भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 747, कुल 956 में से

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पृष्ठ 747

७०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥ § § ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥ मनसे (प्रत्यक्ष नहीं) संन्यास कर, जितेन्द्रिय देहवान् (पुरुष) नौ द्वारोंके इस (देहरूपी) नगरमें न कुछ करता और न कराता हुआ आनंदसे पड़ा रहता है । । [अर्थात् वह जानता है, कि आत्मा अकर्ता है, सब खेल तो प्रकृतिका । है; और इसका कारण स्वस्थ या उदासीन पड़ा रहता है (गीता १३.२०; । १८.५९) । दोनों आँखें, दोनों कान, नासिकाके दोनों छिद्र, मुख, मूत्रेन्द्रिय और । गुद - ये शरीरके नौ द्वार या दरवाजे समझे जाते हैं। अध्यात्म-दृष्टिसे यही । उपपत्ति बतलाते हैं, कि कर्मयोगी कर्मोंको करकेभी युक्त कैसे बना रहता है :-] (१४) प्रभु अर्थात् आत्मा या परमेश्वर लोगोंके कर्तृत्वको, उनके कर्मोंको (या उनको प्राप्त होनेवाले) कर्मफलके संयोगकोभी निर्माण नहीं करता। स्वभाव अर्थात् प्रकृतिही (सब कुछ) किया करती है। (१५) विभु अर्थात् सर्वव्यापी आत्मा या परमेश्वर किसीका पाप और किसीका पुण्यभी नहीं लेता। ज्ञानपर अज्ञानका पर्दा पड़ा रहनेके कारण (अर्थात् मायासे) प्राणी मोहित हो जाते हैं। । [इन दोनों श्लोकोंका तत्त्व असलमें सांख्यशास्त्रका है (गीतार. प्र. ७, । पृ. १६४-१६७) और वेदान्तियोंके मतसे आत्माका अर्थ परमेश्वर है, अतः । वेदान्ती लोग परमेश्वरके विषयमेंभी "आत्मा अकर्ता है" इस तत्त्वका उप- । योग करते हैं। प्रकृति और पुरुष ऐसे दो मूल तत्त्व मानकर सांख्यमतवादी । समग्र कर्तृत्व प्रकृतिका मानते हैं; और आत्माको उदासीन कहते हैं। परंतु । वेदान्ती लोग इसके आगे बढ़ कर यह मानते हैं, कि इन दोनोंकाभी मूल एक । निर्गुण परमेश्वर है, और वह सांख्यवालोंके आत्माके समान उदासीन और । अकर्ता है, एवं सारा कर्तृत्व माया (अर्थात् प्रकृति) का है (गीतार. प्र. ९, । पृ. २६७) । अज्ञानके कारण साधारण मनुष्यको ये बातें जान नहीं पड़तीं; । परंतु कर्मयोगी कर्तृत्व और अकर्तृत्वका भेद जानता है, इस कारण अब यही । कहते, हैं कि वह कर्म करकेभी अलिप्तही रहता है :-] (१६) परंतु ज्ञानसे जिनका यह अज्ञान नष्ट हो जाता है, उनके लिये उन्हींका ज्ञान परमार्थतत्त्वको, सूर्यके समान, प्रकाशित कर देता है।

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