श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय ७०३ तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥ § § विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥ इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥ (१७) और उस परमार्थतत्त्वमें ही जिनकी बुद्धि रंग जाती है, वहीं जिनका अंतःकरण रम जाता हैं और जो तन्निष्ठ एवं तत्परायण हो जाते हैं, उनके पाप ज्ञानसे बिलकुल धुल जाते हैं और वे फिर जन्म नहीं लेते । । [ इस प्रकार जिसका अज्ञान नष्ट हो जाय, उस कर्मयोगीकी (संन्यासीकी । नहीं ) ब्रह्मभूत या जीवन्मुक्त अवस्थाका अब अधिक वर्णन करते हैं :- ] (१८) पंडितोंकी अर्थात् ज्ञानियोंकी दृष्टि विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, तैसेही कुत्ता और चांडाल, इन सभीके विषयमें समान रहती है ! (१९) इस प्रकार जिनका मन साम्यावस्थामें स्थिर हो जाता है, वे वहींके वहीं अर्थात् मरणकी प्रतीक्षा न कर, मृत्युलोकको जीत लेते हैं। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, अतः साम्य-बुद्धिवाले ये पुरुष ( सदैव ) ब्रह्ममें स्थित अर्थात् यहींके यही ब्रह्मभूत हो जाते हैं। । [ जिसने इस तत्त्वको जान लिया, कि “आत्मस्वरूपी परमेश्वर अकर्ता । है”, और सारा खेल प्रकृतिका है, वह 'ब्रह्मसंस्थ' हो जाता है। और । उसीको मोक्ष मिलता है – “ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति” (छां. २. २३. १) यह वर्णन । उपनिषदोंमें है, और उसीका अनुवाद ऊपरके श्लोकोंमें किया गया है। परंतु । इस अध्यायके १-१२ श्लोकोंसे गीताका यह अभिप्राय प्रकट होता है, कि इस । अवस्थामेंभी कर्म नहीं छूटते । शंकराचार्यने छांदोग्य उपनिषदके उक्त वाक्यका । संन्यासप्रधान अर्थ किया है। परंतु मूल उपनिषदका पूर्वापार संदर्भ देखनेसे । विदित होता है, कि 'ब्रह्मसंस्थ' होनेपरभी तीनों आश्रमोंके कर्म करनेवालेके । विषयमेंही यह वाक्य कहा गया होगा; और इस उपनिषदके अंतमें यही अर्थ । स्पष्टरूपसे बतलाया गया है (छा. ८. १५. १) । ब्रह्मज्ञान हो चुकनेपर यह । अवस्था जीते जी प्राप्त हो जाती है, अतः इसेही जीवन्मुक्तावस्था कहते हैं । (गीतार. प्र. १०, पृ. २९७-३०२) । अध्यात्मविद्याकी यही पराकाष्ठा है । और चित्तवृत्ति-निरोधरूपी जिन योगसाधनोंसे यह अवस्था प्राप्त हो सकती । है, उनका विस्तारपूर्वक वर्णन अगले अध्यायमें किया गया है। इस अध्यायमें । अब केवल इसी अवस्थाका अधिक वर्णन है :- ]