श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥ । न हो, उसको जीत कर आत्मोन्नति कर लेना हरएकके बलवती बसकी बात है । (गीतार. प्र. १०, पृ. २८०-२८४)। मनमें इस तत्त्वके भली भाँति जम जानेके । लियेही एक बार अन्वयसे और फिर व्यतिरेकसे, दोनों रीतियोंसे, वर्णन किया । है, कि आत्मा अपनाही मित्र कब होता है और आत्मा अपना शत्रु कब हो जाता । है; और यही तत्त्व फिर १३. २८ श्लोकमेंभी आया है। संस्कृतमें 'आत्मा' । शब्दके ये तीन अर्थ होते हैं- (१) अंतरात्मा, (२) मैं स्वयं, और (३) । अंतःकरण या मन; इसीसे यह आत्मा शब्द इस श्लोकमें और अगले श्लोकोंमें । अनेक बार आया है। अब बतलाते हैं, कि आत्माको अपने अधीन रखनेसे क्या । फल मिलता है :- ] (७) जिसने अपने आत्मा अर्थात् अंतःकरणको जीत लिया हो और जिसे शांति प्राप्त हो गई हो, उसका 'परमात्मा' शीत-उष्ण, सुख-दुःख और मान-अपमानमें समाहित अर्थात् सम एवं स्थिर रहता है। । [ इस श्लोकमें 'परमात्मा' शब्द आत्माके लियेही प्रयुक्त है। देहका । आत्मा सामान्यतः सुख-दुःखकी उपाधिमें मग्न रहता है; परंतु इंद्रियसंयमसे । उपाधियोंको जीत लेनेपर यही आत्मा प्रसन्न हो करके परमात्मरूपी या । परमेश्वरस्वरूपी बना करता है। परमात्मा कुछ आत्मासे विभिन्न स्वरूपका । पदार्थ नहीं है, और आगे गीतामेंही (गीता १३. २२, ३१) कहा है, कि । मानवी शरीरमें रहनेवाला आत्माही तत्त्वतः परमात्मा है। महाभारतमेंभी यह । वर्णन है :- ] । आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । । तैरेव विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ । “प्राकृत अथवा प्रकृतिके गुणोंसे (सुख-दुःख आदि विकारोंसे) बद्ध रहनेके । कारण आत्माकोही क्षेत्रज्ञ या शरीरका जीवात्मा कहते हैं; और इन गुणोंसे । मुक्त होनेपर वही परमात्मा हो जाता है” (मभा. शां. १८७. २४)। गीता- । रहस्यके ९ वें प्रकरणसे ज्ञात होगा, कि अद्वैत वेदान्तका सिद्धान्तभी यही है। । जो कहते हैं, कि गीतामें अद्वैत मतका प्रतिपादन नहीं है; विशिष्टाद्वैत या शुद्ध । द्वैतही गीताको ग्राह्य है, वे 'परमात्मा'को एक पद न मान 'पर' और 'आत्मा' । ऐसे दो पद करके 'पर'को 'समाहितः' का क्रियाविशेषण समझते हैं! यह अर्थ । क्लिष्ट है; परंतु इस उदाहरणसे समझमें आ जावेगा, कि सांप्रदायिक टीकाकार । अपने मतके अनुसार गीताकी कैसी खींचातानी करते हैं।]