श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
| उनके बंधन टूट जाते हैं; और वे मोक्षके लिये प्रतिबंधक नहीं होते; एवं ज्ञानसे | मनके संदेह दूर होकर मोक्ष मिलता है। अतः अंतिम उपदेश यह है, कि अकेले | कर्म या अकेले ज्ञानको स्वीकार न कर; किंतु ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक कर्मयोगका | आश्रय करके युद्ध कर। योगका आश्रय करके युद्धके लिये खड़ा रहना था, | इस कारण गीतारहस्यके प्र. ३, पृ. ५६ में दिखलाया गया है, कि योग शब्दका | अर्थ यहाँ 'कर्मयोग' ही लेना चाहिये। ज्ञान और योगका यह मेलही 'ज्ञानयोग- | व्यवस्थितिः' पदसे आगे दैवी संपत्तिके लक्षणमें ( गीता १६. १ ) फिर | बतलाया गया है। ] इस प्रकार श्रीभगवान्के गाये हुए-अर्थात् कहे हुए-उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग-अर्थात् कर्मयोग-शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग नामक चौथा अध्याय समाप्त हुआ। | [ध्यान रहे, कि 'ज्ञान-कर्म-संन्यास' पदमें 'संन्यास' शब्दका अर्थ स्वरूपतः | 'कर्मत्याग' नहीं है, किंतु निष्काम बुद्धिसे परमेश्वरमें कर्मका संन्यास अर्थात् | 'अर्पण करना' अर्थ है; और आगे अठारहवें अध्यायके आरंभमें उसीका | स्पष्टीकरण किया गया है।]