भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 753

७०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥ § § आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥ (सच्चा संन्यासी और योगी) नहीं है। (२) हे पांडव ! जिसे संन्यास कहते हैं, उसीको (कर्म-योग) समझ। क्योंकि संकल्प अर्थात् काम्य-बुद्धिरूप फलाशाका संन्यास (= त्याग) कियेबिना कोईभी (कर्म-) योगी नहीं होता । । [ पिछले अध्यायमें जो कहा है, कि "एकं सांख्यं च" (गीता ५.५), । या "बिना योगके संन्यास नहीं होता" (५.६) अथवा "ज्ञेयः स नित्य- । संन्यासी" (५.३), उसीका यह अनुवाद है, और आगे अठारहवें अध्यायमें । (१८.२) समग्र विषयका उपसंहार करते हुए इसी अर्थका फिरभी वर्णन । किया है। गृहस्थाश्रममें अग्निहोत्र रखकर यज्ञयाग आदि कर्म करने पड़ते हैं; । पर जो संन्यासाश्रमी हो गया हो, उसके लिये मनुस्मृतिमें कहा है, कि उसको । इस प्रकार अग्निकी रक्षा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहती, इस कारण । वह 'निरग्नि' हो जाय, और जंगलमें रहकर भिक्षासे पेट पाले, जगतके व्यवहारमें । न पड़े (मनु. ६. २५ इत्यादि)। पहले श्लोकमें मनुके इसी मतका उल्लेख । किया गया है; और इसपर भगवानका कथन है, कि निरग्नि और निष्क्रिय होना । कुछ सच्चे संन्यासका लक्षण नहीं है। काम्य-बुद्धिका या फलाशाका त्याग करनाही । सच्चा संन्यास है। संन्यास बुद्धिमें है; अग्नित्याग अथवा कर्मत्यागकी बाह्य । क्रियामें नहीं है। अतएव फलाशा अथवा संकल्पका त्यागकर कर्तव्यकर्म करने- । वालेकोही सच्चा संन्यासी कहना चाहिये । गीताका यह सिद्धान्त स्मृतिकारोंके । सिद्धान्तसे भिन्न है, और गीतारहस्यके ११ वें प्रकरणमें (पृ. ३४८-३५१) । स्पष्टकर दिखला दिया है, कि गीताने स्मार्त-मार्गसे इसका मेल कैसे किया है, । इस प्रकार सच्चा संन्यास बतलाकर अब यह बतलाते हैं, कि ज्ञान होनेके पहले । अर्थात् साधनावस्थामें जो कर्म किये जाते हैं, उनमें, और ज्ञानोत्तर अर्थात् । सिद्धावस्थामें फलाशा छोड़कर जो कर्म किये जाते उनमें क्या भेद है:-] (३) (कर्म-) योगारूढ़ होनेकी इच्छा रखनेवाले मुनिके लिये कर्म (शमका) कारण अर्थात् साधन कहा गया है; और उसी पुरुषके योगारूढ अर्थात् पूर्ण योगी हो जानेपर कहा जाता है, कि उसके लिये (आगे) शम (कर्मका) कारण हो जाता है। । [ टीकाकारोंने इस श्लोकके अर्थका अनर्थ कर डाला है। श्लोकके पूर्वार्धमें । योग = कर्मयोग यही अर्थ है, और यह बात सभीको मान्य है, कि उसकी सिद्धिके