श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 756, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय ७११ यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥ § § उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥ बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥ | छोड़ देने चाहिये, और ऐसा कहनेका उद्देश्यभी नहीं है । अतएव अवसर पाकर | किसी ढंगसे गीताके बीचकेही किसी श्लोकका संन्यास-प्रधान अर्थ लगाना उचित | नहीं है । आजकल गीता बहुतेरोंको दुर्बोध-सी हो गई है, उसका कारणभी | यही है । अगले श्लोककी व्याख्यामें यही अर्थ व्यक्त होता है, कि योगारूढ | पुरुषको कर्म करने चाहिये । वह श्लोक इस प्रकार है :- ] (४) क्योंकि, जब वह इंद्रियोंके ( शब्द स्पर्श आदि ) विषयोंमें और कर्मोंमें अनुषक्त नहीं होता तथा सब संकल्प अर्थात् काम्यबुद्धिरूप फलाशाका ( प्रत्यक्ष कर्मोंका नहीं ) संन्यास करता है, तब उसको योगारूढ कहते हैं । | [ कह सकते हैं, कि यह श्लोक पिछले श्लोकके साथ और पहलेके तीनों | श्लोकोंके साथभी मिला हुआ है । इससे गीताका यह अभिप्राय स्पष्ट होता है, | कि योगारूढ पुरुषको कर्म न छोड़कर केवल फलाशा या काम्य-बुद्धि छोड़करके | शांत चित्तसे निष्काम कर्म करने चाहिये । 'संकल्पका संन्यास' ये शब्द ऊपर | दूसरे श्लोकमें आये हैं, वहाँ इनका जो अर्थ है, वही इस श्लोकमेंभी लेना चाहिये । | कर्मयोगमेंही फलाशात्यागरूपी संन्यासका समावेश होता है; और फलाशा छोड़- | कर कर्म करनेवाले पुरुषकोही सच्चा संन्यासी और योगी अर्थात् योगारूढ कहना | चाहिये । अब यह बतलाते हैं, कि इस प्रकारके निष्काम कर्मयोग या फलाशा- | संन्यासकी सिद्धि प्राप्त कर लेना प्रत्येक मनुष्यके अधिकारमें है, जो स्वयं प्रयत्न | करेगा उसे इसकी प्राप्ति हो जाना कुछ असंभव नहीं :- ] (५) ( मनुष्य ) अपना उद्धार आपही करे । अपने आपको ( कभीभी ) गिरने न दे । क्योंकि ( प्रत्येक मनुष्य ) स्वयंही अपना बंधु ( अर्थात् सहायक ), या स्वयंही अपना शत्रु है । (६) जिसने अपने आपको जीत लिया, वह स्वयं अपना बंधु है; परंतु जो अपने आपको नहीं पहचानता, वह स्वयं अपने साथ शत्रुके समान वैर करता है । | [ इन दो श्लोकोंमें आत्मस्वतंत्रताका वर्णन है, और इस तत्त्वका प्रतिपादन | है, कि हरएकको अपना उद्धार आपही करना चाहिये, और प्रकृति कितनीभी क्यों