भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 759

७१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युंज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥ । पातंजलयोग इस अध्यायमें वर्णित है; और उतनेहीके लिये एकान्तवासभी । आवश्यक है । प्रकृति-स्वभावके कारण संभव नहीं, कि सभीको पातंजलयोगकी । समाधि एकही जन्ममें सिद्ध हो जाय । इसी अध्यायके अंतमें भगवानने कहा है, । कि जिन पुरुषोंको समाधिसिद्ध नहीं हुई है, वे अपनी सारी आयु पातंजल- । योगमेंही न बिता दें, किंतु जितना हो सके उतना, बुद्धिको स्थिर करके । कर्मयोगका आचरण करते जावें, उसीसे अनेक जन्मोंमें उनको अंतमें सिद्धि । मिल जायगी । ( गीतार. प्र. १०, पृ. २८४-२८७ ) । (११) पहले दर्भ, फिर मृगछाला, और उसपर फिर वस्त्र बिछाकर योगाभ्यासी पुरुष शुद्ध स्थानपर अपना स्थिर आसन लगावे, जो कि न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा भी, (१२) वहाँ चित्त और इंद्रियोंके व्यापार रोककर तथा मनको एकाग्र करके आत्मशुद्धिके लिये आसनपर बैठकर योगका अभ्यास करे । ( १३ ) काय अर्थात् पीठ, मस्तक और ग्रीवाको सम करके अर्थात् सीधी खड़ी रेखामें निश्चल करके, स्थिर होता हुआ, दिशाओंको याने इधर-उधर न रखकर, अपनी नाककी नोकपर दृष्टि जमाकर, (१४) निडर हो, शांत अंतःकरणसे, ब्रह्मचर्यव्रत पालकर तथा मनका संयम करके, मुझमेंही चित्त लगाकर, मत्परायण होता हुआ युक्त हो कर बैठ जाय । । [ ‘शुद्ध स्थानपर’ और ‘काय, ग्रीवा एवं मस्तकको समकर’ ये शब्द । श्वेताश्वतर उपनिषदके हैं ( श्वे. २. ८, १० ) ; और ऊपरका समस्त वर्णनभी । हठयोगका नहीं है, प्रत्युत पुराने उपनिषदोंमें योगका जो वर्णन है, उससे अधिक । मिलता-जुलता है । हठयोगमें इंद्रियोंका निग्रह बलात्कारसे किया जाता है; पर । आगे इसी अध्यायके २४ वें श्लोकमें कहा है, कि ऐसा न करके “मनसैवेन्द्रिय- । ग्रामं विनियम्य” - मनसेही इंद्रियोंको रोके । इससे प्रकट है, कि गीतामें हठयोग । विवक्षित नहीं है । ऐसेही इसी अध्यायके अंतमें कहा है, कि इस वर्णनका यह