भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 754

छठा अध्याय ७०९

| लिये पहले कर्मही कारण होता है। किंतु “ योगारूढ होनेपर उसीके लिये शम | कारण हो जाता है ” - इसका अर्थ टीकाकारोंने संन्यास-प्रधान कर डाला है। | उनका कथन यों है :- 'शम' = कर्मका 'उपशम'; और जिसे योग सिद्ध हो | गया है, उसे, कर्म छोड़ देने चाहिये ! क्योंकि उनके मतमें कर्मयोग संन्यासका | अंग अर्थात् पूर्व-साधन है। परंतु यह अर्थ सांप्रदायिक आग्रहका है, जो ठीक नहीं | है। इसका पहला कारण यह है, कि जब इस अध्यायके पहलेही श्लोकमें भगवानने | कहा है, कि कर्मफलका आश्रय न करके “ कर्तव्यकर्म करनेवाला ” पुरुषही | सच्चा योगी अर्थात् योगारूढ है, कर्म न करनेवाला ( अक्रिय ) सच्चा योगी नहीं | है; तब यह मानना सर्वथा अन्याय्य है, कि तीसरे श्लोकमें योगारूढ पुरुषको | कर्मका शम करनेके लिये, या कर्म छोड़नेके लिये भगवान् कहेंगे। संन्यास-मार्गका | यह मत भलेही हो, कि शांति मिल जानेपर योगारूढ पुरुष कर्म न करे; | परंतु गीताको यह मत मान्य नहीं है। गीतामें अनेक स्थानोंपर स्पष्ट उपदेश | किया गया है, कि कर्मयोगी सिद्धावस्थामेंभी भगवानके समान यावज्जीवन | निष्काम बुद्धिसे सब कर्म केवल कर्तव्य समझकर रहता रहे ( गीता २. ७१; | ३. ७, १९; ४. १९-२१; ५, ७-१२; १२. १२; १८. ५६, ५७; गीतार. | प्र. ११, १२ ) । दूसरा कारण यह है, कि शम शब्दका अर्थ 'कर्मका शम' | कहाँसे आया ? भगवद्गीतामें 'शम' शब्द दो-चार बार आया है (गीता १०. ४; | १८. ४२ ), वहाँ और व्यवहारमेंभी उसका अर्थ 'मनकी शांति' है। फिर | इसी श्लोकमें 'कर्मकी शांति' अर्थ क्यों लें ? इस कठिनाईको दूर करनेके लिये | गीताके पैशाचभाष्यमें 'योगारूढस्य तस्यैव' के 'तस्यैव' इस दर्शक सर्वनामका | संबंध 'योगारूढस्य' से न लगाकर, 'तस्य'को नपुंसकलिंगकी षष्ठी विभक्ति | समझ करके ऐसा अर्थ किया है, कि 'तस्यैव कर्मणः शमः' ( तस्य अर्थात् | पूर्वार्धके कर्मका शम ) किंतु यह अन्वयभी सरल नहीं है। क्योंकि, इसमें | कोई संदेह नहीं, कि योगाभ्यास करनेवाले जिस पुरुषका वर्णन इस श्लोकके | पूर्वार्धमें किया गया है, उसीकी जो स्थिति अभ्यास पूरा हो चुकनेपर होती है, | उसे बतलानेकेलिये उत्तरार्धका आरंभ हुआ है। अतएव 'तस्यैव' पदोंमे 'कर्मणः | एव' यह अर्थ लिया नहीं जा सकता; अथवा यदि लेही लें, तो उसका संबंध | ' "शमः' से न जोड़कर 'कारणमुच्यते' के साथ जोड़नेमे ऐसा अन्वय लगता है, | “ शमः योगारूढस्य तस्यैव कर्मणः कारणमुच्यते । ” और गीताके संपूर्ण उपदेशके | अनुसार उसका यह अर्थभी ठीक लग जायगा, कि “ अब योगारूढके कर्मकाही | शम कारण होता है। ” टीकाकारोंके अर्थको त्याज्य माननेका तीसरा कारण | यह है, कि संन्यास-मार्गके अनुसार योगारूढ पुरुषको यदि कुछभी करनेकी | आवश्यकता नहीं रह जाती, उसके सब कर्मोंका अंत शममेंही हो जाता है; | और यह सच है, तो “ योगारूढको शम कारण होता है ” इस वाक्यका 'कारण'