श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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हैं; परंतु ( अर्थात् मोक्षकी दृष्टिसे दोनोंकी योग्यता समान होने परभी ) इन दोनोंमें कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगकी योग्यता विशेष है । [ उक्त प्रश्न और उत्तर, दोनों निःसंदिग्ध और स्पष्ट हैं। व्याकरणकी दृष्टिसे पहले श्लोकके 'श्रेय' शब्दका अर्थ अधिक प्रशस्त या बहुत अच्छा है; और दोनों मार्गोंके तारतम्य-भावविषयक अर्जुनके प्रश्नकाही यह उत्तर है, कि “कर्मयोगो विशिष्यते” - कर्मयोगकी योग्यता विशेष है ! तथापि यह सिद्धान्त सांख्यमार्गको इष्ट नहीं है, क्योंकि उसका कथन है, कि ज्ञानके पश्चात् सब कर्मोंका स्वरूपतः संन्यासही करना चाहिये; इस कारण इन स्पष्ट-अर्थवाले प्रश्नों- तरोंकी कुछ लोगोने व्यर्थ खींचातानी की है; और जब यह खींचातानी करने- परभी निर्वाह न हुआ, तब उन लोगोंने यह तुर्रा लगाकर किसी प्रकार अपना समाधान कर लिया है, कि 'विशिष्यते' (योग्यता या विशेषता) पदसे भगवानने कर्मयोगकी अर्थवादात्मक अर्थात् कोरी स्तुति कर दी है, असलमें भगवानका ठीक अभिप्राय वैसा नहीं है ! यदि भगवानका यह मत होता, कि ज्ञानके पश्चात् कर्मोंकी आवश्यकता नहीं है; तो क्या वे अर्जुनको यह उत्तर नहीं दे सकते थे, कि “ इन दोनोंमें संन्यास श्रेष्ठ है ?” परंतु ऐसा न करके उन्होने दूसरे श्लोकके पहले चरणमें बतलाया है, कि “ कर्मोंका करना और कर्मोंको छोड़ देना “ ये दोनों मार्ग एक-हीसे मोक्षदाता हैं;” और आगे 'तु' अर्थात् 'परंतु' पदका प्रयोग करके जब भगवानने यह निःसंदिग्ध विधान किया है, कि 'तयोः' अर्थात् इन दोनों मार्गोंमें कर्म छोड़नेके मार्गकी अपेक्षा कर्म करनेका पक्षही अधिक प्रशस्त (श्रेय) है; तब पूर्णतया सिद्ध हो जाता है, कि भगवानको यही मत ग्राह्य है, कि साधनावस्थामें ज्ञानप्राप्तिके लिये किये जानेवाले निष्काम कर्मोंकोही, ज्ञानी पुरुष आगे सिद्धावस्थामेंभी लोक- संग्रहके अर्थ मरणपर्यंत कर्तव्य समझकर करता रहे। यही अर्थ गीता ३.७ में वर्णित है और यही 'विशिष्यते' पद वहाँभी है, और उसके अगले श्लोकमें अर्थात् गीता ३.८ में ये स्पष्ट शब्द फिरभी हैं, कि “अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है।” इसमें संदेह नहीं, कि उपनिषदोंमें कई स्थलों पर ( बृ. ४.४.२२ ) वर्णन है, कि ज्ञानी पुरुष लोकैषणा और पुत्रैषणा प्रभृति न रख कर भिक्षा माँगते हुए घूमा करते हैं। परंतु उपनिषदोंमेंभी यह नहीं कहा है, कि ज्ञानके पश्चात् यह एक-ही मार्ग है दूसरा नहीं है। अतः केवल उल्लिखित उपनिषद्-वाक्यसेही गीताकी एक- वाक्यता करना उचित नहीं है। गीताका यह कथन नहीं है, कि उपनिषदोंमें वर्णित यह संन्यास-मार्ग मोक्षप्रद नही है; किंतु यद्यपि कर्मयोग और संन्यास, दोनों मार्ग एक-सेही मोक्षप्रद है, तथापि, अर्थात् मोक्षकी दृष्टिसे दोनोंका फल एकही होने परभो, जगतके व्यवहारका विचार करनेपर गीताका यह निश्चित मत है, कि ज्ञानके पश्चातभी निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहनेका मार्गही अधिक प्रशस्त या श्रेष्ठ है। हमारा किया हुआ यह अर्थ गीताके बहुतेरे टीकाकारोंको मान्य नहीं