श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 742, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय ६९७ पंचमोऽध्यायः । अर्जुन उवाच । संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । तच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच । संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ : तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥ पाँचवाँ अध्याय [ चौथे अध्यायके सिद्धान्तपर संन्यास-मार्गवालोंकी जो शंका हो सकती है, उसेही अर्जुनके मुखसे, प्रश्नरूपसे कहलाकर, इस अध्यायमें, भगवानने उसका स्पष्ट उत्तर दिया है । यदि समस्त कर्मोंका पर्यवसान ज्ञान है (गी. ४. ३३), यदि ज्ञानसेही संपूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं (४. ३७) ; और यदि द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञही श्रेष्ठ है (४. ३३) ; तो दूसरेही अध्यायमें यह कहकर, कि “धर्म्य युद्ध करनाही क्षत्रियको श्रेयस्कर है” (गी. २. २१), चौथे अध्यायके उपसंहारमें यह बात क्यों कही गई है, कि “अतएव तू कर्मयोगका आश्रय कर, युद्धके लिये उठ खड़ा हो” (गी. ४. ४२) ? इस प्रश्नका गीता यह उत्तर देती हैं, कि समस्त संदेहोंको दूरकर मोक्षप्राप्तिके लिये ज्ञानकी आवश्यकता है, और यदि मोक्षके लिये कर्म आवश्यक न हों, तोभी कभी न छूटनेके कारण वे लोकसंग्रहार्थ आवश्यक है; इस प्रकार ज्ञान और कर्म, दोनोंकेही समुच्चयकी नित्य अपेक्षा है (४. ४१) । परंतु इसपरभी शंका होती है, कि यदि कर्मयोग और सांख्य, दोनों मार्ग शास्त्रमें विहित हैं, तो उनमेंसे अपनी इच्छाके अनुसार सांख्यमार्गको स्वीकारकर कर्मोंका त्याग करनेमें हानि क्या है ? अर्थात् इसकाभी पूरा निर्णय हो जाना चाहिये, कि इन दोनों मार्गोंमें श्रेष्ठ कौन-सा है; और अर्जुनके मनमें यही शंका हुई है । उसने तीसरे अध्यायके आरंभमें जैसा प्रश्न किया था, वैसा ही अबभी वह पूछता है, कि :-] (१) अर्जुनने कहा :- हे कृष्ण ! (तुम) एक बार संन्यासको और दूसरी बार कर्मोंके योगको (अर्थात् कर्म करते रहनेके मार्गकोही) उत्तम बतलाते हो; अब निश्चय कर मुझे एकही (मार्ग) बतलाओ, कि जो इन दोनोंमें सचमुचही श्रेष्ठ अर्थात् अधिक प्रशस्त हो । (२) श्रीभगवानने कहा :- कर्म-संन्यास और कर्मयोग, (दोनों निष्ठाएँ या मार्ग) निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्ष प्राप्त करा देनेवाले