भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 740

चौथा अध्याय ६९५ अज्ञाश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥ § § योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥ ४१ ॥ तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ ज्ञान मिल जाता है; और ज्ञान प्राप्त हो जानेसे तुरंतही उसे परम शांति प्राप्त होती है । । [ सारांश, बुद्धिसे जो ज्ञान और शांति प्राप्त होगी, वही श्रद्धासेभी । मिलती है ( गीता १३. २५ ) । परंतु जिसके अपनी बुद्धि नहीं और श्रद्धाभी । नहीं, वह :- ] (४०) परंतु जिसे न स्वयं ज्ञान है और न श्रद्धाभी है, उस संशयग्रस्त मनुष्यका नाश हो जाता है । संशयग्रस्तको न यह लोक है (और) न परलोक, एवं सुखभी नहीं है । । [ ज्ञानप्राप्तिके ये दो मार्ग बतला चुके; एक अपनी बुद्धिका और दूसरा । श्रद्धाका । अब ज्ञान और कर्मयोगका पृथक् उपयोग दिखलाकर समस्त विषयका । उपसंहार करते हैं :- ] (४१) हे धनंजय ! उस आत्मज्ञानी पुरुषको कर्म बद्ध नहीं कर सकते, कि जिसने ( कर्म-) योगके आश्रयसे कर्म अर्थात् कर्मबंधन त्याग दिये हैं, और ज्ञानसे जिसके (सब) संदेह दूर हो गये हैं । (४२) इसलिये अपने हृदयमें अज्ञानसे उत्पन्न हुए इस संशयको ज्ञानरूप तलवारसे काटकर, ( कर्म-) योगका आश्रय कर । (और) हे भारत ! ( युद्धके लिये ) खड़ा हो ! । [ ईशावास्य उपनिषदमें 'विद्या' और 'अविद्या' का पृथक् उपयोग दिखला । कर जिस प्रकार दोनोंको बिना छोड़ेही आचरण करनेके लिये कहा गया है । ( ईश. ११; गीतार. प्र. ११, पृ. ३५७ ) ; उसी प्रकार गीताके इन दो श्लोकोंमें । ज्ञान और (कर्म-) योगका पृथक् उपयोग दिखलाकर उनके अर्थात् ज्ञान और । योगके समुच्चयसेही कर्म करनेके विषयमें अर्जुनको उपदेश दिया गया है । इन । दोनोंका पृथक् पृथक् उपयोग यह है, कि निष्काम बुद्धियोगके द्वारा कर्म करनेपर