भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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७२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥ अर्जुन उवाच । § योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥ चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥ (३२) हे अर्जुन ! सुख हो या दुःख, अपने समान औरोंकोभी । जो ऐसी (आत्मौ- पम्य-) दृष्टिसे सर्वत्र समान । देखने लगे, वह (कर्म-) योगी परम अर्थात् उत्कृष्ट माना जाता है। [ "प्राणिमात्रमें एकही आत्मा है" यह दृष्टि सांख्य और कर्मयोग, दोनों मार्गोंमें एक-सी है। ऐसेही पातंजलयोगमेंभी समाधि लगाकर परमेश्वरकी पहचान हो जानेपर यही साम्यावस्था प्राप्त होती है। परंतु सांख्य और पात- जलयोगी, दोनोंकोभी सब कर्मोंका त्याग इष्ट है, अतएव वे व्यवहारमें इस साम्य-बुद्धिके उपयोग करनेका मौकाही नहीं आने देते; और गीताका कर्मयोगी ऐसा न कर, अध्यात्मज्ञानसे प्राप्त हुई इस साम्य-बुद्धिका व्यवहारमेंभी नित्य उपयोग करके, जगतके सभी काम लोकसंग्रहके लिये किया करता है, यही इन दोनोंमें बड़ा भारी भेद है, और इसीसे इस अध्यायके अंतमें (श्लोक ४६) स्पष्ट कहा है, कि तपस्वी अर्थात् पातंजलयोगी, और ज्ञानी अर्थात् सांख्य-मार्गी, इन दोनोंकी अपेक्षा कर्मयोगी श्रेष्ठ है। साम्ययोगके इस वर्णनको सुनकर अब अर्जुनने यह शंका की :- ] अर्जुनने कहा :- (३३) हे मधुसूदन ! साम्यसे अर्थात् साम्य-बुद्धिसे प्राप्त होनेवाला जो यह योग अर्थात् (कर्म-) योग तुमने बतलाया, मैं नहीं देखता, कि (मनकी) चंचलताके कारण वह स्थिर रहेगा । (३४) क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन चंचल, हठीला, बलवान् और दृढ़ है। वायुके समान, अर्थात् हवाकी गठरी बाँधनेके समान, इसका निग्रह करना मुझे अत्यंत दुष्कर दिखता है। [ ३३ वें श्लोकके 'साम्य'मे अथवा 'साम्य-बुद्धि'से प्राप्त होनेवाला, इस विशेषणसे यहाँ योग शब्दका कर्मयोगही अर्थ है। यद्यपि पहले पातंजलयोगकी समाधिका वर्णन आया है, तोभी इस श्लोकमें 'योग' शब्दमे पातंजलयोग विवक्षित नहीं है। क्योंकि, दूसरे अध्यायमें भगवान्नेही कर्मयोगकी ऐसी व्याख्या की है, कि "समत्वं योग उच्यते" (गीता २. ४८) - "बुद्धिकी समता या