भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 768

छठा अध्याय ७२३ श्रीभगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥ प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४ ॥ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५ ॥ | यह साधन एकही जन्ममें अधूरा रह सकता है, उसी प्रकार भक्ति या ज्ञानरूपी | साधनभी एक जन्ममें अपूर्ण रह सकते हैं। अतएव कहना चाहिये, कि अर्जुनके | उक्त प्रश्नका भगवानने जो उत्तर दिया है, वह कर्मयोग-मार्गके सभी साधनोंको | साधारण रीतिसेही उपयुक्त हो सकता है ] श्रीभगवानने कहा :- ( ४० ) हे पार्थ ! क्या इस लोकमें और क्या परलोकमें, ऐसे पुरुषका कभी विनाश होताही नहीं। क्योंकि हे तात ! कल्याणकारक कर्म करनेवाले किसीभी पुरुषकी दुर्गति नहीं होती । ( ४१ ) पुण्यकर्ता पुरुषोंको मिलने- वाले ( स्वर्ग आदि ) लोकोंको पाकर और ( वहाँ ) बहुत वर्षोंतक निवास करके फिर यह योग-भ्रष्ट अर्थात् कर्मयोगसे भ्रष्ट पुरुष पवित्र श्रीमान् लोगोंके घरमें जन्म लेता है; ( ४२ ) अथवा बुद्धिमान् (कर्म-)योगियोंकेही कुलमें जन्म पाता है। इस प्रकारके जन्म ( इस ) लोकमें बड़े दुर्लभ हैं। ( ४३ ) उसमें अर्थात् इस प्रकारसे प्राप्त हुए जन्ममें वह पूर्व-जन्मके बुद्धि-संस्कारको पाता है; और हे कुरुनंदन ! वह उससे भूयः अर्थात् अधिक ( योग ) सिद्धि पानेका प्रयत्न करता है। ( ४४ ) अपने पूर्वजन्मके उस अभ्याससेही अवश अर्थात् अपनी इच्छा न रहने- परभी, वह ( पूर्ण सिद्धिकी ओर ) खींचा जाता है। जिसे (कर्म-)योगकी जिज्ञासा अर्थात् ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छा हो गई है, वहभी शब्दब्रह्मके परे चला जाता है। ( ४५ ) ( इस प्रकार ) प्रयत्नपूर्वक उद्योग करते करते पापोंसे शुद्ध होता हुआ