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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

७०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥ § § आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥ (सच्चा संन्यासी और योगी) नहीं है। (२) हे पांडव ! जिसे संन्यास कहते हैं, उसीको (कर्म-योग) समझ। क्योंकि संकल्प अर्थात् काम्य-बुद्धिरूप फलाशाका संन्यास (= त्याग) कियेबिना कोईभी (कर्म-) योगी नहीं होता । । [ पिछले अध्यायमें जो कहा है, कि "एकं सांख्यं च" (गीता ५.५), । या "बिना योगके संन्यास नहीं होता" (५.६) अथवा "ज्ञेयः स नित्य- । संन्यासी" (५.३), उसीका यह अनुवाद है, और आगे अठारहवें अध्यायमें । (१८.२) समग्र विषयका उपसंहार करते हुए इसी अर्थका फिरभी वर्णन । किया है। गृहस्थाश्रममें अग्निहोत्र रखकर यज्ञयाग आदि कर्म करने पड़ते हैं; । पर जो संन्यासाश्रमी हो गया हो, उसके लिये मनुस्मृतिमें कहा है, कि उसको । इस प्रकार अग्निकी रक्षा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहती, इस कारण । वह 'निरग्नि' हो जाय, और जंगलमें रहकर भिक्षासे पेट पाले, जगतके व्यवहारमें । न पड़े (मनु. ६. २५ इत्यादि)। पहले श्लोकमें मनुके इसी मतका उल्लेख । किया गया है; और इसपर भगवानका कथन है, कि निरग्नि और निष्क्रिय होना । कुछ सच्चे संन्यासका लक्षण नहीं है। काम्य-बुद्धिका या फलाशाका त्याग करनाही । सच्चा संन्यास है। संन्यास बुद्धिमें है; अग्नित्याग अथवा कर्मत्यागकी बाह्य । क्रियामें नहीं है। अतएव फलाशा अथवा संकल्पका त्यागकर कर्तव्यकर्म करने- । वालेकोही सच्चा संन्यासी कहना चाहिये । गीताका यह सिद्धान्त स्मृतिकारोंके । सिद्धान्तसे भिन्न है, और गीतारहस्यके ११ वें प्रकरणमें (पृ. ३४८-३५१) । स्पष्टकर दिखला दिया है, कि गीताने स्मार्त-मार्गसे इसका मेल कैसे किया है, । इस प्रकार सच्चा संन्यास बतलाकर अब यह बतलाते हैं, कि ज्ञान होनेके पहले । अर्थात् साधनावस्थामें जो कर्म किये जाते हैं, उनमें, और ज्ञानोत्तर अर्थात् । सिद्धावस्थामें फलाशा छोड़कर जो कर्म किये जाते उनमें क्या भेद है:-] (३) (कर्म-) योगारूढ़ होनेकी इच्छा रखनेवाले मुनिके लिये कर्म (शमका) कारण अर्थात् साधन कहा गया है; और उसी पुरुषके योगारूढ अर्थात् पूर्ण योगी हो जानेपर कहा जाता है, कि उसके लिये (आगे) शम (कर्मका) कारण हो जाता है। । [ टीकाकारोंने इस श्लोकके अर्थका अनर्थ कर डाला है। श्लोकके पूर्वार्धमें । योग = कर्मयोग यही अर्थ है, और यह बात सभीको मान्य है, कि उसकी सिद्धिके

छठा अध्याय ७०९

| लिये पहले कर्मही कारण होता है। किंतु “ योगारूढ होनेपर उसीके लिये शम | कारण हो जाता है ” - इसका अर्थ टीकाकारोंने संन्यास-प्रधान कर डाला है। | उनका कथन यों है :- 'शम' = कर्मका 'उपशम'; और जिसे योग सिद्ध हो | गया है, उसे, कर्म छोड़ देने चाहिये ! क्योंकि उनके मतमें कर्मयोग संन्यासका | अंग अर्थात् पूर्व-साधन है। परंतु यह अर्थ सांप्रदायिक आग्रहका है, जो ठीक नहीं | है। इसका पहला कारण यह है, कि जब इस अध्यायके पहलेही श्लोकमें भगवानने | कहा है, कि कर्मफलका आश्रय न करके “ कर्तव्यकर्म करनेवाला ” पुरुषही | सच्चा योगी अर्थात् योगारूढ है, कर्म न करनेवाला ( अक्रिय ) सच्चा योगी नहीं | है; तब यह मानना सर्वथा अन्याय्य है, कि तीसरे श्लोकमें योगारूढ पुरुषको | कर्मका शम करनेके लिये, या कर्म छोड़नेके लिये भगवान् कहेंगे। संन्यास-मार्गका | यह मत भलेही हो, कि शांति मिल जानेपर योगारूढ पुरुष कर्म न करे; | परंतु गीताको यह मत मान्य नहीं है। गीतामें अनेक स्थानोंपर स्पष्ट उपदेश | किया गया है, कि कर्मयोगी सिद्धावस्थामेंभी भगवानके समान यावज्जीवन | निष्काम बुद्धिसे सब कर्म केवल कर्तव्य समझकर रहता रहे ( गीता २. ७१; | ३. ७, १९; ४. १९-२१; ५, ७-१२; १२. १२; १८. ५६, ५७; गीतार. | प्र. ११, १२ ) । दूसरा कारण यह है, कि शम शब्दका अर्थ 'कर्मका शम' | कहाँसे आया ? भगवद्गीतामें 'शम' शब्द दो-चार बार आया है (गीता १०. ४; | १८. ४२ ), वहाँ और व्यवहारमेंभी उसका अर्थ 'मनकी शांति' है। फिर | इसी श्लोकमें 'कर्मकी शांति' अर्थ क्यों लें ? इस कठिनाईको दूर करनेके लिये | गीताके पैशाचभाष्यमें 'योगारूढस्य तस्यैव' के 'तस्यैव' इस दर्शक सर्वनामका | संबंध 'योगारूढस्य' से न लगाकर, 'तस्य'को नपुंसकलिंगकी षष्ठी विभक्ति | समझ करके ऐसा अर्थ किया है, कि 'तस्यैव कर्मणः शमः' ( तस्य अर्थात् | पूर्वार्धके कर्मका शम ) किंतु यह अन्वयभी सरल नहीं है। क्योंकि, इसमें | कोई संदेह नहीं, कि योगाभ्यास करनेवाले जिस पुरुषका वर्णन इस श्लोकके | पूर्वार्धमें किया गया है, उसीकी जो स्थिति अभ्यास पूरा हो चुकनेपर होती है, | उसे बतलानेकेलिये उत्तरार्धका आरंभ हुआ है। अतएव 'तस्यैव' पदोंमे 'कर्मणः | एव' यह अर्थ लिया नहीं जा सकता; अथवा यदि लेही लें, तो उसका संबंध | ' "शमः' से न जोड़कर 'कारणमुच्यते' के साथ जोड़नेमे ऐसा अन्वय लगता है, | “ शमः योगारूढस्य तस्यैव कर्मणः कारणमुच्यते । ” और गीताके संपूर्ण उपदेशके | अनुसार उसका यह अर्थभी ठीक लग जायगा, कि “ अब योगारूढके कर्मकाही | शम कारण होता है। ” टीकाकारोंके अर्थको त्याज्य माननेका तीसरा कारण | यह है, कि संन्यास-मार्गके अनुसार योगारूढ पुरुषको यदि कुछभी करनेकी | आवश्यकता नहीं रह जाती, उसके सब कर्मोंका अंत शममेंही हो जाता है; | और यह सच है, तो “ योगारूढको शम कारण होता है ” इस वाक्यका 'कारण'

७१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । शब्द बिलकुलही निरर्थक हो जाता है। 'कारण' शब्द सदैव सापेक्ष है। 'कारण' । कहनेसे उसको कुछ-न-कुछ 'कार्य' अवश्य चाहिये और संन्यास-मार्गके अनुसार । योगारूढको तो कोईभी 'कार्य' नहीं रह जाता। यदि शमको मोक्षका 'कारण' । अर्थात् साधन कहें, तो मेल नहीं मिलता। क्योंकि मोक्षका साधन ज्ञान है, शम । नहीं। अच्छा; शमको ज्ञानप्राप्तिका 'कारण' अर्थात् साधन कहें, तो यह वर्णन । योगारूढ अर्थात् पूर्णावस्थाको पहुँचे हुए पुरुषकाही है, इसलिये उसको ज्ञान- । प्राप्ति तो कर्मके साधनसे पहलेही हो चुकती है। फिर यह शम 'कारण' है । किसका? संन्यास-मार्गके टीकाकारोंसे इस प्रश्नका कुछभी समाधानकारक । उत्तर देते नहीं बनता। परंतु उनके इस अर्थको छोड़कर विचार करने लगें, तो । उत्तरार्धका अर्थ करनेमें पूर्वार्धका 'कर्म'पद सान्निध्यसामर्थ्यसे सहजही मनमें । आ जाता है और फिर यह अर्थ निष्पन्न होता है, कि योगारूढ पुरुषको लोक- । संग्रहकारक कर्म करनेके लिये अब 'शम' 'कारण' या साधन हो जाता है, क्योंकि । यद्यपि उसका कोई स्वार्थ शेष नहीं रह गया है, तथापि लोकसंग्रहकारक कर्म । किसीसे छूट नहीं सकते (गीता ३. १७-१९)। पिछले अध्यायमें जो यह । वचन है, कि “युक्त. कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकीम्” (गीता । ५. १२) - कर्मफलका त्याग करके योगी पूर्ण शांति पाता है इससेभी यही । अर्थ सिद्ध होता है। क्यों कि; उसमें शांतिका संबंध कर्मत्यागसे न जोड़कर केवल । फलाशाके त्यागसेही वर्णित है, वहीपर स्पष्ट कहा है, कि योगी जो कर्म-संन्यास । करे, वह 'मनसा' अर्थात् मनसे करे (गीता. ५. १३), शरीरके द्वारा या केवल । इंद्रियोंके द्वारा उसे कर्म करनेही चाहिये। हमारा तो यह मत है, कि अलंकार- । शास्त्रके अन्योन्यालंकारका-सा अर्थचमत्कार या सौरस्य इस श्लोकमें सध गया । है; और पूर्वार्धमें यह बतला कर, कि 'शम'का कारण 'कर्म' कब होता है, । उत्तरार्धमें इसके विपरीत वर्णन किया है, कि 'कर्म'का कारण 'शम' कब होता । है? भगवान् कहते हैं, कि प्रथम साधनावस्था में 'कर्म'ही शमका अर्थात् योग- । सिद्धिका कारण है। भाव यह है, कि यथाशक्ति निष्काम कर्म करते करतेही । चित्त शांत होकर उसीके द्वारा अंतमें पूर्ण योगसिद्धि हो जाती है। किंतु योगीके । योगारूढ होकर सिद्धावस्था में पहुँच जानेपर कर्म और शमका उक्त कार्यकारण- । भाव बदल जाता है याने कर्मशम कारण नही होता; किंतु शमही कर्मका कारण । बन जाता है; अर्थात् योगारूढ पुरुष अपने सब काम अब कर्तव्य समझकर, । फलकी आशा न रखकरके, शांतचित्तसे किया करता है। सारांश, इस । श्लोकका भावार्थ यह नहीं है, कि सिद्धावस्थामें कर्म छूट जाते हैं, किंतु गीताका । यह कथन है कि साधनावस्था में 'कर्म' और 'शम'के बीच जो कार्यकारणभाव । होता है, सिर्फ वही सिद्धावस्थामें बदल जाता है (गीतारहस्य प्र. ११, । पृ. ३२४-३२५)। गीतामें यह कहींभी नहीं कहा, कि कर्मयोगीको अंतमे कर्म

छठा अध्याय ७११ यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥ § § उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥ बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥ | छोड़ देने चाहिये, और ऐसा कहनेका उद्देश्यभी नहीं है । अतएव अवसर पाकर | किसी ढंगसे गीताके बीचकेही किसी श्लोकका संन्यास-प्रधान अर्थ लगाना उचित | नहीं है । आजकल गीता बहुतेरोंको दुर्बोध-सी हो गई है, उसका कारणभी | यही है । अगले श्लोककी व्याख्यामें यही अर्थ व्यक्त होता है, कि योगारूढ | पुरुषको कर्म करने चाहिये । वह श्लोक इस प्रकार है :- ] (४) क्योंकि, जब वह इंद्रियोंके ( शब्द स्पर्श आदि ) विषयोंमें और कर्मोंमें अनुषक्त नहीं होता तथा सब संकल्प अर्थात् काम्यबुद्धिरूप फलाशाका ( प्रत्यक्ष कर्मोंका नहीं ) संन्यास करता है, तब उसको योगारूढ कहते हैं । | [ कह सकते हैं, कि यह श्लोक पिछले श्लोकके साथ और पहलेके तीनों | श्लोकोंके साथभी मिला हुआ है । इससे गीताका यह अभिप्राय स्पष्ट होता है, | कि योगारूढ पुरुषको कर्म न छोड़कर केवल फलाशा या काम्य-बुद्धि छोड़करके | शांत चित्तसे निष्काम कर्म करने चाहिये । 'संकल्पका संन्यास' ये शब्द ऊपर | दूसरे श्लोकमें आये हैं, वहाँ इनका जो अर्थ है, वही इस श्लोकमेंभी लेना चाहिये । | कर्मयोगमेंही फलाशात्यागरूपी संन्यासका समावेश होता है; और फलाशा छोड़- | कर कर्म करनेवाले पुरुषकोही सच्चा संन्यासी और योगी अर्थात् योगारूढ कहना | चाहिये । अब यह बतलाते हैं, कि इस प्रकारके निष्काम कर्मयोग या फलाशा- | संन्यासकी सिद्धि प्राप्त कर लेना प्रत्येक मनुष्यके अधिकारमें है, जो स्वयं प्रयत्न | करेगा उसे इसकी प्राप्ति हो जाना कुछ असंभव नहीं :- ] (५) ( मनुष्य ) अपना उद्धार आपही करे । अपने आपको ( कभीभी ) गिरने न दे । क्योंकि ( प्रत्येक मनुष्य ) स्वयंही अपना बंधु ( अर्थात् सहायक ), या स्वयंही अपना शत्रु है । (६) जिसने अपने आपको जीत लिया, वह स्वयं अपना बंधु है; परंतु जो अपने आपको नहीं पहचानता, वह स्वयं अपने साथ शत्रुके समान वैर करता है । | [ इन दो श्लोकोंमें आत्मस्वतंत्रताका वर्णन है, और इस तत्त्वका प्रतिपादन | है, कि हरएकको अपना उद्धार आपही करना चाहिये, और प्रकृति कितनीभी क्यों

७१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥ । न हो, उसको जीत कर आत्मोन्नति कर लेना हरएकके बलवती बसकी बात है । (गीतार. प्र. १०, पृ. २८०-२८४)। मनमें इस तत्त्वके भली भाँति जम जानेके । लियेही एक बार अन्वयसे और फिर व्यतिरेकसे, दोनों रीतियोंसे, वर्णन किया । है, कि आत्मा अपनाही मित्र कब होता है और आत्मा अपना शत्रु कब हो जाता । है; और यही तत्त्व फिर १३. २८ श्लोकमेंभी आया है। संस्कृतमें 'आत्मा' । शब्दके ये तीन अर्थ होते हैं- (१) अंतरात्मा, (२) मैं स्वयं, और (३) । अंतःकरण या मन; इसीसे यह आत्मा शब्द इस श्लोकमें और अगले श्लोकोंमें । अनेक बार आया है। अब बतलाते हैं, कि आत्माको अपने अधीन रखनेसे क्या । फल मिलता है :- ] (७) जिसने अपने आत्मा अर्थात् अंतःकरणको जीत लिया हो और जिसे शांति प्राप्त हो गई हो, उसका 'परमात्मा' शीत-उष्ण, सुख-दुःख और मान-अपमानमें समाहित अर्थात् सम एवं स्थिर रहता है। । [ इस श्लोकमें 'परमात्मा' शब्द आत्माके लियेही प्रयुक्त है। देहका । आत्मा सामान्यतः सुख-दुःखकी उपाधिमें मग्न रहता है; परंतु इंद्रियसंयमसे । उपाधियोंको जीत लेनेपर यही आत्मा प्रसन्न हो करके परमात्मरूपी या । परमेश्वरस्वरूपी बना करता है। परमात्मा कुछ आत्मासे विभिन्न स्वरूपका । पदार्थ नहीं है, और आगे गीतामेंही (गीता १३. २२, ३१) कहा है, कि । मानवी शरीरमें रहनेवाला आत्माही तत्त्वतः परमात्मा है। महाभारतमेंभी यह । वर्णन है :- ] । आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । । तैरेव विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ । “प्राकृत अथवा प्रकृतिके गुणोंसे (सुख-दुःख आदि विकारोंसे) बद्ध रहनेके । कारण आत्माकोही क्षेत्रज्ञ या शरीरका जीवात्मा कहते हैं; और इन गुणोंसे । मुक्त होनेपर वही परमात्मा हो जाता है” (मभा. शां. १८७. २४)। गीता- । रहस्यके ९ वें प्रकरणसे ज्ञात होगा, कि अद्वैत वेदान्तका सिद्धान्तभी यही है। । जो कहते हैं, कि गीतामें अद्वैत मतका प्रतिपादन नहीं है; विशिष्टाद्वैत या शुद्ध । द्वैतही गीताको ग्राह्य है, वे 'परमात्मा'को एक पद न मान 'पर' और 'आत्मा' । ऐसे दो पद करके 'पर'को 'समाहितः' का क्रियाविशेषण समझते हैं! यह अर्थ । क्लिष्ट है; परंतु इस उदाहरणसे समझमें आ जावेगा, कि सांप्रदायिक टीकाकार । अपने मतके अनुसार गीताकी कैसी खींचातानी करते हैं।]

छठा अध्याय ७१३ ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः ॥ ८ ॥ सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ ॥ § § योगी युंजीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१० ॥ (८) जिसका आत्मा ज्ञान और विज्ञानसे अर्थात् विविध ज्ञानसे तृप्त हो जाय, जो अपनी इंद्रियोंको जीत ले, जो कूटस्थ अर्थात् मूलमें जा पहुँचे और मिट्टी, पत्थर एवं सोनेको एक-सा मानने लगे, उसी (कर्म-)योगी पुरुषको 'युक्त' अर्थात् सिद्धा- वस्थाको पहुँचा हुआ कहते हैं। (९) सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष करनेयोग्य और बांधवोंके विषयमें, एवं साधु तथा दुष्ट लोगोंके विषयमेंभी जिसकी बुद्धि सम हो गयी हो, वही ( पुरुष ) विशेष योग्यताका है। । [ प्रत्युपकारकी इच्छा न रखकर सहायता करनेवाले स्नेहीको सुहृद् । कहते हैं; जब दो दल हो जायें, तब किसीकीभी बुराई-भलाई न चाहनेवालेको । उदासीन कहते है; दोनों दलोंकी भलाई चाहनेवालेको मध्यस्थ कहते हैं; और । संबंधीको बंधु कहते हैं - टीकाकारोंने ऐसेही अर्थ किये हैं। परंतु इन अर्थोंसे । कुछ भिन्न अर्थभी कर सकते हैं। क्योंकि, इन शब्दोंका प्रयोग प्रत्येकमें कुछ । भिन्न अर्थ दिखलानेके लियेही नहीं किया गया है, किंतु अनेक शब्दोंकी यह योजना । सिर्फ इसीलिये की जाती है, कि सबके मेलसे व्यापक अर्थका बोध हो जाय, उसमें । कुछभी न्यूनता न रहने पावे। इस प्रकार संक्षेपसे बतला दिया, कि योगी, योगारूढ । या युक्त किसे कहना चाहिये ( गीता २. ६१; ४. १८, ५. २३ ), और यहभी । बतला दिया, कि इस कर्मयोगको सिद्ध कर लेनेके लिये प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है, । उसके लिये किसीका मुँह जोहनेकी कोई ज़रूरत नहीं। अब कर्मयोगकी सिद्धिके । लिये अपेक्षित साधनका निरूपण करते हैं :- ] (१०) योगी अर्थात् कर्मयोगी एकान्तमें अकेला रहकर चित्त और आत्माका संयम करे, किसीभी काम्यवासनाको न रख, परिग्रह अर्थात् पाश छोड़करके निरंतर अपने योगाभ्यासमे लगा रहे। । [ अगले श्लोकसे स्पष्ट होता है, कि यहांपर 'युंजीत'पदसे पातंजल- । सूत्रका योग विवक्षित है। तथापि इसका यह अर्थ नहीं, कि कर्मयोगको प्राप्त । कर लेनेकी इच्छा करनेवाला पुरुष अपनी समस्त आयु पातंजलयोगमें बिता । दे। कर्मयोगके लिये आवश्यक साम्य-बुद्धिको प्राप्त करनेके लिये साधनस्वरूप

७१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युंज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥ । पातंजलयोग इस अध्यायमें वर्णित है; और उतनेहीके लिये एकान्तवासभी । आवश्यक है । प्रकृति-स्वभावके कारण संभव नहीं, कि सभीको पातंजलयोगकी । समाधि एकही जन्ममें सिद्ध हो जाय । इसी अध्यायके अंतमें भगवानने कहा है, । कि जिन पुरुषोंको समाधिसिद्ध नहीं हुई है, वे अपनी सारी आयु पातंजल- । योगमेंही न बिता दें, किंतु जितना हो सके उतना, बुद्धिको स्थिर करके । कर्मयोगका आचरण करते जावें, उसीसे अनेक जन्मोंमें उनको अंतमें सिद्धि । मिल जायगी । ( गीतार. प्र. १०, पृ. २८४-२८७ ) । (११) पहले दर्भ, फिर मृगछाला, और उसपर फिर वस्त्र बिछाकर योगाभ्यासी पुरुष शुद्ध स्थानपर अपना स्थिर आसन लगावे, जो कि न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा भी, (१२) वहाँ चित्त और इंद्रियोंके व्यापार रोककर तथा मनको एकाग्र करके आत्मशुद्धिके लिये आसनपर बैठकर योगका अभ्यास करे । ( १३ ) काय अर्थात् पीठ, मस्तक और ग्रीवाको सम करके अर्थात् सीधी खड़ी रेखामें निश्चल करके, स्थिर होता हुआ, दिशाओंको याने इधर-उधर न रखकर, अपनी नाककी नोकपर दृष्टि जमाकर, (१४) निडर हो, शांत अंतःकरणसे, ब्रह्मचर्यव्रत पालकर तथा मनका संयम करके, मुझमेंही चित्त लगाकर, मत्परायण होता हुआ युक्त हो कर बैठ जाय । । [ ‘शुद्ध स्थानपर’ और ‘काय, ग्रीवा एवं मस्तकको समकर’ ये शब्द । श्वेताश्वतर उपनिषदके हैं ( श्वे. २. ८, १० ) ; और ऊपरका समस्त वर्णनभी । हठयोगका नहीं है, प्रत्युत पुराने उपनिषदोंमें योगका जो वर्णन है, उससे अधिक । मिलता-जुलता है । हठयोगमें इंद्रियोंका निग्रह बलात्कारसे किया जाता है; पर । आगे इसी अध्यायके २४ वें श्लोकमें कहा है, कि ऐसा न करके “मनसैवेन्द्रिय- । ग्रामं विनियम्य” - मनसेही इंद्रियोंको रोके । इससे प्रकट है, कि गीतामें हठयोग । विवक्षित नहीं है । ऐसेही इसी अध्यायके अंतमें कहा है, कि इस वर्णनका यह

छठा अध्याय ७१५ युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥ नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥ उद्देश्य नहीं, कि कोई अपनी सारी जिंदगी योगाभ्यासमेंही बिता दे । अब इसी योगाभ्यासके फलका अधिक निरूपण करते हैं :- ] (१५) इस प्रकार सदा अपना योगाभ्यास जारी रखनेसे मन काबूमें होकर (कर्म-)योगीको मुझमें रहनेवाली और अंतमें निर्वाणपद अर्थात् मेरे स्वरूपमें लीन करा देनेवाली शांति प्राप्त होती है । [ इस श्लोकमें 'सदा'पदसे प्रतिदिनके २४ घंटोंका मतलब नहीं है । इतनाही अर्थ विवक्षित है, कि प्रतिदिन यथाशक्ति घड़ी-घड़ी भर यह अभ्यास करे (श्लोक १० की टिप्पणी देखो ) । कहा है, कि इस प्रकार योगाभ्यास करता हुआ 'मच्चित्त' और 'मत्परायण' हो; इसका कारण यह है, कि पातंजलयोग मनके निरोध करनेकी एक युक्ति या क्रिया है। इस कसरतसे यदि मन आधीन हो जाय तोभी वह एकाग्र मन भगवानमें न लगाकर और दूसरी बातकी ओरभी लगाया जा सकता है । पर गीताका कथन है, कि एकाग्र चित्तका ऐसा दुरुपयोग न कर, मनकी इस एकाग्रता या समाधि का उपयोग परमेश्वरके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करनेमें होना चाहिये, और ऐसेही यह योग सुखकारक होता है, अन्यथा ये निरे क्लेश हैं; और यही अर्थ आगे २९ वें, ३० वें एवं अध्यायके अंतमें ४७ वें श्लोकमें फिर आया है । परमेश्वरमें निष्ठा न रख जो लोग केवल इंद्रियनिग्रहका योग या कसरत करते हैं, वे लोंगोंको क्लेशप्रद जारण, मारण या वशीकरण वगैरह कर्म करनेमेंही प्रवीण हो जाते हैं । यह अवस्था न केवल गीताकोही, प्रत्युत किसीभी मोक्षमार्गको इष्ट नहीं। अब फिर इस योगक्रियाकाही अधिक स्पष्टीकरण करते हैं :- ] ( १६) हे अर्जुन ! अतिशय खानेवाले या बिलकुल न खानेवालेको, और खूब सोनेवाले अथवा जागरण करनेवालेको ( यह ) योग सिद्ध नहीं होता । ( १७ ) जिसका आहारविहार नियमित है, कर्मोंका आचरण नपा-तुला है और सोना-जागना परिमित है, उसको ( यह ) योग दुःखघातक अर्थात् सुखावह होता है । [ इस श्लोकमें 'योग'से पातंजलयोगकी क्रिया और 'युक्त'से नियमित, नपी-तुली अथवा परिमितका अर्थ है; और आगेभी दो-एक स्थानोंपर योग-से

७१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥ यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युंजतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥ यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥ । पातंजलयोगका ही अर्थ है । तथापि इतनेहीसे यह नहीं समझ लेना चाहिये, कि । इस अध्यायमें पातंजलयोगही स्वतंत्र रीतिसे प्रतिपाद्य है । पहले स्पष्ट बतला । दिया है, कि कर्मयोगको सिद्ध कर लेना जीवनका प्रधान कर्तव्य है, और उसके । साधन मात्रके लिये पातंजलयोगका यह वर्णन है, और इस श्लोकके “कर्मके । उचित आचरण” इन शब्दोंसेभी प्रकट होता है, कि अन्यान्य कर्मोंको न छोड़ते । हुए इस योगका अभ्यास करना चाहिये । अब योगीका थोडा-सा वर्णन करके । समाधि-सुखका स्वरूप बतलाते हैं :— ] (१८) संयत मन जब आत्मामेंही स्थिर हो जाता है, और किसीभी उपभोगकी इच्छा नही रहती, तब कहते हैं, कि वह 'युक्त' हो गया । (१९) वायुरहित स्थानपर रखे हुए दीपककी ज्योति जैसे निश्चल होती है, वही उपमा चित्तको संयत करके योगाभ्यास करनेवाले योगीको दी जाती है । । [ इस उपमाके अतिरिक्त महाभारतमें (शांति. ३००. ३२, ३४) ये । दृष्टान्त हैं—“तेलसे भरे हुए पात्रको जीने परसे ले जानेमें, या तूफानके समय । नावका बचाव करनेमें मनुष्य जैसा 'युक्त' अथवा एकाग्र होता है, योगीका मन । वैसाही एकाग्र रहता है।” कठोपनिषदका “सारथी और रथके घोड़ों”वाला । दृष्टान्त तो प्रसिद्धही है; और यद्यपि वह दृष्टान्त गीतामें स्पष्ट नहीं आया है, । तथापि दूसरे अध्यायके ६७ और ६८ तथा इसी अध्यायका २५ वाँ श्लोक, उस । दृष्टान्तको मनमें रखकरही कहे गये हैं । यद्यपि योगका गीताका पारिभाषिक । अर्थ कर्मयोग है; तथापि उस शब्दके अन्य अर्थभी गीतामें आये हैं। उदाहरणार्थ, । ९. ५ और १०. ७ श्लोकोंमें योगका अर्थ है, “अलौकिक अथवा चाहे जो । करनेकी शक्ति ।” यहभी कह सकते हैं, कि योग शब्दके अनेक अर्थ होनेके । कारणही गीतामें पातंजलयोग या सांख्य-मार्गको प्रतिपाद्य बतलानेकी सुविधा । उन संप्रदायवालोंको मिल गई है । १९ वें श्लोकमें वर्णित चित्तनिरोधरूपी । पातंजलयोगकी समाधिकाही स्वरूप अब विस्तारसे कहते हैं :— ] (२०) योगानुष्ठानसे निरुद्ध चित्त जिस स्थानमें रम जाता है, और जहाँ स्वयं

छठा अध्याय ७१७ सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न ःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२॥ तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥ आत्माको देखकर आत्मामेंही संतुष्ट हो रहता है, (२१) जहाँ ( केवल ) बुद्धिगम्य और इंद्रियोंको अगोचर अत्यंत सुखका उसे अनुभव होता है, और जहाँ वह ( एकबार ) स्थिर हुआ, तो तत्त्वसे कभीभी नहीं डिगता, (२२) ऐसेही जिस स्थितिको पानेसे उसकी अपेक्षा दूसरा कोईभी लाभ उसे अधिक नहीं जँचता, और जहाँ स्थिर होनेसे कोईभी बड़ा भारी दुःख (उसको) वहाँसे बिचला नहीं सकता, (२३) उसको दुःखके स्पर्शसे वियोग अर्थात् 'योग' नामकी स्थिति कहते हैं; और इस 'योग'का आचरण मनको उकताने न देकर निश्चयसे करना चाहिये । | [ इन चारों श्लोकोंका एकही वाक्य है । २३ वें श्लोकके आरंभके | 'उसको' ('तं') इस दर्शक सर्वनामसे पहलेके तीन श्लोकोंका वर्णन उद्दिष्ट है; | और चारों श्लोकोंमें 'समाधि'का वर्णन पूरा किया गया है। पातंजलयोग-सूत्रमें | योगका यह लक्षण दिया है, कि 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' – चित्तकी वृत्तिके | निरोधको योग कहते हैं, उसीके सदृश २० वें श्लोकके आरंभके शब्द हैं । | अब इस 'योग' शब्दका नया लक्षण जानबूझ कर दिया है, कि समाधि इस चित्त- | वृत्तिनिरोधकीही पूर्णावस्था है, और उसीको 'योग' कहते हैं । उपनिषदों और | महाभारतमें कहा है, कि निग्रहकर्ता और उद्योगी पुरुषको सामान्य रीतिसे यह | योग छः महीनोंमें सिद्ध होता है ( मैत्र्यु. ६. २८; अमृतनाद. २९; मभा. अश्व. | अनुगीता १९. ६६ ) । किंतु पहले २० वें और फिर २८ वें श्लोकमें स्पष्ट कह | दिया है, कि पातंजलयोगकी समाधिसे प्राप्त होनेवाला सुख न केवल चित्तनिरोधसे, | प्रत्युत चित्तनिरोधके द्वारा अपने आपके आत्माकी पहचान कर लेनेपर होता है । | इस दुःखरहित स्थितिकोही 'ब्रह्मानंद' या 'आत्मप्रसादज सुख' अथवा 'आत्मानंद' | कहते हैं ( गीता १८. ३७; गीतार. प्र. ९, पृ. २३४ ) । अगले अध्यायोंमें इसका | वर्णन है, कि आत्मज्ञान होनेके लिये आवश्यक चित्तकी यह समता केवल | पातंजलयोगसेही नहीं उत्पन्न होती; किंतु चित्तशुद्धिका यही परिणाम ज्ञान और | भक्तिसेभी हो जाता है, और यही मार्ग अधिक प्रशस्त और सुलभ समझा | जाता है। समाधिका लक्षण बतला चुके; अब बतलाते हैं, कि उसे किस प्रकार | लगाना चाहिये :- ]

७१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥ शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ २५ ॥ यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥ § § प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥ युंजन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥ (२४) संकल्पसे उत्पन्न होनेवाले सब कामों अर्थात् वासनाओंका निःशेष त्यागकर, और मनसेही सब इंद्रियोंका चारों ओरसे संयमकर, (२५) धैर्ययुक्त बुद्धिसे धीरे धीरे शांत होता जावे, और मनको आत्मामें स्थिर करके कोईभी विचार मनमें न आने दे । (२६) (इस रीतिसे चित्तको एकाग्र करते हुए ) चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ-से बाहर जाने लगे, वहाँ-वहाँसे उसको रोककर आत्माकेही आधीन करे । । [ मनकी समाधि लगानेकी क्रियाका यह वर्णन कठोपनिषदमें दी गई । रथकी उपमासे ( कठ. १. ३. ३) अच्छी तरह व्यक्त होता है। जिस प्रकार । उत्तम सारथी रथके घोड़ोंको इधर-उधर न जाने देकर सीधे रास्तेसे ले जाता । है, उसी प्रकारका प्रयत्न मनुष्यको समाधिके लिये करना पड़ता है । जिसने । किसीभी विषयपर अपने मनको स्थिरकर लेनेका अभ्यास किया है, उसकी । समझमें ऊपरवाले श्लोकका मर्म तुरंत आ जावेगा । मनको एक ओर रोके, तो । वह दूसरी ओर खिसक जाता है; और वह आदत रुके बिना समाधि लग नहीं । सकती । अब, इस प्रकार योगाभ्याससे चित्त स्थिर होनेपर जो फल मिलता है, । उसका वर्णन करते हैं :- ] (२७) इस प्रकार शांतचित्त, रजसे रहित, निष्पाप और ब्रह्मभूत (कर्म-)- योगीको उत्तम सुख प्राप्त होता है । (२८) इस रीतिसे निरंतर अपना योगाभ्यास करनेवाला (कर्म-) योगी पापोंसे छूटकर ब्रह्मसंयोगसे प्राप्त होनेवाले अत्यंत सुखका आनंदसे उपभोग करता है । । [ इन दो श्लोकोंमें हमने योगीका अर्थ कर्मयोगी किया है। क्योंकि, । कर्मयोगका साधन समझ करही पातंजलयोगका वर्णन किया गया है; अतः

छठा अध्याय ७१९ § § सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥ सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥ | पातंजलयोगके अभ्यास करनेवाले उक्त पुरुषसे कर्मयोगीही विवक्षित है । तथापि | योगीका अर्थ “ समाधि लगाये बैठा हुआ पुरुष ”भी कर सकते हैं । किंतु स्मरण | रहे, कि गीताका प्रतिपाद्य मार्ग इससेभी परे है । यही नियम अगले दो-तीन | श्लोकोंको लागू है । निर्वाण ब्रह्मसुखका इस प्रकार अनुभव होनेपर सब | प्राणियोंके विषयमें जो आत्मौपम्य-दृष्टि उत्पन्न हो जाती है, उसका अब वर्णन | करते हैं :- ] (२९) (इस प्रकार) जिसका आत्मा योगयुक्त हो गया है, उसकी दृष्टि सम हो जाती है, और उसे सर्वत्र ऐसा दीख पड़ने लगता है, कि मैं सब प्राणियोंमें हूँ और सब प्राणी मुझमें हैं । (३०) जो मुझको (परमेश्वर परमात्मा ) सब स्थानोंमें और सबको मुझमें देखता है, उससे मैं कभी नहीं बिछुड़ता, और न वही मुझसे कभी दूर होता है। | [ इन दो श्लोकोंमें, पहला वर्णन 'आत्मा' शब्दका प्रयोगकर अव्यक्त | अर्थात् आत्म-दृष्टिसे, और दूसरा वर्णन प्रथमपुरुषदर्शक 'मैं' पदके प्रयोगसे | व्यक्त अर्थात् भक्तिदृष्टिसे किया गया है । परंतु अर्थ दोनोंका एकही है ( गीतार. | प्र. १३, पृ. ४३०-४३४ ) । मोक्ष और कर्मयोग, इन दोनोंकाभी आधार यह | ब्रह्मात्मैक्य-दृष्टिही है । २९ वें श्लोकका पहला अर्धांश कुछ फ़र्कसे मनुस्मृति | ( मनु. १२. ९१ ), महाभारत ( शां. २३८. २१; २६८. २२ ) । और | उपनिषदों मेंभी ( कैव. १. १०; ईश. ६ ) पाया जाता है । हमने गीतारहस्यके | १२ वें प्रकरणमें विस्तारसहित दिखलाया है, कि सर्वभूतात्मैक्य-ज्ञानही समग्र | अध्यात्म और कर्मयोगका मूल है ( पृ. ३८७ प्रभृति ) । यह ज्ञान हुए बिना | इंद्रियनिग्रहका सिद्ध हो जानाभी व्यर्थ है; इसीलिये अगले अध्यायसे परमेश्वरका | ज्ञान बतलाना आरंभ कर दिया है । ] (३१) जो एकत्वबुद्धि अर्थात् सर्वभूतात्मैक्यबुद्धिको मनमें रखकर सब प्राणियोंमें रहनेवाले मुझको (परमेश्वरको) भजता है, वह (कर्म-)योगी सब प्रकारसे वर्तता हुआभी मुझमें रहता है।

७२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥ अर्जुन उवाच । § योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥ चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥ (३२) हे अर्जुन ! सुख हो या दुःख, अपने समान औरोंकोभी । जो ऐसी (आत्मौ- पम्य-) दृष्टिसे सर्वत्र समान । देखने लगे, वह (कर्म-) योगी परम अर्थात् उत्कृष्ट माना जाता है। [ "प्राणिमात्रमें एकही आत्मा है" यह दृष्टि सांख्य और कर्मयोग, दोनों मार्गोंमें एक-सी है। ऐसेही पातंजलयोगमेंभी समाधि लगाकर परमेश्वरकी पहचान हो जानेपर यही साम्यावस्था प्राप्त होती है। परंतु सांख्य और पात- जलयोगी, दोनोंकोभी सब कर्मोंका त्याग इष्ट है, अतएव वे व्यवहारमें इस साम्य-बुद्धिके उपयोग करनेका मौकाही नहीं आने देते; और गीताका कर्मयोगी ऐसा न कर, अध्यात्मज्ञानसे प्राप्त हुई इस साम्य-बुद्धिका व्यवहारमेंभी नित्य उपयोग करके, जगतके सभी काम लोकसंग्रहके लिये किया करता है, यही इन दोनोंमें बड़ा भारी भेद है, और इसीसे इस अध्यायके अंतमें (श्लोक ४६) स्पष्ट कहा है, कि तपस्वी अर्थात् पातंजलयोगी, और ज्ञानी अर्थात् सांख्य-मार्गी, इन दोनोंकी अपेक्षा कर्मयोगी श्रेष्ठ है। साम्ययोगके इस वर्णनको सुनकर अब अर्जुनने यह शंका की :- ] अर्जुनने कहा :- (३३) हे मधुसूदन ! साम्यसे अर्थात् साम्य-बुद्धिसे प्राप्त होनेवाला जो यह योग अर्थात् (कर्म-) योग तुमने बतलाया, मैं नहीं देखता, कि (मनकी) चंचलताके कारण वह स्थिर रहेगा । (३४) क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन चंचल, हठीला, बलवान् और दृढ़ है। वायुके समान, अर्थात् हवाकी गठरी बाँधनेके समान, इसका निग्रह करना मुझे अत्यंत दुष्कर दिखता है। [ ३३ वें श्लोकके 'साम्य'मे अथवा 'साम्य-बुद्धि'से प्राप्त होनेवाला, इस विशेषणसे यहाँ योग शब्दका कर्मयोगही अर्थ है। यद्यपि पहले पातंजलयोगकी समाधिका वर्णन आया है, तोभी इस श्लोकमें 'योग' शब्दमे पातंजलयोग विवक्षित नहीं है। क्योंकि, दूसरे अध्यायमें भगवान्नेही कर्मयोगकी ऐसी व्याख्या की है, कि "समत्वं योग उच्यते" (गीता २. ४८) - "बुद्धिकी समता या

छठा अध्याय ७२१ श्रीभगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥ असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥ । समत्वकोही योग कहते हैं।" अस्तु; अर्जुनकी कठिनाईको मान कर भगवान् । अब कहते हैं :- ] श्रीभगवानने कहा :- (३५) हे महाबाहु अर्जुन ! इसमें कुछभी संदेह नहीं, कि मन चंचल है और उसका निग्रह करना कठिन है । परंतु हे कौन्तेय ! अभ्यास और वैराग्यसे उसे आधीन किया जा सकता है। (३६) मेरे मतमें, जिसका अंतःकरण अपने काबूमें नहीं, उसको इस (साम्य-बुद्धिरूप) योगका प्राप्त होना कठिन है। किंतु अंतःकरणको काबूमें रखकर प्रयत्न करते रहनेपर उपायसे (इस योगका) प्राप्त होना संभव है। । [ तात्पर्य, पहले जो बात कठिन दीख पड़ती है, वही अभ्याससे और दीर्घ । उद्योगसे अंतमें सिद्ध हो जाती है। किसीभी कामको बारबार करना 'अभ्यास' । कहलाता है, और 'वैराग्य'का मतलब है राग या प्रीति न रखना, अर्थात् । इच्छाविहीनता। पातंजलयोग-सूत्रमें आरंभमेंही योगका यह लक्षण बतलाया । है, कि 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' - चित्तवृत्तिके निरोधको योग कहते हैं (इसी । अध्यायका २० वाँ श्लोक देखो); और फिर अगले सूत्रमें कहा है, कि "अभ्यास । वैराग्याभ्यां तन्निरोधः" - अभ्यास और वैराग्यसे चित्तवृत्तिका निरोध हो । जाता है। यही शब्द गीतामें आये हैं और अभिप्रायभी वही है; परंतु इतनेहीसे । यह नहीं कहा जा सकता, कि गीतामें ये शब्द पातंजलयोग-सूत्रसे लिये गये हैं । (गीतार. पृ. ५३२)। इस प्रकार, यदि मनोनिग्रह करके समाधि लगाना संभव । हो, और कुछ निग्रही पुरुषोंको छ महिनोंके अभ्याससे यदि यह सिद्धि प्राप्त । हो सकती हो, इसपर तोभी अब यह दूसरी शंका होती है, कि प्रकृति-स्वभावके । कारण अनेक लोग दो-एक जन्मोंमेंभी कर्मयोगकी इस परमावस्थामें नहीं पहुँच । सकते; फिर ऐसे लोग इस सिद्धि क्योंकर पावें? क्योंकि एक जन्ममें, जितना । हो सका, उतना इंद्रियनिग्रहका अभ्यास कर कर्मयोगका आचरण करने लगें, । तो वह मरते समय अधूराही रह जायगा, और अगले जन्ममें फिर पहलेसे । आरंभ करे, तो फिर आगेके जन्ममेंभी वही हाल होगा। अतः अर्जुनका दूसरा । प्रश्न है, कि इस प्रकारके पुरुष क्या करें :-] गी. र. ४६

७२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अर्जुन उवाच । § § अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥ एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥ अर्जुनने कहा :- ( ३७ ) हे कृष्ण ! श्रद्धा (तो) है, परंतु अयति अर्थात् (प्रकृति-स्वभावसे) पूरा प्रयत्न अथवा संयमन नहीं होता, इसलिये जिसका मन (साम्य-बुद्धिरूप कर्मयोगसे बिचल जावे, वह योगसिद्धि न पाकर किस गतिको- जा पहुँचता है ? ( ३८ ) हे महाबाहु श्रीकृष्ण ! यह पुरुष मोहग्रस्त होकर ब्रह्म प्राप्तिके मार्गमें स्थिर न होनेके कारण दोनों ओरसे छूटा हुआ या भ्रष्ट हो जानेपर छिन्न-भिन्न बादलके समान (बीचमेंही) नष्ट तो नहीं हो जाता ? ( ३९ ) हे कृष्ण ! मेरे इस संदेहको तुम्हेंही निःशेष दूर करना चाहिये; तुम्हें छोड़कर इस संदेहको मिटानेवाला दूसरा कोई न मिलेगा। । [यद्यपि नञ् समासमें आरंभके नञ् (अ) पदका साधारण अर्थ । 'अभाव' होता है, तथापि कई बार 'अल्प' अर्थमेंभी उसका प्रयोग हुआ करता । है, इस कारण ३७ वें श्लोकके 'अयति' शब्दका अर्थ "अल्प अर्थात् अधूरा प्रयत्न । या संयम करनेवाला" होता है। ३८वें श्लोकमें जो कहा है, कि "दोनों ओरका । आश्रय छूटा हुआ" अथवा "इतो भ्रष्टस्ततो भ्रष्टः" उसका अर्थभी कर्मयोग- । प्रधानही करना चाहिये। कर्मके दो प्रकारके फल हैं-- (१) काम्य-बुद्धिसे । किंतु शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार कर्म करनेपर स्वर्गकी प्राप्ति होती है, और । निष्काम बुद्धिसे करनेपर वह बंधक न होकर मोक्षदायक हो जाता है। परंतु । इस अधूरे मनुष्यको कर्मके स्वर्ग आदि काम्य-फल नहीं मिलते, क्योंकि उसका । ऐसा हेतुही नहीं रहता; और साम्य-बुद्धि पूर्ण न होनेके कारण उसे मोक्ष मिल । नहीं सकता। इसलिये अर्जुनके मनमें शंका उत्पन्न हुई, कि उस बेचारेको न तो । स्वर्ग मिला और न मोक्षभी - कहीं उसकी ऐसी स्थिति तो नहीं हो जाती, । कि दोनों दिनसे गये पांडे, हलुवा मिले न मांडे ? यह शंका केवल पातंजलयोग- । रूपी कर्मयोगके साधनके लियेही नहीं की जाती। अगले अध्यायोंमें वर्णन है, । कि कर्मयोग-सिद्धिके लिये आवश्यक साम्य-बुद्धि कभी पातंजलयोगसे, कभी । भक्तिसे और कभी ज्ञानसे प्राप्त होती है; और जिस प्रकार पातंजलयोगरूपी

छठा अध्याय ७२३ श्रीभगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥ प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४ ॥ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५ ॥ | यह साधन एकही जन्ममें अधूरा रह सकता है, उसी प्रकार भक्ति या ज्ञानरूपी | साधनभी एक जन्ममें अपूर्ण रह सकते हैं। अतएव कहना चाहिये, कि अर्जुनके | उक्त प्रश्नका भगवानने जो उत्तर दिया है, वह कर्मयोग-मार्गके सभी साधनोंको | साधारण रीतिसेही उपयुक्त हो सकता है ] श्रीभगवानने कहा :- ( ४० ) हे पार्थ ! क्या इस लोकमें और क्या परलोकमें, ऐसे पुरुषका कभी विनाश होताही नहीं। क्योंकि हे तात ! कल्याणकारक कर्म करनेवाले किसीभी पुरुषकी दुर्गति नहीं होती । ( ४१ ) पुण्यकर्ता पुरुषोंको मिलने- वाले ( स्वर्ग आदि ) लोकोंको पाकर और ( वहाँ ) बहुत वर्षोंतक निवास करके फिर यह योग-भ्रष्ट अर्थात् कर्मयोगसे भ्रष्ट पुरुष पवित्र श्रीमान् लोगोंके घरमें जन्म लेता है; ( ४२ ) अथवा बुद्धिमान् (कर्म-)योगियोंकेही कुलमें जन्म पाता है। इस प्रकारके जन्म ( इस ) लोकमें बड़े दुर्लभ हैं। ( ४३ ) उसमें अर्थात् इस प्रकारसे प्राप्त हुए जन्ममें वह पूर्व-जन्मके बुद्धि-संस्कारको पाता है; और हे कुरुनंदन ! वह उससे भूयः अर्थात् अधिक ( योग ) सिद्धि पानेका प्रयत्न करता है। ( ४४ ) अपने पूर्वजन्मके उस अभ्याससेही अवश अर्थात् अपनी इच्छा न रहने- परभी, वह ( पूर्ण सिद्धिकी ओर ) खींचा जाता है। जिसे (कर्म-)योगकी जिज्ञासा अर्थात् ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छा हो गई है, वहभी शब्दब्रह्मके परे चला जाता है। ( ४५ ) ( इस प्रकार ) प्रयत्नपूर्वक उद्योग करते करते पापोंसे शुद्ध होता हुआ

७२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (कर्म-)योगी अनेक जन्मोंके अनन्तर सिद्धि पाकर अंतमें उत्तम गति पा लेता है ! । [ इन श्लोकोंमें योग, योगभ्रष्ट और योगी शब्द, कर्मयोग, कर्मयोगसे भ्रष्ट और कर्मयोगीके अर्थमेंही व्यवहृत हैं । क्योंकि श्रीमान् कुलमें जन्म लेनेकी स्थिति दूसरोंको इष्ट होना संभवही नहीं है । भगवान् कहते हैं, कि पहलेसे, जितना हो सके उतना, शुद्ध-बुद्धिसे कर्मयोगका आचरण करना आरंभ करे । थोड़ा-ही क्यों न हो, पर इस रीतिसे जो कर्म किया जावेगा, वही इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें, इस प्रकार अधिक अधिक सिद्धि मिलनेके लिये उत्तरोत्तर कारणीभूत होगा, और उसीसे अंतमें पूर्ण सद्गति मिलती है । “ इस धर्मका थोड़ा-साभी आचरण किया जाय, तो वह बड़े भयसे रक्षा करता है” (गीता २. ४०), और “अनेक जन्मोंके पश्चात् वासुदेवकी प्राप्ति होती है” (७. १९), ये श्लोक इसी सिद्धान्तके पूरक हैं । अधिक विवेचन गीतारहस्यके प्र. १०, पृ. २८४-२८७में किया गया है । ४४ वें श्लोकके शब्दब्रह्मका अर्थ है “वैदिक यज्ञाग आदि काम्यकर्म” क्योंकि ये कर्म वेदविहित हैं, और वेदोंपर श्रद्धा रखकरही किये जाते हैं; तथा वेद अर्थात् सब सृष्टिके पहलेका शब्द याने शब्दब्रह्म है । प्रत्येक मनुष्य पहले पहल सभी कर्म काम्य-बुद्धिसे-ही किया करता है; परंतु इस कर्मसे जैसे जैसे चित्तशुद्धि हो जाती है, वैसे वैसे आगे निष्काम- बुद्धिसे कर्म करनेकी इच्छा होती है । इसीसे उपनिषदोंमें और महाभारतमेंभी (मैत्र्यु. ६. २२; अमृतबिंदु. १७; महा. शां. २३१. ६३; २६९. १) यह वर्णन है, कि :- द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ “जानना चाहिये, कि ब्रह्म दो प्रकारका है; एक शब्दब्रह्म और दूसरा उससे परेका (निर्गुण) । शब्दब्रह्ममें निष्णात हो जानेपर फिर उससे परेका (निर्गुण) ब्रह्म प्राप्त होता है ।” शब्दब्रह्मके काम्यकर्मोंसे उकता कर अंतमें लोकसंग्रहके अर्थ उन्हीं कर्मोंको करानेवाले कर्मयोगकी इच्छा होती है और फिर इस निष्काम कर्मयोगका थोड़ाबहुत आचरण पहले पहल होने लगता है । “अनन्तर स्वल्पारम्भाः क्षेमकराः”के न्यायसे यही थोड़ा-सा आचरण उस मनुष्यको इस मार्गमें धीरे धीरे आगे खींचता जाता है; और अंतमें क्रम-क्रमसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त करा देता है । ४४ वें श्लोकमें जो यह कहा है, कि “कर्मयोगकी इच्छा होनेसेभी वह शब्दब्रह्मके परे चला जाता है” उसका तात्पर्यभी यही है । क्योंकि यह जिज्ञासा कर्मयोगरूपी कोल्हूका मुँह है; और एक बार इस कोल्हूके मुँहमें चले जानेपर फिर इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें, कभी न कभी पूर्ण सिद्धि मिलती है । और वह शब्दब्रह्मसे परेके ब्रह्मके ब्रह्मतक पहुँचेबिना नहीं रहता । पहले पहल जान पड़ता है, कि यह सिद्धि जनक आदिको एक-ही जन्ममें

छठा अध्याय ७२५

§ § तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६ ॥

| मिल गई होगी; परंतु तात्त्विक दृष्टिसे देखनेपर, चलता है, कि उन्हेंभी यह | फल जन्मजन्मान्तरके पूर्वसंस्कारसेही मिला होगा । अस्तु; कर्मयोगका थोड़ा-सा | आचरण, यहाँतक कि जिज्ञासाभी इस रीतिसे सदैव कल्याणकारक है, इसके | अतिरिक्त अंतमें मोक्षप्राप्तिभी निःसंदेह इसीसे होती है; अतः अब भगवान् | अर्जुनसे कहते हैं, कि :- ] (४६) तपस्वी लोगोंकी अपेक्षा (कर्म-)योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानी पुरुषोंकी अपेक्षाभी श्रेष्ठ है, और कर्मकांडवालोंकी अपेक्षाभी श्रेष्ठ समझा जाता है; इसलिये हे अर्जुन ! तू योगी अर्थात् कर्मयोगी हो । | [ जंगलमें जाकर उपवास आदि शरीरको क्लेशदायक व्रतोंसे अथवा | हठयोगके साधनोंसे सिद्धि पानेवाले लोगोंको इस श्लोकमें तपस्वी कहा है, | और सामान्य रीतिसेभी इस शब्दका यही अर्थ है । " ज्ञानयोगेन सांख्यानां " | (गीता. ३. ३) में वर्णित, ज्ञानसे अर्थात् सांख्य-मार्गसे कर्म छोड़कर सिद्धि | प्राप्तकर लेनेवाले सांख्यनिष्ठ लोगोंको ज्ञानी माना है। इसी प्रकार गीता | २. ४२-४४ और ९. २०, २१ में वर्णित निरे काम्य-कर्म करनेवाले स्वर्गपरायण | कर्मठ मीमांसकोंको कर्मी कहा है। इन तीनों पंथोंमेसे प्रत्येक यही कहता है, | कि हमारे मार्गसेही सिद्धि मिलती है। किंतु अब गीताका यह कथन है, कि | तपस्वी हो, चाहे कर्मठ मीमांसक हो या ज्ञाननिष्ठ सांख्य हो, इनमें प्रत्येककी | अपेक्षा कर्मयोगी – अर्थात् कर्मयोग-मार्गभी – श्रेष्ठ है ! और पहले यही सिद्धान्त | "अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ०" (गीता. ३. ८), एवं "कर्मसंन्यासकी अपेक्षा | कर्मयोग विशेष०" (गीता ५. २) इत्यादि श्लोकोंमें वर्णित है (गीतार. | प्र. ११, पृ. ३०९, ३१०)। और तो क्या, तपस्वी, मीमांसक अथवा ज्ञान- | मार्गी इनमेंसे प्रत्येककी अपेक्षा कर्मयोगी श्रेष्ठ है, 'इसीलिये' पीछे जिस प्रकार | अर्जुनको उपदेश किया है, कि "योगस्थ होकर कर्म कर" (गीता २. ४८; | गीतार. प्र. ३, पृ. ५८), अथवा "योगका आश्रय करके खड़ा हो" (४. ४२), | उसी प्रकार यहाँभी फिर स्पष्ट उपदेश किया है, कि "तू (कर्म-)योगी | हो।" यदि इस प्रकार कर्मयोगको श्रेष्ठ न मानें, तो "तस्मात् तू योगी हो" | इस उपदेशका 'तस्मात् = इसलिये' पद निरर्थक हो जावेगा । किंतु संन्यास-मार्गके | टीकाकारोंको यह सिद्धान्त कैसे स्वीकृत हो सकता है? अतः उन लोगोंने 'ज्ञानी' | शब्दका अर्थ बदल दिया है, और वे कहते हैं, कि ज्ञानी शब्दका अर्थ केवल | शब्दज्ञानी है, अथवा वे लोग, कि जो सिर्फपुस्तकें पढ़कर ज्ञानकी लंबी-चौड़ी

७२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे ध्यानयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ | बातें छाँटा करते हैं । किंतु यह अर्थ निरे सांप्रदायिक आग्रहका है । ये टीकाकार | गीताके इस अर्थको नहीं चाहते, कि कर्म छोड़नेवाले ज्ञान-मार्गको गीता कम | दर्जेका समझती है । क्योंकि उससे उनके संप्रदायको गौणता प्राप्त होती है । | और इसीलिये “ कर्मयोगो विशिष्यते ” काभी (गीता ५. २ ) अर्थ उन्होंने | बदल दिया है । परंतु इसका पूरा पूरा विचार गीतारहस्यके ११ वें प्रकरणमें | कर चुके हैं; अतः इस श्लोकका जो अर्थ हमने किया है, उसके विषयमें यहाँ | अधिक चर्चा नहीं करते । हमारे मतमें यह निर्विवाद है, कि गीताके अनुसार | कर्म-योगमार्गही सबमें श्रेष्ठ है । अब आगेके श्लोकमें बतलाते हैं, कि कर्म- | योगियोंमेंभी कौन-सा तारतम्य भाव देखना पड़ता है :- ] ( ४७ ) तथापि सब (कर्म-) योगियोंमेंभी मैं उसेही सबसे उत्तम युक्त अर्थात् उत्तम सिद्ध कर्मयोगी समझता हूँ, कि जो मुझमें अंतःकरण रख कर श्रद्धासे मुझको भजता है । | [ इस श्लोकका यह भावार्थ है, कि कर्मयोगमेंभी भक्तिका प्रेमपूरित | मेल हो जानेसे वह योगी भगवान्को अत्यन्त प्रिय हो जाता है। इसका यह अर्थ | नहीं है, कि निष्काम कर्मयोगकी अपेक्षाभी भक्ति श्रेष्ठ है । क्योंकि आगे बारहवें | अध्यायमें भगवान्नेही स्पष्ट कह दिया है, कि ध्यानकी अपेक्षा कर्मफलत्याग | श्रेष्ठ है ( गीता. १२. १२ ) । निष्काम कर्म और भक्तिके समुच्चयको श्रेष्ठ | कहना एक बात है, और सब निष्काम कर्मयोगको व्यर्थ कहकर, भक्तिहीको | श्रेष्ठ बतलाना दूसरी बात है । गीताका सिद्धान्त पहले ढंगका है और भागवत- | पुराणका पक्ष दूसरे ढंगका है । सब प्रकारके क्रियायोगको आत्मज्ञान-विघातक | निश्चितकर भागवत के ( भाग. १. ५. ३४ ) पहले और फिर अंतिम स्कंधमेंभी | कहा है :- | नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम् । | नैष्कर्म्य अर्थात् निष्काम कर्मभी ( भाग. ११. ३. ४६ ) बिना भगवद्भक्तिके | शोभा नहीं देता, वह व्यर्थ है ( भाग. १. ५. १२; १२. १२. ५२ ) इससे | व्यक्त होगा, कि भागवतकारका ध्यान केवल भक्तिकेही ऊपर होनेके कारण | वे विशेष प्रसंगपर भगवद्गीताकेभी आगे कैसी चौकड़ी भरते हैं। जिस पुराणका

छठा अध्याय ७२७

| निरूपण इस समझसे किया गया है, कि महाभारतमें, और फलतः गीतामेंभी | भक्तिका जैसा वर्णन होना चाहिये, वैसा नहीं हुआ; उसमें यदि उक्त वचनोंके | समान औरभी कुछ बातें मिलें, तो कोई आश्चर्य नहीं। पर हमें तो गीताका | तात्पर्य देखना है; न कि भागवतका कथन। दोनोंका प्रयोजन और समयभी | भिन्न भिन्न हैं, इस कारण बात-बातमें उनकी एकवाक्यता करना उचित नहीं है। | अस्तु; कर्मयोगकी साम्य-बुद्धि प्राप्त करनेके लिये जिन साधनोंकी आवश्यकता | है, उनमेंसे पातंजलयोगके साधनोंका इस अध्यायमें निरूपण किया गया। ज्ञान | और भक्ति ये अन्य साधन है; और अगले अध्यायसे उनके निरूपणका आरंभ | होगा।] | इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें | ब्रह्मविद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके, | संवादमें, ध्यानयोग नामक छठा अध्याय समाप्त हुआ।