श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥ शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ २५ ॥ यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥ § § प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥ युंजन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥ (२४) संकल्पसे उत्पन्न होनेवाले सब कामों अर्थात् वासनाओंका निःशेष त्यागकर, और मनसेही सब इंद्रियोंका चारों ओरसे संयमकर, (२५) धैर्ययुक्त बुद्धिसे धीरे धीरे शांत होता जावे, और मनको आत्मामें स्थिर करके कोईभी विचार मनमें न आने दे । (२६) (इस रीतिसे चित्तको एकाग्र करते हुए ) चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ-से बाहर जाने लगे, वहाँ-वहाँसे उसको रोककर आत्माकेही आधीन करे । । [ मनकी समाधि लगानेकी क्रियाका यह वर्णन कठोपनिषदमें दी गई । रथकी उपमासे ( कठ. १. ३. ३) अच्छी तरह व्यक्त होता है। जिस प्रकार । उत्तम सारथी रथके घोड़ोंको इधर-उधर न जाने देकर सीधे रास्तेसे ले जाता । है, उसी प्रकारका प्रयत्न मनुष्यको समाधिके लिये करना पड़ता है । जिसने । किसीभी विषयपर अपने मनको स्थिरकर लेनेका अभ्यास किया है, उसकी । समझमें ऊपरवाले श्लोकका मर्म तुरंत आ जावेगा । मनको एक ओर रोके, तो । वह दूसरी ओर खिसक जाता है; और वह आदत रुके बिना समाधि लग नहीं । सकती । अब, इस प्रकार योगाभ्याससे चित्त स्थिर होनेपर जो फल मिलता है, । उसका वर्णन करते हैं :- ] (२७) इस प्रकार शांतचित्त, रजसे रहित, निष्पाप और ब्रह्मभूत (कर्म-)- योगीको उत्तम सुख प्राप्त होता है । (२८) इस रीतिसे निरंतर अपना योगाभ्यास करनेवाला (कर्म-) योगी पापोंसे छूटकर ब्रह्मसंयोगसे प्राप्त होनेवाले अत्यंत सुखका आनंदसे उपभोग करता है । । [ इन दो श्लोकोंमें हमने योगीका अर्थ कर्मयोगी किया है। क्योंकि, । कर्मयोगका साधन समझ करही पातंजलयोगका वर्णन किया गया है; अतः