श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 744, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय ६९९ § § ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न कांक्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥ यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥ संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥ | है; उन्होंने कर्मयोगको गौण निश्चित किया है। परंतु हमारी समझमें ये अर्थ | सरल नहीं हैं; और गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (विशेषकर पृ. ३०६-३१५) में | इसके कारणोंका विस्तारपूर्वक विवेचन किया है, इस कारण यहाँ उसके दुहरानेकी | आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार दोनोंमेंसे अधिक प्रशस्त मार्गका निर्णय कर | दिया गया; अब यह सिद्ध कर दिखलाते हैं, कि ये दोनों मार्ग व्यवहारमें | यदि लोगोंको भिन्न दीख पड़े तोभी तत्त्वतः वे दो नहीं हैं:- ] (३) जो (किसीकाभी) द्वेष नहीं करता और (किसीकीभी) इच्छा नहीं करता, उस पुरुषको (कर्म करनेपरभी) नित्यसंन्यासी समझना चाहिये; क्योंकि, हे महाबाहु अर्जुन ! जो ( सुखःदुख आदि ) द्वंद्वोंसे मुक्त हो जाय, वह अनायासही (कर्मोंके सब) बंधोंसे मुक्त हो जाता है। (४) मूर्ख लोग कहते हैं, कि सांख्य (कर्मसंन्यास) और योग (कर्मयोग) भिन्न भिन्न हैं, परंतु पंडित लोग ऐसा नहीं कहते। किसीभी एक मार्गका भलीभाँति आचरण करनेसे दोनोंका फल मिल जाता है। (५) जिस (मोक्ष-)स्थानमें सांख्य-(मार्गवाले लोग) पहुँचते हैं, वहीं योगी अर्थात् कर्मयोगीभी जाते हैं। (इस रीतिसे) जिसने यह जान लिया, कि सांख्य और योग, (ये दोनों मार्ग) एकही हैं उसीने (ठीक तत्त्वको) पहचाना। (६) हे महाबाहु ! योग अर्थात् कर्मके बिना संन्यासको प्राप्त कर लेना कठिन है। जो मुनि कर्मयोगयुक्त हो गया, उसे ब्रह्मकी प्राप्ति होनेमें विलंब नहीं लगता। | [सातवें अध्यायसे लेकर सत्रहवे अध्यायतक इस बातका विस्तारपूर्वक वर्णन | किया गया है, कि सांख्यमार्गसे जो मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोगसे अर्थात् कर्मोंके | न छोड़नेपरभी मिलता है। यहाँ तो इतनाही कहना है, कि मोक्षकी दृष्टिसे | दोनोंमें कुछ फर्क नहीं है, इस कारण अनादि कालसे चलते आये हुए इन | दोनों मार्गोंका भेदभाव बढ़ाकर झगड़ा करना उचित नहीं है; और आगेभी