भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 760

छठा अध्याय ७१५ युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥ नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥ उद्देश्य नहीं, कि कोई अपनी सारी जिंदगी योगाभ्यासमेंही बिता दे । अब इसी योगाभ्यासके फलका अधिक निरूपण करते हैं :- ] (१५) इस प्रकार सदा अपना योगाभ्यास जारी रखनेसे मन काबूमें होकर (कर्म-)योगीको मुझमें रहनेवाली और अंतमें निर्वाणपद अर्थात् मेरे स्वरूपमें लीन करा देनेवाली शांति प्राप्त होती है । [ इस श्लोकमें 'सदा'पदसे प्रतिदिनके २४ घंटोंका मतलब नहीं है । इतनाही अर्थ विवक्षित है, कि प्रतिदिन यथाशक्ति घड़ी-घड़ी भर यह अभ्यास करे (श्लोक १० की टिप्पणी देखो ) । कहा है, कि इस प्रकार योगाभ्यास करता हुआ 'मच्चित्त' और 'मत्परायण' हो; इसका कारण यह है, कि पातंजलयोग मनके निरोध करनेकी एक युक्ति या क्रिया है। इस कसरतसे यदि मन आधीन हो जाय तोभी वह एकाग्र मन भगवानमें न लगाकर और दूसरी बातकी ओरभी लगाया जा सकता है । पर गीताका कथन है, कि एकाग्र चित्तका ऐसा दुरुपयोग न कर, मनकी इस एकाग्रता या समाधि का उपयोग परमेश्वरके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करनेमें होना चाहिये, और ऐसेही यह योग सुखकारक होता है, अन्यथा ये निरे क्लेश हैं; और यही अर्थ आगे २९ वें, ३० वें एवं अध्यायके अंतमें ४७ वें श्लोकमें फिर आया है । परमेश्वरमें निष्ठा न रख जो लोग केवल इंद्रियनिग्रहका योग या कसरत करते हैं, वे लोंगोंको क्लेशप्रद जारण, मारण या वशीकरण वगैरह कर्म करनेमेंही प्रवीण हो जाते हैं । यह अवस्था न केवल गीताकोही, प्रत्युत किसीभी मोक्षमार्गको इष्ट नहीं। अब फिर इस योगक्रियाकाही अधिक स्पष्टीकरण करते हैं :- ] ( १६) हे अर्जुन ! अतिशय खानेवाले या बिलकुल न खानेवालेको, और खूब सोनेवाले अथवा जागरण करनेवालेको ( यह ) योग सिद्ध नहीं होता । ( १७ ) जिसका आहारविहार नियमित है, कर्मोंका आचरण नपा-तुला है और सोना-जागना परिमित है, उसको ( यह ) योग दुःखघातक अर्थात् सुखावह होता है । [ इस श्लोकमें 'योग'से पातंजलयोगकी क्रिया और 'युक्त'से नियमित, नपी-तुली अथवा परिमितका अर्थ है; और आगेभी दो-एक स्थानोंपर योग-से