भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 746

पाँचवाँ अध्याय ७०१ ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥ कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥ युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥ | कर्मयोगी करता है ? कर्म तो दोनोंकोभी करनाही पड़ता है । पर अहंकारयुक्त | आसक्ति छूट जानेसे वेही कर्म बंधक नहीं होते, इस कारण आसक्तिका छोड़- | नाही इसका मुख्य तत्त्व है; और उसीका अब अधिक निरूपण करते हैं :- ] (१०) जो ब्रह्ममें अर्पण कर आसक्तिविरहित कर्म करता है, उसको वैसेही पाप नहीं लगता, जैसे कि कमलके पत्तेको पानी नहीं लगता । (११) (अतएव) कर्मयोगी ( ऐसी अहंकारबुद्धि न रखकर, कि 'मै करता हूँ' - केवल ) शरीरसे, ( केवल) मनसे, (केवल) बुद्धिसे और (केवल) इंद्रियोंमेभी आसक्ति छोड़ कर आत्मशुद्धिके लिये कर्म किया करते हैं । | [ कायिक, वाचिक, मानसिक आदि, कर्मोंके भेदोंको लक्ष्यकर इस श्लोक- | में शरीर, मन और बुद्धि शब्द आये है । मूलमें यद्यपि 'केवलः' विशेषण 'इंद्रियैः' | शब्दके पीछे है, तथापि वह शरीर, मन और बुद्धिको'भी लागू है (गीता ४. २१) | इसीसे अनुवादमें उसे 'शरीर' शब्दके समानही अन्य शब्दोंकेभी पीछे लगा दिया | है । जैसे ऊपरके आठवें और नवें श्लोकमें कहा है, वैसेही यहाँभी कहा है, कि | अहंकारबुद्धि एवं फलाशाके विषयमें आसक्ति छोड़ कर केवल कायिक, केवल | वाचिक या केवल मानसिक, कोईभी कर्म किया जाय, तोभी कर्ताको उसका | दोष नहीं लगता ( गीता ३. २७; १३. २९; १८. १६ ) । अहंकारके न रहनेसे | जो कर्म होते हैं, वे सिर्फ़ इंद्रियोंके हैं, और मन आदिक सभी इंद्रियाँ प्रकृतिकेही | विकार हैं, अतः ऐसे कर्मोंका बंधन कर्ताको नहीं लगता । अब इसी अर्थको शास्त्रा- | नुसार सिद्ध करते हैं :- ] (१२) जो युक्त अर्थात् योगयुक्त हो गया, वह कर्मफल छोड़कर अंतकी पूर्ण शांति पाता है; और जो अयुक्त है अर्थात् योगयुक्त नहीं है, वह कामसे अर्थात् वासनासे फलके विषयमें सक्त हो कर ( पाप-पुण्यसे ) बद्ध हो जाता है । (१३) सब कर्मोंका