श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । शब्द बिलकुलही निरर्थक हो जाता है। 'कारण' शब्द सदैव सापेक्ष है। 'कारण' । कहनेसे उसको कुछ-न-कुछ 'कार्य' अवश्य चाहिये और संन्यास-मार्गके अनुसार । योगारूढको तो कोईभी 'कार्य' नहीं रह जाता। यदि शमको मोक्षका 'कारण' । अर्थात् साधन कहें, तो मेल नहीं मिलता। क्योंकि मोक्षका साधन ज्ञान है, शम । नहीं। अच्छा; शमको ज्ञानप्राप्तिका 'कारण' अर्थात् साधन कहें, तो यह वर्णन । योगारूढ अर्थात् पूर्णावस्थाको पहुँचे हुए पुरुषकाही है, इसलिये उसको ज्ञान- । प्राप्ति तो कर्मके साधनसे पहलेही हो चुकती है। फिर यह शम 'कारण' है । किसका? संन्यास-मार्गके टीकाकारोंसे इस प्रश्नका कुछभी समाधानकारक । उत्तर देते नहीं बनता। परंतु उनके इस अर्थको छोड़कर विचार करने लगें, तो । उत्तरार्धका अर्थ करनेमें पूर्वार्धका 'कर्म'पद सान्निध्यसामर्थ्यसे सहजही मनमें । आ जाता है और फिर यह अर्थ निष्पन्न होता है, कि योगारूढ पुरुषको लोक- । संग्रहकारक कर्म करनेके लिये अब 'शम' 'कारण' या साधन हो जाता है, क्योंकि । यद्यपि उसका कोई स्वार्थ शेष नहीं रह गया है, तथापि लोकसंग्रहकारक कर्म । किसीसे छूट नहीं सकते (गीता ३. १७-१९)। पिछले अध्यायमें जो यह । वचन है, कि “युक्त. कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकीम्” (गीता । ५. १२) - कर्मफलका त्याग करके योगी पूर्ण शांति पाता है इससेभी यही । अर्थ सिद्ध होता है। क्यों कि; उसमें शांतिका संबंध कर्मत्यागसे न जोड़कर केवल । फलाशाके त्यागसेही वर्णित है, वहीपर स्पष्ट कहा है, कि योगी जो कर्म-संन्यास । करे, वह 'मनसा' अर्थात् मनसे करे (गीता. ५. १३), शरीरके द्वारा या केवल । इंद्रियोंके द्वारा उसे कर्म करनेही चाहिये। हमारा तो यह मत है, कि अलंकार- । शास्त्रके अन्योन्यालंकारका-सा अर्थचमत्कार या सौरस्य इस श्लोकमें सध गया । है; और पूर्वार्धमें यह बतला कर, कि 'शम'का कारण 'कर्म' कब होता है, । उत्तरार्धमें इसके विपरीत वर्णन किया है, कि 'कर्म'का कारण 'शम' कब होता । है? भगवान् कहते हैं, कि प्रथम साधनावस्था में 'कर्म'ही शमका अर्थात् योग- । सिद्धिका कारण है। भाव यह है, कि यथाशक्ति निष्काम कर्म करते करतेही । चित्त शांत होकर उसीके द्वारा अंतमें पूर्ण योगसिद्धि हो जाती है। किंतु योगीके । योगारूढ होकर सिद्धावस्था में पहुँच जानेपर कर्म और शमका उक्त कार्यकारण- । भाव बदल जाता है याने कर्मशम कारण नही होता; किंतु शमही कर्मका कारण । बन जाता है; अर्थात् योगारूढ पुरुष अपने सब काम अब कर्तव्य समझकर, । फलकी आशा न रखकरके, शांतचित्तसे किया करता है। सारांश, इस । श्लोकका भावार्थ यह नहीं है, कि सिद्धावस्थामें कर्म छूट जाते हैं, किंतु गीताका । यह कथन है कि साधनावस्था में 'कर्म' और 'शम'के बीच जो कार्यकारणभाव । होता है, सिर्फ वही सिद्धावस्थामें बदल जाता है (गीतारहस्य प्र. ११, । पृ. ३२४-३२५)। गीतामें यह कहींभी नहीं कहा, कि कर्मयोगीको अंतमे कर्म