श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अर्जुन उवाच । § § अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥ एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥ अर्जुनने कहा :- ( ३७ ) हे कृष्ण ! श्रद्धा (तो) है, परंतु अयति अर्थात् (प्रकृति-स्वभावसे) पूरा प्रयत्न अथवा संयमन नहीं होता, इसलिये जिसका मन (साम्य-बुद्धिरूप कर्मयोगसे बिचल जावे, वह योगसिद्धि न पाकर किस गतिको- जा पहुँचता है ? ( ३८ ) हे महाबाहु श्रीकृष्ण ! यह पुरुष मोहग्रस्त होकर ब्रह्म प्राप्तिके मार्गमें स्थिर न होनेके कारण दोनों ओरसे छूटा हुआ या भ्रष्ट हो जानेपर छिन्न-भिन्न बादलके समान (बीचमेंही) नष्ट तो नहीं हो जाता ? ( ३९ ) हे कृष्ण ! मेरे इस संदेहको तुम्हेंही निःशेष दूर करना चाहिये; तुम्हें छोड़कर इस संदेहको मिटानेवाला दूसरा कोई न मिलेगा। । [यद्यपि नञ् समासमें आरंभके नञ् (अ) पदका साधारण अर्थ । 'अभाव' होता है, तथापि कई बार 'अल्प' अर्थमेंभी उसका प्रयोग हुआ करता । है, इस कारण ३७ वें श्लोकके 'अयति' शब्दका अर्थ "अल्प अर्थात् अधूरा प्रयत्न । या संयम करनेवाला" होता है। ३८वें श्लोकमें जो कहा है, कि "दोनों ओरका । आश्रय छूटा हुआ" अथवा "इतो भ्रष्टस्ततो भ्रष्टः" उसका अर्थभी कर्मयोग- । प्रधानही करना चाहिये। कर्मके दो प्रकारके फल हैं-- (१) काम्य-बुद्धिसे । किंतु शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार कर्म करनेपर स्वर्गकी प्राप्ति होती है, और । निष्काम बुद्धिसे करनेपर वह बंधक न होकर मोक्षदायक हो जाता है। परंतु । इस अधूरे मनुष्यको कर्मके स्वर्ग आदि काम्य-फल नहीं मिलते, क्योंकि उसका । ऐसा हेतुही नहीं रहता; और साम्य-बुद्धि पूर्ण न होनेके कारण उसे मोक्ष मिल । नहीं सकता। इसलिये अर्जुनके मनमें शंका उत्पन्न हुई, कि उस बेचारेको न तो । स्वर्ग मिला और न मोक्षभी - कहीं उसकी ऐसी स्थिति तो नहीं हो जाती, । कि दोनों दिनसे गये पांडे, हलुवा मिले न मांडे ? यह शंका केवल पातंजलयोग- । रूपी कर्मयोगके साधनके लियेही नहीं की जाती। अगले अध्यायोंमें वर्णन है, । कि कर्मयोग-सिद्धिके लिये आवश्यक साम्य-बुद्धि कभी पातंजलयोगसे, कभी । भक्तिसे और कभी ज्ञानसे प्राप्त होती है; और जिस प्रकार पातंजलयोगरूपी