) जिस प्रकार प्रज्वलित की हुई अग्नि (सब) ईंधनको भस्म कर डालती है, उसी प्रकार हे अर्जुन ! (यह) ज्ञानरूप अग्नि सब कर्मोंको ( शुभ-अशुभ बंधनोंको ) जला डालती है । | [ज्ञानकी महत्ता बतला दी । अब बतलाते हैं, कि इस ज्ञानकी प्राप्ति | किन उपायोंसे होती है :-] (३८) इस लोकमें ज्ञानके समान पवित्र सचमुचही और कुछभी नहीं है । काल पाकर जिसको योग अर्थात् कर्मयोग सिद्ध हो गया है वह पुरुष आप-ही उस ज्ञानको अपनेमें प्राप्त कर लेता है । | [३७ वें श्लोकमें 'कर्मों'का अर्थ 'कर्मका बंधन' है ( गीता ४. १९ | देखो)। अपनी बुद्धिसे आरंभ किये हुए निष्काम कर्मोंके द्वारा ज्ञानकी प्राप्ति | कर लेना, ज्ञानकी प्राप्तिका मुख्य या बुद्धिगम्य मार्ग है । परंतु जो स्वयं इस | प्रकार अपनी बुद्धिसे ज्ञानको प्राप्त न कर सके, उसके लिये अब श्रद्धाका दूसरा | मार्ग बतलाते हैं :- ] (३९) जो श्रद्धावान् पुरुष इंद्रियसंयम करके उसीके पीछे पड़ा रहे, उसे (भी) यह