भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 764

छठा अध्याय ७१९ § § सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥ सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥ | पातंजलयोगके अभ्यास करनेवाले उक्त पुरुषसे कर्मयोगीही विवक्षित है । तथापि | योगीका अर्थ “ समाधि लगाये बैठा हुआ पुरुष ”भी कर सकते हैं । किंतु स्मरण | रहे, कि गीताका प्रतिपाद्य मार्ग इससेभी परे है । यही नियम अगले दो-तीन | श्लोकोंको लागू है । निर्वाण ब्रह्मसुखका इस प्रकार अनुभव होनेपर सब | प्राणियोंके विषयमें जो आत्मौपम्य-दृष्टि उत्पन्न हो जाती है, उसका अब वर्णन | करते हैं :- ] (२९) (इस प्रकार) जिसका आत्मा योगयुक्त हो गया है, उसकी दृष्टि सम हो जाती है, और उसे सर्वत्र ऐसा दीख पड़ने लगता है, कि मैं सब प्राणियोंमें हूँ और सब प्राणी मुझमें हैं । (३०) जो मुझको (परमेश्वर परमात्मा ) सब स्थानोंमें और सबको मुझमें देखता है, उससे मैं कभी नहीं बिछुड़ता, और न वही मुझसे कभी दूर होता है। | [ इन दो श्लोकोंमें, पहला वर्णन 'आत्मा' शब्दका प्रयोगकर अव्यक्त | अर्थात् आत्म-दृष्टिसे, और दूसरा वर्णन प्रथमपुरुषदर्शक 'मैं' पदके प्रयोगसे | व्यक्त अर्थात् भक्तिदृष्टिसे किया गया है । परंतु अर्थ दोनोंका एकही है ( गीतार. | प्र. १३, पृ. ४३०-४३४ ) । मोक्ष और कर्मयोग, इन दोनोंकाभी आधार यह | ब्रह्मात्मैक्य-दृष्टिही है । २९ वें श्लोकका पहला अर्धांश कुछ फ़र्कसे मनुस्मृति | ( मनु. १२. ९१ ), महाभारत ( शां. २३८. २१; २६८. २२ ) । और | उपनिषदों मेंभी ( कैव. १. १०; ईश. ६ ) पाया जाता है । हमने गीतारहस्यके | १२ वें प्रकरणमें विस्तारसहित दिखलाया है, कि सर्वभूतात्मैक्य-ज्ञानही समग्र | अध्यात्म और कर्मयोगका मूल है ( पृ. ३८७ प्रभृति ) । यह ज्ञान हुए बिना | इंद्रियनिग्रहका सिद्ध हो जानाभी व्यर्थ है; इसीलिये अगले अध्यायसे परमेश्वरका | ज्ञान बतलाना आरंभ कर दिया है । ] (३१) जो एकत्वबुद्धि अर्थात् सर्वभूतात्मैक्यबुद्धिको मनमें रखकर सब प्राणियोंमें रहनेवाले मुझको (परमेश्वरको) भजता है, वह (कर्म-)योगी सब प्रकारसे वर्तता हुआभी मुझमें रहता है।