श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय ७२१ श्रीभगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥ असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥ । समत्वकोही योग कहते हैं।" अस्तु; अर्जुनकी कठिनाईको मान कर भगवान् । अब कहते हैं :- ] श्रीभगवानने कहा :- (३५) हे महाबाहु अर्जुन ! इसमें कुछभी संदेह नहीं, कि मन चंचल है और उसका निग्रह करना कठिन है । परंतु हे कौन्तेय ! अभ्यास और वैराग्यसे उसे आधीन किया जा सकता है। (३६) मेरे मतमें, जिसका अंतःकरण अपने काबूमें नहीं, उसको इस (साम्य-बुद्धिरूप) योगका प्राप्त होना कठिन है। किंतु अंतःकरणको काबूमें रखकर प्रयत्न करते रहनेपर उपायसे (इस योगका) प्राप्त होना संभव है। । [ तात्पर्य, पहले जो बात कठिन दीख पड़ती है, वही अभ्याससे और दीर्घ । उद्योगसे अंतमें सिद्ध हो जाती है। किसीभी कामको बारबार करना 'अभ्यास' । कहलाता है, और 'वैराग्य'का मतलब है राग या प्रीति न रखना, अर्थात् । इच्छाविहीनता। पातंजलयोग-सूत्रमें आरंभमेंही योगका यह लक्षण बतलाया । है, कि 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' - चित्तवृत्तिके निरोधको योग कहते हैं (इसी । अध्यायका २० वाँ श्लोक देखो); और फिर अगले सूत्रमें कहा है, कि "अभ्यास । वैराग्याभ्यां तन्निरोधः" - अभ्यास और वैराग्यसे चित्तवृत्तिका निरोध हो । जाता है। यही शब्द गीतामें आये हैं और अभिप्रायभी वही है; परंतु इतनेहीसे । यह नहीं कहा जा सकता, कि गीतामें ये शब्द पातंजलयोग-सूत्रसे लिये गये हैं । (गीतार. पृ. ५३२)। इस प्रकार, यदि मनोनिग्रह करके समाधि लगाना संभव । हो, और कुछ निग्रही पुरुषोंको छ महिनोंके अभ्याससे यदि यह सिद्धि प्राप्त । हो सकती हो, इसपर तोभी अब यह दूसरी शंका होती है, कि प्रकृति-स्वभावके । कारण अनेक लोग दो-एक जन्मोंमेंभी कर्मयोगकी इस परमावस्थामें नहीं पहुँच । सकते; फिर ऐसे लोग इस सिद्धि क्योंकर पावें? क्योंकि एक जन्ममें, जितना । हो सका, उतना इंद्रियनिग्रहका अभ्यास कर कर्मयोगका आचरण करने लगें, । तो वह मरते समय अधूराही रह जायगा, और अगले जन्ममें फिर पहलेसे । आरंभ करे, तो फिर आगेके जन्ममेंभी वही हाल होगा। अतः अर्जुनका दूसरा । प्रश्न है, कि इस प्रकारके पुरुष क्या करें :-] गी. र. ४६