भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 745

७०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥ नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यन्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥ । यही युक्तियाँ पुनः पुनः आई हैं (गीता ६. २ ; १८ . १, २ एवं उनकी टिप्पणी । देखो) । "एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति" यही श्लोक कुछ । शब्दभेदसे महाभारतमेंभी दो वार आया है (शां. ३०५ . १९ ; ३१६. ४) । । संन्यास-मार्गमें ज्ञानको प्रधान मान लेनेपरभी उस ज्ञानकी सिद्धि कर्म किये बिना । नहीं होती; और कर्म-मार्गमें यद्यपि कर्म किया करते हैं, तोभी वे ज्ञानपूर्वक । होते हैं, इस कारण ब्रह्मप्राप्तिमें कोई बाधा नहीं होती (गीता ६. २) ; फिर । इस झगड़ेको बढ़ानेमें क्या लाभ है, कि दोनों मार्ग भिन्न भिन्न हैं? यदि कहा । जाय, कि कर्म करनाही बंधक है, तो अब बतलाते हैं, कि वह आक्षेपभी निष्काम । कर्मके विषयमें नहीं किया जा सकता :- ] (७) जो (कर्म-) योगयुक्त हो गया, जिसका अंतःकरण शुद्ध हो गया, जिसने अपने मन और इंद्रियोंको जीत लिया, और सब प्राणियोंका आत्माही जिसका आत्मा हो गया, वह ( सब कर्म ) करता हुआभी ( कर्मोंके पाप-पुण्यसे ) अलिप्त रहता है। (८) योगयुक्त तत्त्ववेत्ता पुरुषको समझना चाहिये, कि "मैं कुछभी नहीं करता; (और) देखनेमें, सुननेमें, स्पर्श करनेमें, खानेमें, सूंघनेमें, चलनेमें, सोनेमें, साँस लेनेछोड़नेमें, (९) बोलनेमें, विसर्जन करनेमें, लेनेमें, आँखोंके पलक खोलने और बंद करनेमेंभी, वह ऐसी बुद्धि रख कर (व्यवहार करे) कि (केवल) इंद्रियाँ अपने अपने विषयोंमें वर्तती हैं। । [ अंतके दो श्लोक मिल कर एक-ही वाक्य बना है और उसमें बतलाये । हुए सब कर्म भिन्न भिन्न इंद्रियोंके व्यापार हैं; उदाहरणार्थ, विसर्जन करना । गुदका, लेना हाथका, पलक हिलाना प्राणवायुका, देखना आँखोंका इत्यादि । “मैं । कुछभी नहीं करता” इसका यह मतलब नहीं, कि इंद्रियोंको चाहे जो करने । दे; किंतु मतलब यह है, कि 'मैं' इस अहंकार-बुद्धिके छूट जानेसे अचेतन इंद्रियाँ । आपही आप कोई बुरा काम नहीं कर सकतीं, और वे आत्माके काबूमें रहती । हैं। सारांश, कोई पुरुष ज्ञानी हो जाय, तोभी श्वासोच्छ्वास आदि इंद्रियोंके कर्म । उसकी इंद्रियाँ करतीही रहेंगी। यही क्यों पलभर जीवित रहनाभी कर्मही है। । फिर यह भेद कहाँ रह गया, कि संन्यास-मार्गका ज्ञानी पुरुष कर्म छोड़ता है और