भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 762

छठा अध्याय ७१७ सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न ःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२॥ तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥ आत्माको देखकर आत्मामेंही संतुष्ट हो रहता है, (२१) जहाँ ( केवल ) बुद्धिगम्य और इंद्रियोंको अगोचर अत्यंत सुखका उसे अनुभव होता है, और जहाँ वह ( एकबार ) स्थिर हुआ, तो तत्त्वसे कभीभी नहीं डिगता, (२२) ऐसेही जिस स्थितिको पानेसे उसकी अपेक्षा दूसरा कोईभी लाभ उसे अधिक नहीं जँचता, और जहाँ स्थिर होनेसे कोईभी बड़ा भारी दुःख (उसको) वहाँसे बिचला नहीं सकता, (२३) उसको दुःखके स्पर्शसे वियोग अर्थात् 'योग' नामकी स्थिति कहते हैं; और इस 'योग'का आचरण मनको उकताने न देकर निश्चयसे करना चाहिये । | [ इन चारों श्लोकोंका एकही वाक्य है । २३ वें श्लोकके आरंभके | 'उसको' ('तं') इस दर्शक सर्वनामसे पहलेके तीन श्लोकोंका वर्णन उद्दिष्ट है; | और चारों श्लोकोंमें 'समाधि'का वर्णन पूरा किया गया है। पातंजलयोग-सूत्रमें | योगका यह लक्षण दिया है, कि 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' – चित्तकी वृत्तिके | निरोधको योग कहते हैं, उसीके सदृश २० वें श्लोकके आरंभके शब्द हैं । | अब इस 'योग' शब्दका नया लक्षण जानबूझ कर दिया है, कि समाधि इस चित्त- | वृत्तिनिरोधकीही पूर्णावस्था है, और उसीको 'योग' कहते हैं । उपनिषदों और | महाभारतमें कहा है, कि निग्रहकर्ता और उद्योगी पुरुषको सामान्य रीतिसे यह | योग छः महीनोंमें सिद्ध होता है ( मैत्र्यु. ६. २८; अमृतनाद. २९; मभा. अश्व. | अनुगीता १९. ६६ ) । किंतु पहले २० वें और फिर २८ वें श्लोकमें स्पष्ट कह | दिया है, कि पातंजलयोगकी समाधिसे प्राप्त होनेवाला सुख न केवल चित्तनिरोधसे, | प्रत्युत चित्तनिरोधके द्वारा अपने आपके आत्माकी पहचान कर लेनेपर होता है । | इस दुःखरहित स्थितिकोही 'ब्रह्मानंद' या 'आत्मप्रसादज सुख' अथवा 'आत्मानंद' | कहते हैं ( गीता १८. ३७; गीतार. प्र. ९, पृ. २३४ ) । अगले अध्यायोंमें इसका | वर्णन है, कि आत्मज्ञान होनेके लिये आवश्यक चित्तकी यह समता केवल | पातंजलयोगसेही नहीं उत्पन्न होती; किंतु चित्तशुद्धिका यही परिणाम ज्ञान और | भक्तिसेभी हो जाता है, और यही मार्ग अधिक प्रशस्त और सुलभ समझा | जाता है। समाधिका लक्षण बतला चुके; अब बतलाते हैं, कि उसे किस प्रकार | लगाना चाहिये :- ]