भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 761

७१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥ यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युंजतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥ यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥ । पातंजलयोगका ही अर्थ है । तथापि इतनेहीसे यह नहीं समझ लेना चाहिये, कि । इस अध्यायमें पातंजलयोगही स्वतंत्र रीतिसे प्रतिपाद्य है । पहले स्पष्ट बतला । दिया है, कि कर्मयोगको सिद्ध कर लेना जीवनका प्रधान कर्तव्य है, और उसके । साधन मात्रके लिये पातंजलयोगका यह वर्णन है, और इस श्लोकके “कर्मके । उचित आचरण” इन शब्दोंसेभी प्रकट होता है, कि अन्यान्य कर्मोंको न छोड़ते । हुए इस योगका अभ्यास करना चाहिये । अब योगीका थोडा-सा वर्णन करके । समाधि-सुखका स्वरूप बतलाते हैं :— ] (१८) संयत मन जब आत्मामेंही स्थिर हो जाता है, और किसीभी उपभोगकी इच्छा नही रहती, तब कहते हैं, कि वह 'युक्त' हो गया । (१९) वायुरहित स्थानपर रखे हुए दीपककी ज्योति जैसे निश्चल होती है, वही उपमा चित्तको संयत करके योगाभ्यास करनेवाले योगीको दी जाती है । । [ इस उपमाके अतिरिक्त महाभारतमें (शांति. ३००. ३२, ३४) ये । दृष्टान्त हैं—“तेलसे भरे हुए पात्रको जीने परसे ले जानेमें, या तूफानके समय । नावका बचाव करनेमें मनुष्य जैसा 'युक्त' अथवा एकाग्र होता है, योगीका मन । वैसाही एकाग्र रहता है।” कठोपनिषदका “सारथी और रथके घोड़ों”वाला । दृष्टान्त तो प्रसिद्धही है; और यद्यपि वह दृष्टान्त गीतामें स्पष्ट नहीं आया है, । तथापि दूसरे अध्यायके ६७ और ६८ तथा इसी अध्यायका २५ वाँ श्लोक, उस । दृष्टान्तको मनमें रखकरही कहे गये हैं । यद्यपि योगका गीताका पारिभाषिक । अर्थ कर्मयोग है; तथापि उस शब्दके अन्य अर्थभी गीतामें आये हैं। उदाहरणार्थ, । ९. ५ और १०. ७ श्लोकोंमें योगका अर्थ है, “अलौकिक अथवा चाहे जो । करनेकी शक्ति ।” यहभी कह सकते हैं, कि योग शब्दके अनेक अर्थ होनेके । कारणही गीतामें पातंजलयोग या सांख्य-मार्गको प्रतिपाद्य बतलानेकी सुविधा । उन संप्रदायवालोंको मिल गई है । १९ वें श्लोकमें वर्णित चित्तनिरोधरूपी । पातंजलयोगकी समाधिकाही स्वरूप अब विस्तारसे कहते हैं :— ] (२०) योगानुष्ठानसे निरुद्ध चित्त जिस स्थानमें रम जाता है, और जहाँ स्वयं