श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
६९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
| उनके बंधन टूट जाते हैं; और वे मोक्षके लिये प्रतिबंधक नहीं होते; एवं ज्ञानसे | मनके संदेह दूर होकर मोक्ष मिलता है। अतः अंतिम उपदेश यह है, कि अकेले | कर्म या अकेले ज्ञानको स्वीकार न कर; किंतु ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक कर्मयोगका | आश्रय करके युद्ध कर। योगका आश्रय करके युद्धके लिये खड़ा रहना था, | इस कारण गीतारहस्यके प्र. ३, पृ. ५६ में दिखलाया गया है, कि योग शब्दका | अर्थ यहाँ 'कर्मयोग' ही लेना चाहिये। ज्ञान और योगका यह मेलही 'ज्ञानयोग- | व्यवस्थितिः' पदसे आगे दैवी संपत्तिके लक्षणमें ( गीता १६. १ ) फिर | बतलाया गया है। ] इस प्रकार श्रीभगवान्के गाये हुए-अर्थात् कहे हुए-उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग-अर्थात् कर्मयोग-शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग नामक चौथा अध्याय समाप्त हुआ। | [ध्यान रहे, कि 'ज्ञान-कर्म-संन्यास' पदमें 'संन्यास' शब्दका अर्थ स्वरूपतः | 'कर्मत्याग' नहीं है, किंतु निष्काम बुद्धिसे परमेश्वरमें कर्मका संन्यास अर्थात् | 'अर्पण करना' अर्थ है; और आगे अठारहवें अध्यायके आरंभमें उसीका | स्पष्टीकरण किया गया है।]
पाँचवाँ अध्याय ६९७ पंचमोऽध्यायः । अर्जुन उवाच । संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । तच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच । संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ : तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥ पाँचवाँ अध्याय [ चौथे अध्यायके सिद्धान्तपर संन्यास-मार्गवालोंकी जो शंका हो सकती है, उसेही अर्जुनके मुखसे, प्रश्नरूपसे कहलाकर, इस अध्यायमें, भगवानने उसका स्पष्ट उत्तर दिया है । यदि समस्त कर्मोंका पर्यवसान ज्ञान है (गी. ४. ३३), यदि ज्ञानसेही संपूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं (४. ३७) ; और यदि द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञही श्रेष्ठ है (४. ३३) ; तो दूसरेही अध्यायमें यह कहकर, कि “धर्म्य युद्ध करनाही क्षत्रियको श्रेयस्कर है” (गी. २. २१), चौथे अध्यायके उपसंहारमें यह बात क्यों कही गई है, कि “अतएव तू कर्मयोगका आश्रय कर, युद्धके लिये उठ खड़ा हो” (गी. ४. ४२) ? इस प्रश्नका गीता यह उत्तर देती हैं, कि समस्त संदेहोंको दूरकर मोक्षप्राप्तिके लिये ज्ञानकी आवश्यकता है, और यदि मोक्षके लिये कर्म आवश्यक न हों, तोभी कभी न छूटनेके कारण वे लोकसंग्रहार्थ आवश्यक है; इस प्रकार ज्ञान और कर्म, दोनोंकेही समुच्चयकी नित्य अपेक्षा है (४. ४१) । परंतु इसपरभी शंका होती है, कि यदि कर्मयोग और सांख्य, दोनों मार्ग शास्त्रमें विहित हैं, तो उनमेंसे अपनी इच्छाके अनुसार सांख्यमार्गको स्वीकारकर कर्मोंका त्याग करनेमें हानि क्या है ? अर्थात् इसकाभी पूरा निर्णय हो जाना चाहिये, कि इन दोनों मार्गोंमें श्रेष्ठ कौन-सा है; और अर्जुनके मनमें यही शंका हुई है । उसने तीसरे अध्यायके आरंभमें जैसा प्रश्न किया था, वैसा ही अबभी वह पूछता है, कि :-] (१) अर्जुनने कहा :- हे कृष्ण ! (तुम) एक बार संन्यासको और दूसरी बार कर्मोंके योगको (अर्थात् कर्म करते रहनेके मार्गकोही) उत्तम बतलाते हो; अब निश्चय कर मुझे एकही (मार्ग) बतलाओ, कि जो इन दोनोंमें सचमुचही श्रेष्ठ अर्थात् अधिक प्रशस्त हो । (२) श्रीभगवानने कहा :- कर्म-संन्यास और कर्मयोग, (दोनों निष्ठाएँ या मार्ग) निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्ष प्राप्त करा देनेवाले
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हैं; परंतु ( अर्थात् मोक्षकी दृष्टिसे दोनोंकी योग्यता समान होने परभी ) इन दोनोंमें कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगकी योग्यता विशेष है । [ उक्त प्रश्न और उत्तर, दोनों निःसंदिग्ध और स्पष्ट हैं। व्याकरणकी दृष्टिसे पहले श्लोकके 'श्रेय' शब्दका अर्थ अधिक प्रशस्त या बहुत अच्छा है; और दोनों मार्गोंके तारतम्य-भावविषयक अर्जुनके प्रश्नकाही यह उत्तर है, कि “कर्मयोगो विशिष्यते” - कर्मयोगकी योग्यता विशेष है ! तथापि यह सिद्धान्त सांख्यमार्गको इष्ट नहीं है, क्योंकि उसका कथन है, कि ज्ञानके पश्चात् सब कर्मोंका स्वरूपतः संन्यासही करना चाहिये; इस कारण इन स्पष्ट-अर्थवाले प्रश्नों- तरोंकी कुछ लोगोने व्यर्थ खींचातानी की है; और जब यह खींचातानी करने- परभी निर्वाह न हुआ, तब उन लोगोंने यह तुर्रा लगाकर किसी प्रकार अपना समाधान कर लिया है, कि 'विशिष्यते' (योग्यता या विशेषता) पदसे भगवानने कर्मयोगकी अर्थवादात्मक अर्थात् कोरी स्तुति कर दी है, असलमें भगवानका ठीक अभिप्राय वैसा नहीं है ! यदि भगवानका यह मत होता, कि ज्ञानके पश्चात् कर्मोंकी आवश्यकता नहीं है; तो क्या वे अर्जुनको यह उत्तर नहीं दे सकते थे, कि “ इन दोनोंमें संन्यास श्रेष्ठ है ?” परंतु ऐसा न करके उन्होने दूसरे श्लोकके पहले चरणमें बतलाया है, कि “ कर्मोंका करना और कर्मोंको छोड़ देना “ ये दोनों मार्ग एक-हीसे मोक्षदाता हैं;” और आगे 'तु' अर्थात् 'परंतु' पदका प्रयोग करके जब भगवानने यह निःसंदिग्ध विधान किया है, कि 'तयोः' अर्थात् इन दोनों मार्गोंमें कर्म छोड़नेके मार्गकी अपेक्षा कर्म करनेका पक्षही अधिक प्रशस्त (श्रेय) है; तब पूर्णतया सिद्ध हो जाता है, कि भगवानको यही मत ग्राह्य है, कि साधनावस्थामें ज्ञानप्राप्तिके लिये किये जानेवाले निष्काम कर्मोंकोही, ज्ञानी पुरुष आगे सिद्धावस्थामेंभी लोक- संग्रहके अर्थ मरणपर्यंत कर्तव्य समझकर करता रहे। यही अर्थ गीता ३.७ में वर्णित है और यही 'विशिष्यते' पद वहाँभी है, और उसके अगले श्लोकमें अर्थात् गीता ३.८ में ये स्पष्ट शब्द फिरभी हैं, कि “अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है।” इसमें संदेह नहीं, कि उपनिषदोंमें कई स्थलों पर ( बृ. ४.४.२२ ) वर्णन है, कि ज्ञानी पुरुष लोकैषणा और पुत्रैषणा प्रभृति न रख कर भिक्षा माँगते हुए घूमा करते हैं। परंतु उपनिषदोंमेंभी यह नहीं कहा है, कि ज्ञानके पश्चात् यह एक-ही मार्ग है दूसरा नहीं है। अतः केवल उल्लिखित उपनिषद्-वाक्यसेही गीताकी एक- वाक्यता करना उचित नहीं है। गीताका यह कथन नहीं है, कि उपनिषदोंमें वर्णित यह संन्यास-मार्ग मोक्षप्रद नही है; किंतु यद्यपि कर्मयोग और संन्यास, दोनों मार्ग एक-सेही मोक्षप्रद है, तथापि, अर्थात् मोक्षकी दृष्टिसे दोनोंका फल एकही होने परभो, जगतके व्यवहारका विचार करनेपर गीताका यह निश्चित मत है, कि ज्ञानके पश्चातभी निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहनेका मार्गही अधिक प्रशस्त या श्रेष्ठ है। हमारा किया हुआ यह अर्थ गीताके बहुतेरे टीकाकारोंको मान्य नहीं
पाँचवाँ अध्याय ६९९ § § ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न कांक्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥ यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥ संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥ | है; उन्होंने कर्मयोगको गौण निश्चित किया है। परंतु हमारी समझमें ये अर्थ | सरल नहीं हैं; और गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (विशेषकर पृ. ३०६-३१५) में | इसके कारणोंका विस्तारपूर्वक विवेचन किया है, इस कारण यहाँ उसके दुहरानेकी | आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार दोनोंमेंसे अधिक प्रशस्त मार्गका निर्णय कर | दिया गया; अब यह सिद्ध कर दिखलाते हैं, कि ये दोनों मार्ग व्यवहारमें | यदि लोगोंको भिन्न दीख पड़े तोभी तत्त्वतः वे दो नहीं हैं:- ] (३) जो (किसीकाभी) द्वेष नहीं करता और (किसीकीभी) इच्छा नहीं करता, उस पुरुषको (कर्म करनेपरभी) नित्यसंन्यासी समझना चाहिये; क्योंकि, हे महाबाहु अर्जुन ! जो ( सुखःदुख आदि ) द्वंद्वोंसे मुक्त हो जाय, वह अनायासही (कर्मोंके सब) बंधोंसे मुक्त हो जाता है। (४) मूर्ख लोग कहते हैं, कि सांख्य (कर्मसंन्यास) और योग (कर्मयोग) भिन्न भिन्न हैं, परंतु पंडित लोग ऐसा नहीं कहते। किसीभी एक मार्गका भलीभाँति आचरण करनेसे दोनोंका फल मिल जाता है। (५) जिस (मोक्ष-)स्थानमें सांख्य-(मार्गवाले लोग) पहुँचते हैं, वहीं योगी अर्थात् कर्मयोगीभी जाते हैं। (इस रीतिसे) जिसने यह जान लिया, कि सांख्य और योग, (ये दोनों मार्ग) एकही हैं उसीने (ठीक तत्त्वको) पहचाना। (६) हे महाबाहु ! योग अर्थात् कर्मके बिना संन्यासको प्राप्त कर लेना कठिन है। जो मुनि कर्मयोगयुक्त हो गया, उसे ब्रह्मकी प्राप्ति होनेमें विलंब नहीं लगता। | [सातवें अध्यायसे लेकर सत्रहवे अध्यायतक इस बातका विस्तारपूर्वक वर्णन | किया गया है, कि सांख्यमार्गसे जो मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोगसे अर्थात् कर्मोंके | न छोड़नेपरभी मिलता है। यहाँ तो इतनाही कहना है, कि मोक्षकी दृष्टिसे | दोनोंमें कुछ फर्क नहीं है, इस कारण अनादि कालसे चलते आये हुए इन | दोनों मार्गोंका भेदभाव बढ़ाकर झगड़ा करना उचित नहीं है; और आगेभी
७०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥ नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यन्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥ । यही युक्तियाँ पुनः पुनः आई हैं (गीता ६. २ ; १८ . १, २ एवं उनकी टिप्पणी । देखो) । "एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति" यही श्लोक कुछ । शब्दभेदसे महाभारतमेंभी दो वार आया है (शां. ३०५ . १९ ; ३१६. ४) । । संन्यास-मार्गमें ज्ञानको प्रधान मान लेनेपरभी उस ज्ञानकी सिद्धि कर्म किये बिना । नहीं होती; और कर्म-मार्गमें यद्यपि कर्म किया करते हैं, तोभी वे ज्ञानपूर्वक । होते हैं, इस कारण ब्रह्मप्राप्तिमें कोई बाधा नहीं होती (गीता ६. २) ; फिर । इस झगड़ेको बढ़ानेमें क्या लाभ है, कि दोनों मार्ग भिन्न भिन्न हैं? यदि कहा । जाय, कि कर्म करनाही बंधक है, तो अब बतलाते हैं, कि वह आक्षेपभी निष्काम । कर्मके विषयमें नहीं किया जा सकता :- ] (७) जो (कर्म-) योगयुक्त हो गया, जिसका अंतःकरण शुद्ध हो गया, जिसने अपने मन और इंद्रियोंको जीत लिया, और सब प्राणियोंका आत्माही जिसका आत्मा हो गया, वह ( सब कर्म ) करता हुआभी ( कर्मोंके पाप-पुण्यसे ) अलिप्त रहता है। (८) योगयुक्त तत्त्ववेत्ता पुरुषको समझना चाहिये, कि "मैं कुछभी नहीं करता; (और) देखनेमें, सुननेमें, स्पर्श करनेमें, खानेमें, सूंघनेमें, चलनेमें, सोनेमें, साँस लेनेछोड़नेमें, (९) बोलनेमें, विसर्जन करनेमें, लेनेमें, आँखोंके पलक खोलने और बंद करनेमेंभी, वह ऐसी बुद्धि रख कर (व्यवहार करे) कि (केवल) इंद्रियाँ अपने अपने विषयोंमें वर्तती हैं। । [ अंतके दो श्लोक मिल कर एक-ही वाक्य बना है और उसमें बतलाये । हुए सब कर्म भिन्न भिन्न इंद्रियोंके व्यापार हैं; उदाहरणार्थ, विसर्जन करना । गुदका, लेना हाथका, पलक हिलाना प्राणवायुका, देखना आँखोंका इत्यादि । “मैं । कुछभी नहीं करता” इसका यह मतलब नहीं, कि इंद्रियोंको चाहे जो करने । दे; किंतु मतलब यह है, कि 'मैं' इस अहंकार-बुद्धिके छूट जानेसे अचेतन इंद्रियाँ । आपही आप कोई बुरा काम नहीं कर सकतीं, और वे आत्माके काबूमें रहती । हैं। सारांश, कोई पुरुष ज्ञानी हो जाय, तोभी श्वासोच्छ्वास आदि इंद्रियोंके कर्म । उसकी इंद्रियाँ करतीही रहेंगी। यही क्यों पलभर जीवित रहनाभी कर्मही है। । फिर यह भेद कहाँ रह गया, कि संन्यास-मार्गका ज्ञानी पुरुष कर्म छोड़ता है और
पाँचवाँ अध्याय ७०१ ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥ कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥ युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥ | कर्मयोगी करता है ? कर्म तो दोनोंकोभी करनाही पड़ता है । पर अहंकारयुक्त | आसक्ति छूट जानेसे वेही कर्म बंधक नहीं होते, इस कारण आसक्तिका छोड़- | नाही इसका मुख्य तत्त्व है; और उसीका अब अधिक निरूपण करते हैं :- ] (१०) जो ब्रह्ममें अर्पण कर आसक्तिविरहित कर्म करता है, उसको वैसेही पाप नहीं लगता, जैसे कि कमलके पत्तेको पानी नहीं लगता । (११) (अतएव) कर्मयोगी ( ऐसी अहंकारबुद्धि न रखकर, कि 'मै करता हूँ' - केवल ) शरीरसे, ( केवल) मनसे, (केवल) बुद्धिसे और (केवल) इंद्रियोंमेभी आसक्ति छोड़ कर आत्मशुद्धिके लिये कर्म किया करते हैं । | [ कायिक, वाचिक, मानसिक आदि, कर्मोंके भेदोंको लक्ष्यकर इस श्लोक- | में शरीर, मन और बुद्धि शब्द आये है । मूलमें यद्यपि 'केवलः' विशेषण 'इंद्रियैः' | शब्दके पीछे है, तथापि वह शरीर, मन और बुद्धिको'भी लागू है (गीता ४. २१) | इसीसे अनुवादमें उसे 'शरीर' शब्दके समानही अन्य शब्दोंकेभी पीछे लगा दिया | है । जैसे ऊपरके आठवें और नवें श्लोकमें कहा है, वैसेही यहाँभी कहा है, कि | अहंकारबुद्धि एवं फलाशाके विषयमें आसक्ति छोड़ कर केवल कायिक, केवल | वाचिक या केवल मानसिक, कोईभी कर्म किया जाय, तोभी कर्ताको उसका | दोष नहीं लगता ( गीता ३. २७; १३. २९; १८. १६ ) । अहंकारके न रहनेसे | जो कर्म होते हैं, वे सिर्फ़ इंद्रियोंके हैं, और मन आदिक सभी इंद्रियाँ प्रकृतिकेही | विकार हैं, अतः ऐसे कर्मोंका बंधन कर्ताको नहीं लगता । अब इसी अर्थको शास्त्रा- | नुसार सिद्ध करते हैं :- ] (१२) जो युक्त अर्थात् योगयुक्त हो गया, वह कर्मफल छोड़कर अंतकी पूर्ण शांति पाता है; और जो अयुक्त है अर्थात् योगयुक्त नहीं है, वह कामसे अर्थात् वासनासे फलके विषयमें सक्त हो कर ( पाप-पुण्यसे ) बद्ध हो जाता है । (१३) सब कर्मोंका
७०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥ § § ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥ मनसे (प्रत्यक्ष नहीं) संन्यास कर, जितेन्द्रिय देहवान् (पुरुष) नौ द्वारोंके इस (देहरूपी) नगरमें न कुछ करता और न कराता हुआ आनंदसे पड़ा रहता है । । [अर्थात् वह जानता है, कि आत्मा अकर्ता है, सब खेल तो प्रकृतिका । है; और इसका कारण स्वस्थ या उदासीन पड़ा रहता है (गीता १३.२०; । १८.५९) । दोनों आँखें, दोनों कान, नासिकाके दोनों छिद्र, मुख, मूत्रेन्द्रिय और । गुद - ये शरीरके नौ द्वार या दरवाजे समझे जाते हैं। अध्यात्म-दृष्टिसे यही । उपपत्ति बतलाते हैं, कि कर्मयोगी कर्मोंको करकेभी युक्त कैसे बना रहता है :-] (१४) प्रभु अर्थात् आत्मा या परमेश्वर लोगोंके कर्तृत्वको, उनके कर्मोंको (या उनको प्राप्त होनेवाले) कर्मफलके संयोगकोभी निर्माण नहीं करता। स्वभाव अर्थात् प्रकृतिही (सब कुछ) किया करती है। (१५) विभु अर्थात् सर्वव्यापी आत्मा या परमेश्वर किसीका पाप और किसीका पुण्यभी नहीं लेता। ज्ञानपर अज्ञानका पर्दा पड़ा रहनेके कारण (अर्थात् मायासे) प्राणी मोहित हो जाते हैं। । [इन दोनों श्लोकोंका तत्त्व असलमें सांख्यशास्त्रका है (गीतार. प्र. ७, । पृ. १६४-१६७) और वेदान्तियोंके मतसे आत्माका अर्थ परमेश्वर है, अतः । वेदान्ती लोग परमेश्वरके विषयमेंभी "आत्मा अकर्ता है" इस तत्त्वका उप- । योग करते हैं। प्रकृति और पुरुष ऐसे दो मूल तत्त्व मानकर सांख्यमतवादी । समग्र कर्तृत्व प्रकृतिका मानते हैं; और आत्माको उदासीन कहते हैं। परंतु । वेदान्ती लोग इसके आगे बढ़ कर यह मानते हैं, कि इन दोनोंकाभी मूल एक । निर्गुण परमेश्वर है, और वह सांख्यवालोंके आत्माके समान उदासीन और । अकर्ता है, एवं सारा कर्तृत्व माया (अर्थात् प्रकृति) का है (गीतार. प्र. ९, । पृ. २६७) । अज्ञानके कारण साधारण मनुष्यको ये बातें जान नहीं पड़तीं; । परंतु कर्मयोगी कर्तृत्व और अकर्तृत्वका भेद जानता है, इस कारण अब यही । कहते, हैं कि वह कर्म करकेभी अलिप्तही रहता है :-] (१६) परंतु ज्ञानसे जिनका यह अज्ञान नष्ट हो जाता है, उनके लिये उन्हींका ज्ञान परमार्थतत्त्वको, सूर्यके समान, प्रकाशित कर देता है।
पाँचवाँ अध्याय ७०३ तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥ § § विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥ इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥ (१७) और उस परमार्थतत्त्वमें ही जिनकी बुद्धि रंग जाती है, वहीं जिनका अंतःकरण रम जाता हैं और जो तन्निष्ठ एवं तत्परायण हो जाते हैं, उनके पाप ज्ञानसे बिलकुल धुल जाते हैं और वे फिर जन्म नहीं लेते । । [ इस प्रकार जिसका अज्ञान नष्ट हो जाय, उस कर्मयोगीकी (संन्यासीकी । नहीं ) ब्रह्मभूत या जीवन्मुक्त अवस्थाका अब अधिक वर्णन करते हैं :- ] (१८) पंडितोंकी अर्थात् ज्ञानियोंकी दृष्टि विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, तैसेही कुत्ता और चांडाल, इन सभीके विषयमें समान रहती है ! (१९) इस प्रकार जिनका मन साम्यावस्थामें स्थिर हो जाता है, वे वहींके वहीं अर्थात् मरणकी प्रतीक्षा न कर, मृत्युलोकको जीत लेते हैं। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, अतः साम्य-बुद्धिवाले ये पुरुष ( सदैव ) ब्रह्ममें स्थित अर्थात् यहींके यही ब्रह्मभूत हो जाते हैं। । [ जिसने इस तत्त्वको जान लिया, कि “आत्मस्वरूपी परमेश्वर अकर्ता । है”, और सारा खेल प्रकृतिका है, वह 'ब्रह्मसंस्थ' हो जाता है। और । उसीको मोक्ष मिलता है – “ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति” (छां. २. २३. १) यह वर्णन । उपनिषदोंमें है, और उसीका अनुवाद ऊपरके श्लोकोंमें किया गया है। परंतु । इस अध्यायके १-१२ श्लोकोंसे गीताका यह अभिप्राय प्रकट होता है, कि इस । अवस्थामेंभी कर्म नहीं छूटते । शंकराचार्यने छांदोग्य उपनिषदके उक्त वाक्यका । संन्यासप्रधान अर्थ किया है। परंतु मूल उपनिषदका पूर्वापार संदर्भ देखनेसे । विदित होता है, कि 'ब्रह्मसंस्थ' होनेपरभी तीनों आश्रमोंके कर्म करनेवालेके । विषयमेंही यह वाक्य कहा गया होगा; और इस उपनिषदके अंतमें यही अर्थ । स्पष्टरूपसे बतलाया गया है (छा. ८. १५. १) । ब्रह्मज्ञान हो चुकनेपर यह । अवस्था जीते जी प्राप्त हो जाती है, अतः इसेही जीवन्मुक्तावस्था कहते हैं । (गीतार. प्र. १०, पृ. २९७-३०२) । अध्यात्मविद्याकी यही पराकाष्ठा है । और चित्तवृत्ति-निरोधरूपी जिन योगसाधनोंसे यह अवस्था प्राप्त हो सकती । है, उनका विस्तारपूर्वक वर्णन अगले अध्यायमें किया गया है। इस अध्यायमें । अब केवल इसी अवस्थाका अधिक वर्णन है :- ]
७०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥ बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥ ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥ शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥ § § योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥ ( २० ) प्रिय अर्थात् इष्ट वस्तुको पाकर प्रसन्न न हो जावे, और अप्रियको पानेसे खिन्नभी न होवे । ( इस प्रकार ) जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोहमें नही फँसता ( कहना चाहिये, कि ) वही ब्रह्मवेत्ता ब्रह्ममें स्थित हुआ । ( २१ ) बाह्य पदार्थोंके ( इंद्रियोंसे होनेवाले ) संयोगमें अर्थात् विषयोपभोगमें जिसका मन आसक्त नहीं, उसे ( ही ) आत्मसुख मिलता है; और वह ब्रह्मयुक्त पुरुष अक्षय सुखका अनुभव करता है । ( २२ ) ( बाहरी पदार्थोंके ) संयोगसेही उत्पन्न होनेवाले भोगोंका आदि और अंत है, अतएव वे दुःखकेही कारण हैं; हे कौन्तेय ! उनमें पंडित लोग रत नहीं होते । ( २३ ) शरीर छूटनेके पहले अर्थात् मरणपर्यंत कामक्रोधसे होनेवाले वेगको इस लोकमेही सहन करनेमें ( इंद्रियसंयमसे ) जो समर्थ होता है, वही युक्त और वही ( सच्चा ) सुखी है । | [ गीताके दूसरे अध्यायमें भगवानने कहा है, कि तुझे सुख-दुःख सहने | चाहिये ( गीता. २. १४) . यह उसीका विस्तार और निरूपण है । गीता | २. १४ मे सुख-दुःखोंको 'आगमापायिनः' विशेषण लगाया है, तो यहाँ २२ वें | श्लोकमें उनको 'आद्यन्तवन्तः' कहा है, और 'मात्रा' शब्दके बदले 'बाह्य' शब्दका | प्रयोग किया है । इसीमें 'युक्त' शब्दकी व्याख्याभी आ गई है । सुख-दुखोंका | त्याग कर सम-बुद्धिसे उनको सहते रहनाही युक्तताका सच्चा लक्षण है । ( गीता | २. ६१ की टिप्पणी देखो ) । ] ( २४ ) इस प्रकार ( बाह्य सुख-दुःखोंकी अपेक्षा न कर ) जो अंतःसुखी अर्थात् अंतःकरणमेंही सुखी हो जाय, जो अपने आपमेंही आराम पाने लगे, और ऐसेही जिसे ( यह ) अतःप्रकाश मिल जाय, वह ( कर्म-)योगी ब्रह्मरूप हो जाता है, एवं उसेही ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् ब्रह्ममें मिल जानेका मोक्ष प्राप्त हो जाता है ।
पाँचवाँ अध्याय ७०५ लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥ कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥ स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥ जिन ऋषियोंकी द्वंद्वबुद्धि छूट गई है, अर्थात् जिन्होंने इस तत्त्वको जान लिया है, कि सब स्थानोंमें एकही परमेश्वर है, जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, और जो आत्मसंयमसे सब प्राणियोंका हित करनेमें रत हो गये हैं, उन्हें यह ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष मिलता है। (२५) कामक्रोधविरहित, आत्मसंयमी और आत्मज्ञानसंपन्न यतियोंको 'अभितः' अर्थात् आसपास या सन्मुख रखा हुआ-सा (अर्थात् बैठे-बिठाये) ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष मिल जाता है। (२७) बाह्य पदार्थोंके (इंद्रियोंके सुख- दुःखदायक) संयोगसे अलग होकर, दोनों भौहोंके बीचमें दृष्टिको जमाकर और नाकसे चलनेवाले प्राण एवं अपानको सम करके, (२८) जिसने इंद्रियों, मन और बुद्धिका संयम कर लिया है, तथा जिसके भय, इच्छा और क्रोध छूट गये हैं, वह मोक्षपरायण मुनि सदा-सर्वदा मुक्तही है। । [ गीतारहस्यके नवम (पृ. २३४, २४८) और दशम (पृ. ३००) । प्रकरणोंसे ज्ञात होगा, कि यह वर्णन जीवन्मुक्तावस्थाका है। परंतु हमारी रायमें । टीकाकारोंका यह कथन ठीक नहीं, कि यह वर्णन संन्यास-मार्गके पुरुषका है। । संन्यास और कर्मयोग, दोनों मार्गोंमें शांति तो एक-ही-सी रहती है, और उतनेहीके । लिये यह वर्णन संन्यासमार्गको उपयुक्त हो सकेगा। परंतु इस अध्यायके । आरंभमें कर्मयोगको श्रेष्ठ निश्चित कर फिर २५ वें श्लोकमें जो यह कहा है, कि । ज्ञानी पुरुष सब प्राणियोंका हित करनेमें प्रत्यक्ष मग्न रहते हैं, उससे प्रकट । होता है, कि यह समस्त वर्णन कर्मयोगी जीवन्मुक्तकाही है, संन्यासीका नहीं है । (गीतार. प्र. १२, पृ. ३५८ देखो)। कर्ममार्गमेंभी सर्वभूतान्तर्गत परमेश्वरको । पहचाननाही परमसाध्य है, अतः भगवान् अंतमें कहते हैं, कि :- ] गी. र. ४५
७०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे संन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ (२९) जो मुझको (सब) यज्ञों और तपोंका भोक्ता, (स्वर्ग आदि) सब लोकोंका बड़ा स्वामी, एवं सब प्राणियोंका मित्र जानता है, वही शांति पाता है। इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषद्में, ब्रह्म विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें संन्यासयोग नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
छठा अध्याय ७०७ षष्ठोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥ छठा अध्याय [ इतना तो सिद्ध हो गया, कि मोक्षप्राप्ति होनेके लिये ज्ञानके सिवा और किसीकीभी अपेक्षा न हो, तोभी लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ज्ञानी पुरुषको ज्ञानके अनंतरभी कर्म करते रहना चाहिये, परंतु फलाशा छोड़कर उन्हें सम-बुद्धिमे इसलिये करे, ताकि वे बंधक न हो जावें, इसेही कर्मयोग कहते हैं, और कर्म-संन्यास-मार्गकी अपेक्षा यह अधिक श्रेयस्कर है। तथापि इतनेमेही कर्मयोगका प्रतिपादन समाप्त नही होता । तीसरेही अध्यायमें काम-क्रोध आदिका वर्णन करते हुए भगवानने अर्जुनसे कहा है, कि ये शत्रु मनुष्यकी इंद्रियोंमें, मनमें और बुद्धिमें घर करके उसके ज्ञान-विज्ञानका नाशकर देते हैं ( गीता. ३. ४० ), अतः तू इंद्रियोंके निग्रहसे इनको पहले जीत ले । इस उपदेशको पूर्ण करनेके लिये इन दो प्रश्नोंका स्पष्टीकरण करना आवश्यक था, कि ( १ ) इंद्रियनिग्रह कैसे करें और ( २ ) ज्ञान-विज्ञान किसे कहते हैं ? परंतु बीचमेंही अर्जुनके प्रश्नोंसे यह बतलाना पड़ा कि कर्म-संन्यास और कर्मयोग इन दोनोंमें अधिक अच्छा मार्ग कौन-सा है, और फिर इन दोनों मार्गोंकी यथाशक्य एकवाक्यताभी करके यह प्रतिपादन किया गया है, कि कर्मोंको न छोड़करभी, उन्हीको निःसंग- बुद्धिसे करते जानेपर ब्रह्म-निर्वाणरूपी मोक्ष क्योंकर मिलता है ? अब इस अध्यायमें उन साधनोंके निरूपण करनेका आरंभ किया गया है, जिनकी आवश्यकता कर्मयोगमेंभी उक्त निःसंग या ब्रह्मनिष्ठ स्थिति प्राप्त करनेमें होती है। तथापि यह निरूपणभी स्वतंत्र रीतिसे पातंजलयोगका उपदेश करनेके लिये नहीं किया गया है, और यह बात पाठकोंके ध्यानमें आ जाय, इसलिये यहाँ पिछले अध्यायोंमे प्रतिपादन की हुई बातोंकाही प्रथम उल्लेख किया गया है, जैसे - फलाशा छोड़कर कर्म करनेवाले पुरुषकोही सच्चा संन्यासी समझना चाहिये, कर्म छोड़नेवालेको नहीं, ( गीता ५. ३ ) इत्यादि । ] श्रीभगवानने कहा :- ( १ ) कर्मफलका आश्रय न करके ( अर्थात् मनमें फलाशाको न टिकने देकर ) जो ( शास्त्रानुसार अपने विहित ) कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी और वही कर्मयोगी है। निरग्नि अर्थात् अग्निहोत्र आदि कर्मोंको छोड़ देनेवाला अथवा अक्रिय अर्थात् कोईभी कर्म न करके निठल्ले बैठनेवाला
७०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥ § § आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥ (सच्चा संन्यासी और योगी) नहीं है। (२) हे पांडव ! जिसे संन्यास कहते हैं, उसीको (कर्म-योग) समझ। क्योंकि संकल्प अर्थात् काम्य-बुद्धिरूप फलाशाका संन्यास (= त्याग) कियेबिना कोईभी (कर्म-) योगी नहीं होता । । [ पिछले अध्यायमें जो कहा है, कि "एकं सांख्यं च" (गीता ५.५), । या "बिना योगके संन्यास नहीं होता" (५.६) अथवा "ज्ञेयः स नित्य- । संन्यासी" (५.३), उसीका यह अनुवाद है, और आगे अठारहवें अध्यायमें । (१८.२) समग्र विषयका उपसंहार करते हुए इसी अर्थका फिरभी वर्णन । किया है। गृहस्थाश्रममें अग्निहोत्र रखकर यज्ञयाग आदि कर्म करने पड़ते हैं; । पर जो संन्यासाश्रमी हो गया हो, उसके लिये मनुस्मृतिमें कहा है, कि उसको । इस प्रकार अग्निकी रक्षा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहती, इस कारण । वह 'निरग्नि' हो जाय, और जंगलमें रहकर भिक्षासे पेट पाले, जगतके व्यवहारमें । न पड़े (मनु. ६. २५ इत्यादि)। पहले श्लोकमें मनुके इसी मतका उल्लेख । किया गया है; और इसपर भगवानका कथन है, कि निरग्नि और निष्क्रिय होना । कुछ सच्चे संन्यासका लक्षण नहीं है। काम्य-बुद्धिका या फलाशाका त्याग करनाही । सच्चा संन्यास है। संन्यास बुद्धिमें है; अग्नित्याग अथवा कर्मत्यागकी बाह्य । क्रियामें नहीं है। अतएव फलाशा अथवा संकल्पका त्यागकर कर्तव्यकर्म करने- । वालेकोही सच्चा संन्यासी कहना चाहिये । गीताका यह सिद्धान्त स्मृतिकारोंके । सिद्धान्तसे भिन्न है, और गीतारहस्यके ११ वें प्रकरणमें (पृ. ३४८-३५१) । स्पष्टकर दिखला दिया है, कि गीताने स्मार्त-मार्गसे इसका मेल कैसे किया है, । इस प्रकार सच्चा संन्यास बतलाकर अब यह बतलाते हैं, कि ज्ञान होनेके पहले । अर्थात् साधनावस्थामें जो कर्म किये जाते हैं, उनमें, और ज्ञानोत्तर अर्थात् । सिद्धावस्थामें फलाशा छोड़कर जो कर्म किये जाते उनमें क्या भेद है:-] (३) (कर्म-) योगारूढ़ होनेकी इच्छा रखनेवाले मुनिके लिये कर्म (शमका) कारण अर्थात् साधन कहा गया है; और उसी पुरुषके योगारूढ अर्थात् पूर्ण योगी हो जानेपर कहा जाता है, कि उसके लिये (आगे) शम (कर्मका) कारण हो जाता है। । [ टीकाकारोंने इस श्लोकके अर्थका अनर्थ कर डाला है। श्लोकके पूर्वार्धमें । योग = कर्मयोग यही अर्थ है, और यह बात सभीको मान्य है, कि उसकी सिद्धिके
छठा अध्याय ७०९
| लिये पहले कर्मही कारण होता है। किंतु “ योगारूढ होनेपर उसीके लिये शम | कारण हो जाता है ” - इसका अर्थ टीकाकारोंने संन्यास-प्रधान कर डाला है। | उनका कथन यों है :- 'शम' = कर्मका 'उपशम'; और जिसे योग सिद्ध हो | गया है, उसे, कर्म छोड़ देने चाहिये ! क्योंकि उनके मतमें कर्मयोग संन्यासका | अंग अर्थात् पूर्व-साधन है। परंतु यह अर्थ सांप्रदायिक आग्रहका है, जो ठीक नहीं | है। इसका पहला कारण यह है, कि जब इस अध्यायके पहलेही श्लोकमें भगवानने | कहा है, कि कर्मफलका आश्रय न करके “ कर्तव्यकर्म करनेवाला ” पुरुषही | सच्चा योगी अर्थात् योगारूढ है, कर्म न करनेवाला ( अक्रिय ) सच्चा योगी नहीं | है; तब यह मानना सर्वथा अन्याय्य है, कि तीसरे श्लोकमें योगारूढ पुरुषको | कर्मका शम करनेके लिये, या कर्म छोड़नेके लिये भगवान् कहेंगे। संन्यास-मार्गका | यह मत भलेही हो, कि शांति मिल जानेपर योगारूढ पुरुष कर्म न करे; | परंतु गीताको यह मत मान्य नहीं है। गीतामें अनेक स्थानोंपर स्पष्ट उपदेश | किया गया है, कि कर्मयोगी सिद्धावस्थामेंभी भगवानके समान यावज्जीवन | निष्काम बुद्धिसे सब कर्म केवल कर्तव्य समझकर रहता रहे ( गीता २. ७१; | ३. ७, १९; ४. १९-२१; ५, ७-१२; १२. १२; १८. ५६, ५७; गीतार. | प्र. ११, १२ ) । दूसरा कारण यह है, कि शम शब्दका अर्थ 'कर्मका शम' | कहाँसे आया ? भगवद्गीतामें 'शम' शब्द दो-चार बार आया है (गीता १०. ४; | १८. ४२ ), वहाँ और व्यवहारमेंभी उसका अर्थ 'मनकी शांति' है। फिर | इसी श्लोकमें 'कर्मकी शांति' अर्थ क्यों लें ? इस कठिनाईको दूर करनेके लिये | गीताके पैशाचभाष्यमें 'योगारूढस्य तस्यैव' के 'तस्यैव' इस दर्शक सर्वनामका | संबंध 'योगारूढस्य' से न लगाकर, 'तस्य'को नपुंसकलिंगकी षष्ठी विभक्ति | समझ करके ऐसा अर्थ किया है, कि 'तस्यैव कर्मणः शमः' ( तस्य अर्थात् | पूर्वार्धके कर्मका शम ) किंतु यह अन्वयभी सरल नहीं है। क्योंकि, इसमें | कोई संदेह नहीं, कि योगाभ्यास करनेवाले जिस पुरुषका वर्णन इस श्लोकके | पूर्वार्धमें किया गया है, उसीकी जो स्थिति अभ्यास पूरा हो चुकनेपर होती है, | उसे बतलानेकेलिये उत्तरार्धका आरंभ हुआ है। अतएव 'तस्यैव' पदोंमे 'कर्मणः | एव' यह अर्थ लिया नहीं जा सकता; अथवा यदि लेही लें, तो उसका संबंध | ' "शमः' से न जोड़कर 'कारणमुच्यते' के साथ जोड़नेमे ऐसा अन्वय लगता है, | “ शमः योगारूढस्य तस्यैव कर्मणः कारणमुच्यते । ” और गीताके संपूर्ण उपदेशके | अनुसार उसका यह अर्थभी ठीक लग जायगा, कि “ अब योगारूढके कर्मकाही | शम कारण होता है। ” टीकाकारोंके अर्थको त्याज्य माननेका तीसरा कारण | यह है, कि संन्यास-मार्गके अनुसार योगारूढ पुरुषको यदि कुछभी करनेकी | आवश्यकता नहीं रह जाती, उसके सब कर्मोंका अंत शममेंही हो जाता है; | और यह सच है, तो “ योगारूढको शम कारण होता है ” इस वाक्यका 'कारण'
७१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । शब्द बिलकुलही निरर्थक हो जाता है। 'कारण' शब्द सदैव सापेक्ष है। 'कारण' । कहनेसे उसको कुछ-न-कुछ 'कार्य' अवश्य चाहिये और संन्यास-मार्गके अनुसार । योगारूढको तो कोईभी 'कार्य' नहीं रह जाता। यदि शमको मोक्षका 'कारण' । अर्थात् साधन कहें, तो मेल नहीं मिलता। क्योंकि मोक्षका साधन ज्ञान है, शम । नहीं। अच्छा; शमको ज्ञानप्राप्तिका 'कारण' अर्थात् साधन कहें, तो यह वर्णन । योगारूढ अर्थात् पूर्णावस्थाको पहुँचे हुए पुरुषकाही है, इसलिये उसको ज्ञान- । प्राप्ति तो कर्मके साधनसे पहलेही हो चुकती है। फिर यह शम 'कारण' है । किसका? संन्यास-मार्गके टीकाकारोंसे इस प्रश्नका कुछभी समाधानकारक । उत्तर देते नहीं बनता। परंतु उनके इस अर्थको छोड़कर विचार करने लगें, तो । उत्तरार्धका अर्थ करनेमें पूर्वार्धका 'कर्म'पद सान्निध्यसामर्थ्यसे सहजही मनमें । आ जाता है और फिर यह अर्थ निष्पन्न होता है, कि योगारूढ पुरुषको लोक- । संग्रहकारक कर्म करनेके लिये अब 'शम' 'कारण' या साधन हो जाता है, क्योंकि । यद्यपि उसका कोई स्वार्थ शेष नहीं रह गया है, तथापि लोकसंग्रहकारक कर्म । किसीसे छूट नहीं सकते (गीता ३. १७-१९)। पिछले अध्यायमें जो यह । वचन है, कि “युक्त. कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकीम्” (गीता । ५. १२) - कर्मफलका त्याग करके योगी पूर्ण शांति पाता है इससेभी यही । अर्थ सिद्ध होता है। क्यों कि; उसमें शांतिका संबंध कर्मत्यागसे न जोड़कर केवल । फलाशाके त्यागसेही वर्णित है, वहीपर स्पष्ट कहा है, कि योगी जो कर्म-संन्यास । करे, वह 'मनसा' अर्थात् मनसे करे (गीता. ५. १३), शरीरके द्वारा या केवल । इंद्रियोंके द्वारा उसे कर्म करनेही चाहिये। हमारा तो यह मत है, कि अलंकार- । शास्त्रके अन्योन्यालंकारका-सा अर्थचमत्कार या सौरस्य इस श्लोकमें सध गया । है; और पूर्वार्धमें यह बतला कर, कि 'शम'का कारण 'कर्म' कब होता है, । उत्तरार्धमें इसके विपरीत वर्णन किया है, कि 'कर्म'का कारण 'शम' कब होता । है? भगवान् कहते हैं, कि प्रथम साधनावस्था में 'कर्म'ही शमका अर्थात् योग- । सिद्धिका कारण है। भाव यह है, कि यथाशक्ति निष्काम कर्म करते करतेही । चित्त शांत होकर उसीके द्वारा अंतमें पूर्ण योगसिद्धि हो जाती है। किंतु योगीके । योगारूढ होकर सिद्धावस्था में पहुँच जानेपर कर्म और शमका उक्त कार्यकारण- । भाव बदल जाता है याने कर्मशम कारण नही होता; किंतु शमही कर्मका कारण । बन जाता है; अर्थात् योगारूढ पुरुष अपने सब काम अब कर्तव्य समझकर, । फलकी आशा न रखकरके, शांतचित्तसे किया करता है। सारांश, इस । श्लोकका भावार्थ यह नहीं है, कि सिद्धावस्थामें कर्म छूट जाते हैं, किंतु गीताका । यह कथन है कि साधनावस्था में 'कर्म' और 'शम'के बीच जो कार्यकारणभाव । होता है, सिर्फ वही सिद्धावस्थामें बदल जाता है (गीतारहस्य प्र. ११, । पृ. ३२४-३२५)। गीतामें यह कहींभी नहीं कहा, कि कर्मयोगीको अंतमे कर्म
छठा अध्याय ७११ यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥ § § उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥ बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥ | छोड़ देने चाहिये, और ऐसा कहनेका उद्देश्यभी नहीं है । अतएव अवसर पाकर | किसी ढंगसे गीताके बीचकेही किसी श्लोकका संन्यास-प्रधान अर्थ लगाना उचित | नहीं है । आजकल गीता बहुतेरोंको दुर्बोध-सी हो गई है, उसका कारणभी | यही है । अगले श्लोककी व्याख्यामें यही अर्थ व्यक्त होता है, कि योगारूढ | पुरुषको कर्म करने चाहिये । वह श्लोक इस प्रकार है :- ] (४) क्योंकि, जब वह इंद्रियोंके ( शब्द स्पर्श आदि ) विषयोंमें और कर्मोंमें अनुषक्त नहीं होता तथा सब संकल्प अर्थात् काम्यबुद्धिरूप फलाशाका ( प्रत्यक्ष कर्मोंका नहीं ) संन्यास करता है, तब उसको योगारूढ कहते हैं । | [ कह सकते हैं, कि यह श्लोक पिछले श्लोकके साथ और पहलेके तीनों | श्लोकोंके साथभी मिला हुआ है । इससे गीताका यह अभिप्राय स्पष्ट होता है, | कि योगारूढ पुरुषको कर्म न छोड़कर केवल फलाशा या काम्य-बुद्धि छोड़करके | शांत चित्तसे निष्काम कर्म करने चाहिये । 'संकल्पका संन्यास' ये शब्द ऊपर | दूसरे श्लोकमें आये हैं, वहाँ इनका जो अर्थ है, वही इस श्लोकमेंभी लेना चाहिये । | कर्मयोगमेंही फलाशात्यागरूपी संन्यासका समावेश होता है; और फलाशा छोड़- | कर कर्म करनेवाले पुरुषकोही सच्चा संन्यासी और योगी अर्थात् योगारूढ कहना | चाहिये । अब यह बतलाते हैं, कि इस प्रकारके निष्काम कर्मयोग या फलाशा- | संन्यासकी सिद्धि प्राप्त कर लेना प्रत्येक मनुष्यके अधिकारमें है, जो स्वयं प्रयत्न | करेगा उसे इसकी प्राप्ति हो जाना कुछ असंभव नहीं :- ] (५) ( मनुष्य ) अपना उद्धार आपही करे । अपने आपको ( कभीभी ) गिरने न दे । क्योंकि ( प्रत्येक मनुष्य ) स्वयंही अपना बंधु ( अर्थात् सहायक ), या स्वयंही अपना शत्रु है । (६) जिसने अपने आपको जीत लिया, वह स्वयं अपना बंधु है; परंतु जो अपने आपको नहीं पहचानता, वह स्वयं अपने साथ शत्रुके समान वैर करता है । | [ इन दो श्लोकोंमें आत्मस्वतंत्रताका वर्णन है, और इस तत्त्वका प्रतिपादन | है, कि हरएकको अपना उद्धार आपही करना चाहिये, और प्रकृति कितनीभी क्यों
७१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥ । न हो, उसको जीत कर आत्मोन्नति कर लेना हरएकके बलवती बसकी बात है । (गीतार. प्र. १०, पृ. २८०-२८४)। मनमें इस तत्त्वके भली भाँति जम जानेके । लियेही एक बार अन्वयसे और फिर व्यतिरेकसे, दोनों रीतियोंसे, वर्णन किया । है, कि आत्मा अपनाही मित्र कब होता है और आत्मा अपना शत्रु कब हो जाता । है; और यही तत्त्व फिर १३. २८ श्लोकमेंभी आया है। संस्कृतमें 'आत्मा' । शब्दके ये तीन अर्थ होते हैं- (१) अंतरात्मा, (२) मैं स्वयं, और (३) । अंतःकरण या मन; इसीसे यह आत्मा शब्द इस श्लोकमें और अगले श्लोकोंमें । अनेक बार आया है। अब बतलाते हैं, कि आत्माको अपने अधीन रखनेसे क्या । फल मिलता है :- ] (७) जिसने अपने आत्मा अर्थात् अंतःकरणको जीत लिया हो और जिसे शांति प्राप्त हो गई हो, उसका 'परमात्मा' शीत-उष्ण, सुख-दुःख और मान-अपमानमें समाहित अर्थात् सम एवं स्थिर रहता है। । [ इस श्लोकमें 'परमात्मा' शब्द आत्माके लियेही प्रयुक्त है। देहका । आत्मा सामान्यतः सुख-दुःखकी उपाधिमें मग्न रहता है; परंतु इंद्रियसंयमसे । उपाधियोंको जीत लेनेपर यही आत्मा प्रसन्न हो करके परमात्मरूपी या । परमेश्वरस्वरूपी बना करता है। परमात्मा कुछ आत्मासे विभिन्न स्वरूपका । पदार्थ नहीं है, और आगे गीतामेंही (गीता १३. २२, ३१) कहा है, कि । मानवी शरीरमें रहनेवाला आत्माही तत्त्वतः परमात्मा है। महाभारतमेंभी यह । वर्णन है :- ] । आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । । तैरेव विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ । “प्राकृत अथवा प्रकृतिके गुणोंसे (सुख-दुःख आदि विकारोंसे) बद्ध रहनेके । कारण आत्माकोही क्षेत्रज्ञ या शरीरका जीवात्मा कहते हैं; और इन गुणोंसे । मुक्त होनेपर वही परमात्मा हो जाता है” (मभा. शां. १८७. २४)। गीता- । रहस्यके ९ वें प्रकरणसे ज्ञात होगा, कि अद्वैत वेदान्तका सिद्धान्तभी यही है। । जो कहते हैं, कि गीतामें अद्वैत मतका प्रतिपादन नहीं है; विशिष्टाद्वैत या शुद्ध । द्वैतही गीताको ग्राह्य है, वे 'परमात्मा'को एक पद न मान 'पर' और 'आत्मा' । ऐसे दो पद करके 'पर'को 'समाहितः' का क्रियाविशेषण समझते हैं! यह अर्थ । क्लिष्ट है; परंतु इस उदाहरणसे समझमें आ जावेगा, कि सांप्रदायिक टीकाकार । अपने मतके अनुसार गीताकी कैसी खींचातानी करते हैं।]
छठा अध्याय ७१३ ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः ॥ ८ ॥ सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ ॥ § § योगी युंजीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१० ॥ (८) जिसका आत्मा ज्ञान और विज्ञानसे अर्थात् विविध ज्ञानसे तृप्त हो जाय, जो अपनी इंद्रियोंको जीत ले, जो कूटस्थ अर्थात् मूलमें जा पहुँचे और मिट्टी, पत्थर एवं सोनेको एक-सा मानने लगे, उसी (कर्म-)योगी पुरुषको 'युक्त' अर्थात् सिद्धा- वस्थाको पहुँचा हुआ कहते हैं। (९) सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष करनेयोग्य और बांधवोंके विषयमें, एवं साधु तथा दुष्ट लोगोंके विषयमेंभी जिसकी बुद्धि सम हो गयी हो, वही ( पुरुष ) विशेष योग्यताका है। । [ प्रत्युपकारकी इच्छा न रखकर सहायता करनेवाले स्नेहीको सुहृद् । कहते हैं; जब दो दल हो जायें, तब किसीकीभी बुराई-भलाई न चाहनेवालेको । उदासीन कहते है; दोनों दलोंकी भलाई चाहनेवालेको मध्यस्थ कहते हैं; और । संबंधीको बंधु कहते हैं - टीकाकारोंने ऐसेही अर्थ किये हैं। परंतु इन अर्थोंसे । कुछ भिन्न अर्थभी कर सकते हैं। क्योंकि, इन शब्दोंका प्रयोग प्रत्येकमें कुछ । भिन्न अर्थ दिखलानेके लियेही नहीं किया गया है, किंतु अनेक शब्दोंकी यह योजना । सिर्फ इसीलिये की जाती है, कि सबके मेलसे व्यापक अर्थका बोध हो जाय, उसमें । कुछभी न्यूनता न रहने पावे। इस प्रकार संक्षेपसे बतला दिया, कि योगी, योगारूढ । या युक्त किसे कहना चाहिये ( गीता २. ६१; ४. १८, ५. २३ ), और यहभी । बतला दिया, कि इस कर्मयोगको सिद्ध कर लेनेके लिये प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है, । उसके लिये किसीका मुँह जोहनेकी कोई ज़रूरत नहीं। अब कर्मयोगकी सिद्धिके । लिये अपेक्षित साधनका निरूपण करते हैं :- ] (१०) योगी अर्थात् कर्मयोगी एकान्तमें अकेला रहकर चित्त और आत्माका संयम करे, किसीभी काम्यवासनाको न रख, परिग्रह अर्थात् पाश छोड़करके निरंतर अपने योगाभ्यासमे लगा रहे। । [ अगले श्लोकसे स्पष्ट होता है, कि यहांपर 'युंजीत'पदसे पातंजल- । सूत्रका योग विवक्षित है। तथापि इसका यह अर्थ नहीं, कि कर्मयोगको प्राप्त । कर लेनेकी इच्छा करनेवाला पुरुष अपनी समस्त आयु पातंजलयोगमें बिता । दे। कर्मयोगके लिये आवश्यक साम्य-बुद्धिको प्राप्त करनेके लिये साधनस्वरूप
७१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युंज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥ । पातंजलयोग इस अध्यायमें वर्णित है; और उतनेहीके लिये एकान्तवासभी । आवश्यक है । प्रकृति-स्वभावके कारण संभव नहीं, कि सभीको पातंजलयोगकी । समाधि एकही जन्ममें सिद्ध हो जाय । इसी अध्यायके अंतमें भगवानने कहा है, । कि जिन पुरुषोंको समाधिसिद्ध नहीं हुई है, वे अपनी सारी आयु पातंजल- । योगमेंही न बिता दें, किंतु जितना हो सके उतना, बुद्धिको स्थिर करके । कर्मयोगका आचरण करते जावें, उसीसे अनेक जन्मोंमें उनको अंतमें सिद्धि । मिल जायगी । ( गीतार. प्र. १०, पृ. २८४-२८७ ) । (११) पहले दर्भ, फिर मृगछाला, और उसपर फिर वस्त्र बिछाकर योगाभ्यासी पुरुष शुद्ध स्थानपर अपना स्थिर आसन लगावे, जो कि न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा भी, (१२) वहाँ चित्त और इंद्रियोंके व्यापार रोककर तथा मनको एकाग्र करके आत्मशुद्धिके लिये आसनपर बैठकर योगका अभ्यास करे । ( १३ ) काय अर्थात् पीठ, मस्तक और ग्रीवाको सम करके अर्थात् सीधी खड़ी रेखामें निश्चल करके, स्थिर होता हुआ, दिशाओंको याने इधर-उधर न रखकर, अपनी नाककी नोकपर दृष्टि जमाकर, (१४) निडर हो, शांत अंतःकरणसे, ब्रह्मचर्यव्रत पालकर तथा मनका संयम करके, मुझमेंही चित्त लगाकर, मत्परायण होता हुआ युक्त हो कर बैठ जाय । । [ ‘शुद्ध स्थानपर’ और ‘काय, ग्रीवा एवं मस्तकको समकर’ ये शब्द । श्वेताश्वतर उपनिषदके हैं ( श्वे. २. ८, १० ) ; और ऊपरका समस्त वर्णनभी । हठयोगका नहीं है, प्रत्युत पुराने उपनिषदोंमें योगका जो वर्णन है, उससे अधिक । मिलता-जुलता है । हठयोगमें इंद्रियोंका निग्रह बलात्कारसे किया जाता है; पर । आगे इसी अध्यायके २४ वें श्लोकमें कहा है, कि ऐसा न करके “मनसैवेन्द्रिय- । ग्रामं विनियम्य” - मनसेही इंद्रियोंको रोके । इससे प्रकट है, कि गीतामें हठयोग । विवक्षित नहीं है । ऐसेही इसी अध्यायके अंतमें कहा है, कि इस वर्णनका यह
छठा अध्याय ७१५ युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥ नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥ उद्देश्य नहीं, कि कोई अपनी सारी जिंदगी योगाभ्यासमेंही बिता दे । अब इसी योगाभ्यासके फलका अधिक निरूपण करते हैं :- ] (१५) इस प्रकार सदा अपना योगाभ्यास जारी रखनेसे मन काबूमें होकर (कर्म-)योगीको मुझमें रहनेवाली और अंतमें निर्वाणपद अर्थात् मेरे स्वरूपमें लीन करा देनेवाली शांति प्राप्त होती है । [ इस श्लोकमें 'सदा'पदसे प्रतिदिनके २४ घंटोंका मतलब नहीं है । इतनाही अर्थ विवक्षित है, कि प्रतिदिन यथाशक्ति घड़ी-घड़ी भर यह अभ्यास करे (श्लोक १० की टिप्पणी देखो ) । कहा है, कि इस प्रकार योगाभ्यास करता हुआ 'मच्चित्त' और 'मत्परायण' हो; इसका कारण यह है, कि पातंजलयोग मनके निरोध करनेकी एक युक्ति या क्रिया है। इस कसरतसे यदि मन आधीन हो जाय तोभी वह एकाग्र मन भगवानमें न लगाकर और दूसरी बातकी ओरभी लगाया जा सकता है । पर गीताका कथन है, कि एकाग्र चित्तका ऐसा दुरुपयोग न कर, मनकी इस एकाग्रता या समाधि का उपयोग परमेश्वरके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करनेमें होना चाहिये, और ऐसेही यह योग सुखकारक होता है, अन्यथा ये निरे क्लेश हैं; और यही अर्थ आगे २९ वें, ३० वें एवं अध्यायके अंतमें ४७ वें श्लोकमें फिर आया है । परमेश्वरमें निष्ठा न रख जो लोग केवल इंद्रियनिग्रहका योग या कसरत करते हैं, वे लोंगोंको क्लेशप्रद जारण, मारण या वशीकरण वगैरह कर्म करनेमेंही प्रवीण हो जाते हैं । यह अवस्था न केवल गीताकोही, प्रत्युत किसीभी मोक्षमार्गको इष्ट नहीं। अब फिर इस योगक्रियाकाही अधिक स्पष्टीकरण करते हैं :- ] ( १६) हे अर्जुन ! अतिशय खानेवाले या बिलकुल न खानेवालेको, और खूब सोनेवाले अथवा जागरण करनेवालेको ( यह ) योग सिद्ध नहीं होता । ( १७ ) जिसका आहारविहार नियमित है, कर्मोंका आचरण नपा-तुला है और सोना-जागना परिमित है, उसको ( यह ) योग दुःखघातक अर्थात् सुखावह होता है । [ इस श्लोकमें 'योग'से पातंजलयोगकी क्रिया और 'युक्त'से नियमित, नपी-तुली अथवा परिमितका अर्थ है; और आगेभी दो-एक स्थानोंपर योग-से