भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 758, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 758

छठा अध्याय ७१३ ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः ॥ ८ ॥ सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ ॥ § § योगी युंजीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१० ॥ (८) जिसका आत्मा ज्ञान और विज्ञानसे अर्थात् विविध ज्ञानसे तृप्त हो जाय, जो अपनी इंद्रियोंको जीत ले, जो कूटस्थ अर्थात् मूलमें जा पहुँचे और मिट्टी, पत्थर एवं सोनेको एक-सा मानने लगे, उसी (कर्म-)योगी पुरुषको 'युक्त' अर्थात् सिद्धा- वस्थाको पहुँचा हुआ कहते हैं। (९) सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष करनेयोग्य और बांधवोंके विषयमें, एवं साधु तथा दुष्ट लोगोंके विषयमेंभी जिसकी बुद्धि सम हो गयी हो, वही ( पुरुष ) विशेष योग्यताका है। । [ प्रत्युपकारकी इच्छा न रखकर सहायता करनेवाले स्नेहीको सुहृद् । कहते हैं; जब दो दल हो जायें, तब किसीकीभी बुराई-भलाई न चाहनेवालेको । उदासीन कहते है; दोनों दलोंकी भलाई चाहनेवालेको मध्यस्थ कहते हैं; और । संबंधीको बंधु कहते हैं - टीकाकारोंने ऐसेही अर्थ किये हैं। परंतु इन अर्थोंसे । कुछ भिन्न अर्थभी कर सकते हैं। क्योंकि, इन शब्दोंका प्रयोग प्रत्येकमें कुछ । भिन्न अर्थ दिखलानेके लियेही नहीं किया गया है, किंतु अनेक शब्दोंकी यह योजना । सिर्फ इसीलिये की जाती है, कि सबके मेलसे व्यापक अर्थका बोध हो जाय, उसमें । कुछभी न्यूनता न रहने पावे। इस प्रकार संक्षेपसे बतला दिया, कि योगी, योगारूढ । या युक्त किसे कहना चाहिये ( गीता २. ६१; ४. १८, ५. २३ ), और यहभी । बतला दिया, कि इस कर्मयोगको सिद्ध कर लेनेके लिये प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है, । उसके लिये किसीका मुँह जोहनेकी कोई ज़रूरत नहीं। अब कर्मयोगकी सिद्धिके । लिये अपेक्षित साधनका निरूपण करते हैं :- ] (१०) योगी अर्थात् कर्मयोगी एकान्तमें अकेला रहकर चित्त और आत्माका संयम करे, किसीभी काम्यवासनाको न रख, परिग्रह अर्थात् पाश छोड़करके निरंतर अपने योगाभ्यासमे लगा रहे। । [ अगले श्लोकसे स्पष्ट होता है, कि यहांपर 'युंजीत'पदसे पातंजल- । सूत्रका योग विवक्षित है। तथापि इसका यह अर्थ नहीं, कि कर्मयोगको प्राप्त । कर लेनेकी इच्छा करनेवाला पुरुष अपनी समस्त आयु पातंजलयोगमें बिता । दे। कर्मयोगके लिये आवश्यक साम्य-बुद्धिको प्राप्त करनेके लिये साधनस्वरूप

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 758, कुल 956 में से · BharatKosha