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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

छठा अध्याय ७२३ श्रीभगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥ प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४ ॥ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५ ॥ | यह साधन एकही जन्ममें अधूरा रह सकता है, उसी प्रकार भक्ति या ज्ञानरूपी | साधनभी एक जन्ममें अपूर्ण रह सकते हैं। अतएव कहना चाहिये, कि अर्जुनके | उक्त प्रश्नका भगवानने जो उत्तर दिया है, वह कर्मयोग-मार्गके सभी साधनोंको | साधारण रीतिसेही उपयुक्त हो सकता है ] श्रीभगवानने कहा :- ( ४० ) हे पार्थ ! क्या इस लोकमें और क्या परलोकमें, ऐसे पुरुषका कभी विनाश होताही नहीं। क्योंकि हे तात ! कल्याणकारक कर्म करनेवाले किसीभी पुरुषकी दुर्गति नहीं होती । ( ४१ ) पुण्यकर्ता पुरुषोंको मिलने- वाले ( स्वर्ग आदि ) लोकोंको पाकर और ( वहाँ ) बहुत वर्षोंतक निवास करके फिर यह योग-भ्रष्ट अर्थात् कर्मयोगसे भ्रष्ट पुरुष पवित्र श्रीमान् लोगोंके घरमें जन्म लेता है; ( ४२ ) अथवा बुद्धिमान् (कर्म-)योगियोंकेही कुलमें जन्म पाता है। इस प्रकारके जन्म ( इस ) लोकमें बड़े दुर्लभ हैं। ( ४३ ) उसमें अर्थात् इस प्रकारसे प्राप्त हुए जन्ममें वह पूर्व-जन्मके बुद्धि-संस्कारको पाता है; और हे कुरुनंदन ! वह उससे भूयः अर्थात् अधिक ( योग ) सिद्धि पानेका प्रयत्न करता है। ( ४४ ) अपने पूर्वजन्मके उस अभ्याससेही अवश अर्थात् अपनी इच्छा न रहने- परभी, वह ( पूर्ण सिद्धिकी ओर ) खींचा जाता है। जिसे (कर्म-)योगकी जिज्ञासा अर्थात् ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छा हो गई है, वहभी शब्दब्रह्मके परे चला जाता है। ( ४५ ) ( इस प्रकार ) प्रयत्नपूर्वक उद्योग करते करते पापोंसे शुद्ध होता हुआ

७२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (कर्म-)योगी अनेक जन्मोंके अनन्तर सिद्धि पाकर अंतमें उत्तम गति पा लेता है ! । [ इन श्लोकोंमें योग, योगभ्रष्ट और योगी शब्द, कर्मयोग, कर्मयोगसे भ्रष्ट और कर्मयोगीके अर्थमेंही व्यवहृत हैं । क्योंकि श्रीमान् कुलमें जन्म लेनेकी स्थिति दूसरोंको इष्ट होना संभवही नहीं है । भगवान् कहते हैं, कि पहलेसे, जितना हो सके उतना, शुद्ध-बुद्धिसे कर्मयोगका आचरण करना आरंभ करे । थोड़ा-ही क्यों न हो, पर इस रीतिसे जो कर्म किया जावेगा, वही इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें, इस प्रकार अधिक अधिक सिद्धि मिलनेके लिये उत्तरोत्तर कारणीभूत होगा, और उसीसे अंतमें पूर्ण सद्गति मिलती है । “ इस धर्मका थोड़ा-साभी आचरण किया जाय, तो वह बड़े भयसे रक्षा करता है” (गीता २. ४०), और “अनेक जन्मोंके पश्चात् वासुदेवकी प्राप्ति होती है” (७. १९), ये श्लोक इसी सिद्धान्तके पूरक हैं । अधिक विवेचन गीतारहस्यके प्र. १०, पृ. २८४-२८७में किया गया है । ४४ वें श्लोकके शब्दब्रह्मका अर्थ है “वैदिक यज्ञाग आदि काम्यकर्म” क्योंकि ये कर्म वेदविहित हैं, और वेदोंपर श्रद्धा रखकरही किये जाते हैं; तथा वेद अर्थात् सब सृष्टिके पहलेका शब्द याने शब्दब्रह्म है । प्रत्येक मनुष्य पहले पहल सभी कर्म काम्य-बुद्धिसे-ही किया करता है; परंतु इस कर्मसे जैसे जैसे चित्तशुद्धि हो जाती है, वैसे वैसे आगे निष्काम- बुद्धिसे कर्म करनेकी इच्छा होती है । इसीसे उपनिषदोंमें और महाभारतमेंभी (मैत्र्यु. ६. २२; अमृतबिंदु. १७; महा. शां. २३१. ६३; २६९. १) यह वर्णन है, कि :- द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ “जानना चाहिये, कि ब्रह्म दो प्रकारका है; एक शब्दब्रह्म और दूसरा उससे परेका (निर्गुण) । शब्दब्रह्ममें निष्णात हो जानेपर फिर उससे परेका (निर्गुण) ब्रह्म प्राप्त होता है ।” शब्दब्रह्मके काम्यकर्मोंसे उकता कर अंतमें लोकसंग्रहके अर्थ उन्हीं कर्मोंको करानेवाले कर्मयोगकी इच्छा होती है और फिर इस निष्काम कर्मयोगका थोड़ाबहुत आचरण पहले पहल होने लगता है । “अनन्तर स्वल्पारम्भाः क्षेमकराः”के न्यायसे यही थोड़ा-सा आचरण उस मनुष्यको इस मार्गमें धीरे धीरे आगे खींचता जाता है; और अंतमें क्रम-क्रमसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त करा देता है । ४४ वें श्लोकमें जो यह कहा है, कि “कर्मयोगकी इच्छा होनेसेभी वह शब्दब्रह्मके परे चला जाता है” उसका तात्पर्यभी यही है । क्योंकि यह जिज्ञासा कर्मयोगरूपी कोल्हूका मुँह है; और एक बार इस कोल्हूके मुँहमें चले जानेपर फिर इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें, कभी न कभी पूर्ण सिद्धि मिलती है । और वह शब्दब्रह्मसे परेके ब्रह्मके ब्रह्मतक पहुँचेबिना नहीं रहता । पहले पहल जान पड़ता है, कि यह सिद्धि जनक आदिको एक-ही जन्ममें

छठा अध्याय ७२५

§ § तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६ ॥

| मिल गई होगी; परंतु तात्त्विक दृष्टिसे देखनेपर, चलता है, कि उन्हेंभी यह | फल जन्मजन्मान्तरके पूर्वसंस्कारसेही मिला होगा । अस्तु; कर्मयोगका थोड़ा-सा | आचरण, यहाँतक कि जिज्ञासाभी इस रीतिसे सदैव कल्याणकारक है, इसके | अतिरिक्त अंतमें मोक्षप्राप्तिभी निःसंदेह इसीसे होती है; अतः अब भगवान् | अर्जुनसे कहते हैं, कि :- ] (४६) तपस्वी लोगोंकी अपेक्षा (कर्म-)योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानी पुरुषोंकी अपेक्षाभी श्रेष्ठ है, और कर्मकांडवालोंकी अपेक्षाभी श्रेष्ठ समझा जाता है; इसलिये हे अर्जुन ! तू योगी अर्थात् कर्मयोगी हो । | [ जंगलमें जाकर उपवास आदि शरीरको क्लेशदायक व्रतोंसे अथवा | हठयोगके साधनोंसे सिद्धि पानेवाले लोगोंको इस श्लोकमें तपस्वी कहा है, | और सामान्य रीतिसेभी इस शब्दका यही अर्थ है । " ज्ञानयोगेन सांख्यानां " | (गीता. ३. ३) में वर्णित, ज्ञानसे अर्थात् सांख्य-मार्गसे कर्म छोड़कर सिद्धि | प्राप्तकर लेनेवाले सांख्यनिष्ठ लोगोंको ज्ञानी माना है। इसी प्रकार गीता | २. ४२-४४ और ९. २०, २१ में वर्णित निरे काम्य-कर्म करनेवाले स्वर्गपरायण | कर्मठ मीमांसकोंको कर्मी कहा है। इन तीनों पंथोंमेसे प्रत्येक यही कहता है, | कि हमारे मार्गसेही सिद्धि मिलती है। किंतु अब गीताका यह कथन है, कि | तपस्वी हो, चाहे कर्मठ मीमांसक हो या ज्ञाननिष्ठ सांख्य हो, इनमें प्रत्येककी | अपेक्षा कर्मयोगी – अर्थात् कर्मयोग-मार्गभी – श्रेष्ठ है ! और पहले यही सिद्धान्त | "अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ०" (गीता. ३. ८), एवं "कर्मसंन्यासकी अपेक्षा | कर्मयोग विशेष०" (गीता ५. २) इत्यादि श्लोकोंमें वर्णित है (गीतार. | प्र. ११, पृ. ३०९, ३१०)। और तो क्या, तपस्वी, मीमांसक अथवा ज्ञान- | मार्गी इनमेंसे प्रत्येककी अपेक्षा कर्मयोगी श्रेष्ठ है, 'इसीलिये' पीछे जिस प्रकार | अर्जुनको उपदेश किया है, कि "योगस्थ होकर कर्म कर" (गीता २. ४८; | गीतार. प्र. ३, पृ. ५८), अथवा "योगका आश्रय करके खड़ा हो" (४. ४२), | उसी प्रकार यहाँभी फिर स्पष्ट उपदेश किया है, कि "तू (कर्म-)योगी | हो।" यदि इस प्रकार कर्मयोगको श्रेष्ठ न मानें, तो "तस्मात् तू योगी हो" | इस उपदेशका 'तस्मात् = इसलिये' पद निरर्थक हो जावेगा । किंतु संन्यास-मार्गके | टीकाकारोंको यह सिद्धान्त कैसे स्वीकृत हो सकता है? अतः उन लोगोंने 'ज्ञानी' | शब्दका अर्थ बदल दिया है, और वे कहते हैं, कि ज्ञानी शब्दका अर्थ केवल | शब्दज्ञानी है, अथवा वे लोग, कि जो सिर्फपुस्तकें पढ़कर ज्ञानकी लंबी-चौड़ी

७२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे ध्यानयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ | बातें छाँटा करते हैं । किंतु यह अर्थ निरे सांप्रदायिक आग्रहका है । ये टीकाकार | गीताके इस अर्थको नहीं चाहते, कि कर्म छोड़नेवाले ज्ञान-मार्गको गीता कम | दर्जेका समझती है । क्योंकि उससे उनके संप्रदायको गौणता प्राप्त होती है । | और इसीलिये “ कर्मयोगो विशिष्यते ” काभी (गीता ५. २ ) अर्थ उन्होंने | बदल दिया है । परंतु इसका पूरा पूरा विचार गीतारहस्यके ११ वें प्रकरणमें | कर चुके हैं; अतः इस श्लोकका जो अर्थ हमने किया है, उसके विषयमें यहाँ | अधिक चर्चा नहीं करते । हमारे मतमें यह निर्विवाद है, कि गीताके अनुसार | कर्म-योगमार्गही सबमें श्रेष्ठ है । अब आगेके श्लोकमें बतलाते हैं, कि कर्म- | योगियोंमेंभी कौन-सा तारतम्य भाव देखना पड़ता है :- ] ( ४७ ) तथापि सब (कर्म-) योगियोंमेंभी मैं उसेही सबसे उत्तम युक्त अर्थात् उत्तम सिद्ध कर्मयोगी समझता हूँ, कि जो मुझमें अंतःकरण रख कर श्रद्धासे मुझको भजता है । | [ इस श्लोकका यह भावार्थ है, कि कर्मयोगमेंभी भक्तिका प्रेमपूरित | मेल हो जानेसे वह योगी भगवान्को अत्यन्त प्रिय हो जाता है। इसका यह अर्थ | नहीं है, कि निष्काम कर्मयोगकी अपेक्षाभी भक्ति श्रेष्ठ है । क्योंकि आगे बारहवें | अध्यायमें भगवान्नेही स्पष्ट कह दिया है, कि ध्यानकी अपेक्षा कर्मफलत्याग | श्रेष्ठ है ( गीता. १२. १२ ) । निष्काम कर्म और भक्तिके समुच्चयको श्रेष्ठ | कहना एक बात है, और सब निष्काम कर्मयोगको व्यर्थ कहकर, भक्तिहीको | श्रेष्ठ बतलाना दूसरी बात है । गीताका सिद्धान्त पहले ढंगका है और भागवत- | पुराणका पक्ष दूसरे ढंगका है । सब प्रकारके क्रियायोगको आत्मज्ञान-विघातक | निश्चितकर भागवत के ( भाग. १. ५. ३४ ) पहले और फिर अंतिम स्कंधमेंभी | कहा है :- | नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम् । | नैष्कर्म्य अर्थात् निष्काम कर्मभी ( भाग. ११. ३. ४६ ) बिना भगवद्भक्तिके | शोभा नहीं देता, वह व्यर्थ है ( भाग. १. ५. १२; १२. १२. ५२ ) इससे | व्यक्त होगा, कि भागवतकारका ध्यान केवल भक्तिकेही ऊपर होनेके कारण | वे विशेष प्रसंगपर भगवद्गीताकेभी आगे कैसी चौकड़ी भरते हैं। जिस पुराणका

छठा अध्याय ७२७

| निरूपण इस समझसे किया गया है, कि महाभारतमें, और फलतः गीतामेंभी | भक्तिका जैसा वर्णन होना चाहिये, वैसा नहीं हुआ; उसमें यदि उक्त वचनोंके | समान औरभी कुछ बातें मिलें, तो कोई आश्चर्य नहीं। पर हमें तो गीताका | तात्पर्य देखना है; न कि भागवतका कथन। दोनोंका प्रयोजन और समयभी | भिन्न भिन्न हैं, इस कारण बात-बातमें उनकी एकवाक्यता करना उचित नहीं है। | अस्तु; कर्मयोगकी साम्य-बुद्धि प्राप्त करनेके लिये जिन साधनोंकी आवश्यकता | है, उनमेंसे पातंजलयोगके साधनोंका इस अध्यायमें निरूपण किया गया। ज्ञान | और भक्ति ये अन्य साधन है; और अगले अध्यायसे उनके निरूपणका आरंभ | होगा।] | इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें | ब्रह्मविद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके, | संवादमें, ध्यानयोग नामक छठा अध्याय समाप्त हुआ।

७२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सातवाँ अध्याय [ पहले यह प्रतिपादन किया गया, कि कर्मयोग सांख्य-मार्गके समानही मोक्षप्रद है, परंतु स्वतंत्र है और उससे श्रेष्ठ है, और यदि इस मार्गका थोड़ाभी आचरण किया जाय, तो वह व्यर्थ नहीं जाता । अनंतर इस मार्गकी सिद्धिके लिये आवश्यक इंद्रियनिग्रह करनेकी रीतिका वर्णन किया गया है। किंतु इंद्रियनिग्रहसे मतलब निरी बाह्यक्रियासे है, और जिसके लिये इंद्रियोंकी यह कसरत करनी है, उसका अबतक विचार नहीं हुआ । तीसरेही अध्यायमें भगवाननेही अर्जुनको इंद्रियनिग्रहका यह प्रयोजन बतलाया है कि “ काम-क्रोध आदि शत्रु इंद्रियोंमें अपना घर बनाकर ज्ञान-विज्ञानका नाश करते हैं, इसलिये पहले तू इंद्रियनिग्रह करके इन शत्रुओंको मार डाल ” (गीता ३. ४०, ४१) । और पिछले अध्यायमेंभी योगयुक्त पुरुषका यों वर्णन किया है, कि इंद्रियनिग्रहके द्वारा ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त हुआ ” (गीता ६. ८) योगयुक्त पुरुष “ समस्त प्राणियोंमें परमेश्वरको और परमेश्वरमें समस्त प्राणियोंको देखता है ” (गीता ६. २९) । अतः जब इंद्रियनिग्रह करनेकी विधि बतला चुके, तब अब यह बतलाना आवश्यक हो गया, कि 'ज्ञान' और 'विज्ञान' किसे कहते हैं, और परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान होकर कर्मोंको न छोड़ते हुएभी कर्मयोग- मार्गकी किन विधियोंसे अंतमें निःसंदिग्ध मोक्ष मिलता है ? सातवें अध्यायसे लेकर सत्रहवें अध्यायके अंतपर्यंत ग्यारह अध्यायोंमें, इसी विषयका वर्णन है, और अंतके अर्थात् अठारहवें अध्यायमें सब कर्मयोगका उपसंहार किया गया है। सृष्टिके अनेक प्रकारके अनेक विनाशवान् पदार्थोंमें एकही अविनाशी परमेश्वर समा रहा है - इस समझका नाम है 'ज्ञान'; और एकही नित्य परमेश्वरसे विविध नाशवान् पदार्थोंकी उत्पत्तिको समझ लेना 'विज्ञान' कहलाता है” (गीता १३. ३०), एवं इसीको क्षर-अक्षरका विचार कहते हैं। परंतु इसके सिवा अपने शरीरमें अर्थात् क्षेत्रमें जिसे आत्मा कहते हैं, उसके सच्चे स्वरूपको जान लेनेसेभी परमेश्वरके स्वरूपका बोध हो जाता है। इस प्रकारके विचारको क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार कहते हैं। इ नमेसे क्षर-अक्षरके विचारका पहले वर्णन करके फिर तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विचारका वर्णन किया है। यद्यपि परमेश्वर एक है, तथापि उपासनाकी दृष्टिसे तो उसके दो भेद होते हैं। उसका अव्यक्त स्वरूप केवल बुद्धिसे ग्रहण करनेयोग्यहै, व्यक्त स्वरूप प्रत्यक्ष अवगम्य है। अतः इन दोनों मार्गों या विधियोंको इसी निरू- पणमें बतलाना पड़ा, कि बुद्धिसे परमेश्वरको कैसे पहचानें, और श्रद्धा या भक्तिसे व्यक्त स्वरूपकी उपासना करनेसे उसके द्वारा अव्यक्तका ज्ञान कैसे होता है ? तब इस समूचे विवेचनमें यदि ग्यारह अध्याय लग गये, तो कोई आश्चर्य नहीं है । इसके सिवा, इन दो मार्गोंसे परमेश्वरके ज्ञानके साथही इंद्रियनिग्रहभी आप-ही-आप हो

सातवाँ अध्याय ७२९ सप्तमोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥ ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥ जाता है, अतः केवल इंद्रियनिग्रह प्राप्त करा देनेवाले पातंजलयोग-मार्गकी अपेक्षा मोक्ष-धर्ममें ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्गकी योग्यताभी अधिक मानी जाती है। तोभी स्मरण रहे, कि यह सारा विवेचन कर्मयोग-मार्गके उपपादनका एक अंश है, वह स्वतंत्र नहीं है। अर्थात् गीताके पहले छः अध्यायोंमें कर्म, दूसरे षट्कमें भक्ति और तीसरी षडध्यायीमें ज्ञान, इस प्रकार गीताके जो तीन स्वतंत्र विभाग किये जाते हैं, वे तत्त्वतः ठीक नहीं हैं। इस विषयका प्रतिपादन गीतारहस्यके चौदहवें प्रकरणमें (पृ. ४५३-४५८) किया गया है। स्थूलमानसे देखनेसे ये तीनों विषय गीतामें आये हैं सही; परंतु वे स्वतंत्र नहीं हैं, किंतु कर्मयोगके रूपमेंही उनका विवेचन किया गया है, इसलिये यहाँ उसकी पुनरावृत्ति नहीं करते। अब देखना चाहिये, कि सातवें अध्यायका आरंभ भगवान् किस प्रकार करते हैं :-] श्रीभगवानने कहा :—( १ ) हे पार्थ ! मुझमें चित्त लगाकर, और मेराही आश्रय करके (कर्म-)योगका आचरण करते हुए तुझे जिस प्रकारसे या जिस विधिसे मेरा पूर्ण और संशयविहीन ज्ञान होगा, उसे सुन। ( २ ) विज्ञानसमेत इस पूरे ज्ञानको मैं तुझसे कहता हूँ कि जिसके जान लेनेसे इस लोकमें फिर और कुछभी जाननेके लिये शेष नहीं रह जाता । | [ पहले श्लोकके 'मेराही आश्रय करके' इन शब्दोंसे और विशेषकर | 'योग' शब्दसे प्रकट होता है, कि पहलेके अध्यायोंमें वर्णित कर्मयोगकी सिद्धिके | लियेही अगला ज्ञान-विज्ञान कहा है, स्वतंत्र रूपसे नहीं बतलाया है (गीतार. | प्र. १४, पृ. ४५६) । न केवल इसी श्लोकमें, प्रत्युत गीतामें अन्यत्रभी कर्म- | योगको लक्ष्यकर ये शब्द आये हैं—'मय्योगमाश्रितः' (गीता १२. ११), | 'मत्परः' (गीता १८. ५७; ११. ५५); अतः इस विषयमें कोई शंका नहीं | रहती, कि परमेश्वरका आश्रय करके जिस योगका आचरण करनेके लिये | गीता कहती है, वह पीछेके छः अध्यायोंमें प्रतिपादित कर्मयोगही है। कुछ | लोग विज्ञानका अर्थ अनुभविक ब्रह्मज्ञान अथवा ब्रह्मका साक्षात्कार करते हैं,

७३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥ § § भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥ | परंतु ऊपरके कथनानुसार हमें ज्ञात होता है, कि परमेश्वरी ज्ञानकेही समष्टि- | रूप (ज्ञान) और व्यष्टिरूप (विज्ञान), ये दो भेद हैं, इस कारण | ज्ञानविज्ञान शब्दसेभी उन्हीका अभिप्राय है (गीता १३. ३०; १८. २०) । | दूसरे श्लोकके ये शब्द "फिर और कुछभी जाननेके लिये शेष नहीं रह जाता" | - उपनिषदके आधारसे लिये गये हैं। छांदोग्य उपनिषदमें श्वेतकेतुसे उसके | पिताने यह प्रश्न किया है, कि "येन...अविज्ञातं विज्ञातं भवति" - वह क्या | है, कि जिस एकके जान लेनेसे सब कुछ जान लिया जाता है? और फिर आगे | उसका इस प्रकार स्पष्टीकरण किया है। "यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं | विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्।" (छां. ६. | १. ४) । - हे तात! जिस प्रकार मिट्टीके एक गोलेके भीतरी भेदको जान | लेनेसे ज्ञात हो जाता है, कि शेष मिट्टीके पदार्थ उसी मृत्तिकाके विभिन्न | नामरूप धारण करनेवाले विकार हैं, और कुछ नहीं है; उसी प्रकार ब्रह्मको | जान लेनेसे दूसरा कुछभी जाननेके लिये नहीं रहता। मुंडक उपनिषदमेंभी | (मुं. १. १. ३) आरंभमेंही यह प्रश्न है, कि "कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं | विज्ञातं भवति" - किसका ज्ञान हो जानेसे अन्य सब वस्तुओंका ज्ञान हो जाता | है? इससे व्यक्त होता है, कि अद्वैत वेदान्तका यही तत्त्व यहांभी अभिप्रेत है, कि | एक परमेश्वरका ज्ञान-विज्ञान हो जानेसे इस जगतमें और कुछभी जाननेके लिये | नहीं रह जाता, क्योंकि जगतका मूल तत्त्व तो एक-ही है, नाम और रूपके | भेदसे वही सर्वत्र समाया हुआ है; । सिवा उसके और कोई दूसरी वस्तु दुनियामें | हैही नहीं, यदि ऐसा न हो तो दूसरे श्लोककी प्रतिज्ञा सार्थक नहीं होती ।] (३) हजारों मनुष्योंमें कोई एक-आधही सिद्धि पानेका यत्न करता है; और प्रयत्न करनेवाले इन (अनेक) सिद्ध पुरुषोंमेंसे एक-आधकोही मेरा सच्चा ज्ञान हो जाता है। | [ध्यान रहे, कि प्रयत्न करनेवालोंको यद्यपि यहाँ सिद्ध पुरुष कह दिया | है, तथापि परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपरही उन्हें सिद्धि प्राप्त होती है, अन्यथा | नहीं। इस परमेश्वर-ज्ञानके क्षर-अक्षर-विचार और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार ये जो | दोन भाग हैं, उनमेंसे क्षर-अक्षर-विचारका अब आरंभ करते हैं:-] (४) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश (ये पांच सूक्ष्म भूत), मन, बुद्धि

सातवाँ अध्याय ७३१ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥ एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥ और अहंकार, इन आठ प्रकारोंमें मेरी प्रकृति विभाजित है। (५) यह अपरा अर्थात् निम्न श्रेणीकी (प्रकृति) है। हे महाबाहु अर्जुन ! यह जान कि इससे भिन्न, इसे जगतको धारण करनेवाली परा अर्थात् उच्च श्रेणीकी जीवस्वरूपी मेरी दूसरी प्रकृति है। (६) समझ रख, कि इन दोनोंसे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं। सारे जगतका प्रभव अर्थात् मूल और प्रलय अर्थात् अंत मैंही हूँ। (७) हे धनंजय ! मुझसे परे और कुछभी नहीं है। धागेमें पिरोयी हुई मणियोंके समान, मुझमें यह सब गुंथा हुआ है। [ इन चारों श्लोकोंमें सब क्षर-अक्षर-ज्ञानका सार आ गया है; और अगले श्लोकोंमें इसीका विस्तार किया है। सांख्यशास्त्रमें सब सृष्टिके अचेतन अर्थात् जड़ प्रकृति और सचेतन पुरुष, ये दो स्वतंत्र तत्त्व बतलाकर प्रतिपादन किया है, कि आगे इन दोनों तत्त्वोंसे सब पदार्थ उत्पन्न हुए, इन दोनोंसे परे तीसरा तत्त्व नहीं है। परंतु गीताको यह द्वैत मंजूर नहीं, अतः प्रकृति और पुरुषको एक-ही परमेश्वरकी दो विभूतियाँ मानकर, चौथे और पाँचवें श्लोकमें वर्णन किया है, कि उनमें जड़ प्रकृति निम्न श्रेणीकी विभूति है, और जीव अर्थात् पुरुष श्रेष्ठ श्रेणीकी विभूति है; और कहा है, कि इन दोनोंसे समस्त स्थावर- जंगम सृष्टि उत्पन्न होती है (गीता १३. २६) इनमेंसे जीवभूत श्रेष्ठ प्रकृतिका विस्तारसहित विचार क्षेत्रज्ञकी दृष्टिसे आगे तेहरवें अध्यायमें किया है। अब रह गई जड़ प्रकृति। सो गीताका सिद्धान्त है (गीता ९. १०), कि वह स्वतंत्र नहीं; परमेश्वरकी अध्यक्षतामें उससे समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि गीतामें प्रकृतिको स्वतंत्र नहीं माना है, तथापि सांख्य- शास्त्रमें प्रकृतिके जो भेद हैं, उन्हींको कुछ हेरफेरसे गीतामें ग्राह्य कर लिया है। (गीतार. प्र. ८, पृ. १८०-१८४) और परमेश्वरसे मायाके द्वारा जड़ प्रकृति उत्पन्न हो चुकनेपर (गीता. ७. १४) सांख्योंका किया हुआ यह वर्णन कि आगे प्रकृतिसे सब पदार्थ कैसे निर्मित हुए अर्थात् गुणोत्कर्षका तत्त्वभी गीताको मान्य है (गीतार. प्र. ९, पृ. २४४)। सांख्योंका कथन है, कि प्रकृति और पुरुष मिलकर कुल पच्चीस तत्त्व हैं। इनमेंसे प्रकृतिसेही तेईस तत्त्व उपजते

७३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥ पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥ । हैं। इन तेईस तत्त्वोंमेंसे पाँच स्थूल भूत, दस इंद्रियाँ और मन, ये सोलह तत्त्व, । शेष सात तत्त्वोंसे निकले हुए अर्थात् उनके विकार हैं। अतएव यह विचार । करते समय कि 'मूल तत्त्व' कितने हैं, इन सोलह तत्त्वोंको छोड़ देते हैं; और । इन्हें छोड़ देनेसे बुद्धि (महान्), अहंकार और पंचतन्मात्राएँ (सूक्ष्म भूत) । मिलकर सातही मूल तत्त्व बचे रहते हैं। सांख्यशास्त्रमें इन्हीं सातोंको 'प्रकृति- । विकृतियाँ कहते हैं। ये सात प्रकृति-विकृतियाँ और मूल प्रकृति मिलकर । अब आठही प्रकारकी प्रकृति हुई; और महाभारत (शां. ३१०. १०-१५) में । इसीको अष्टधा प्रकृति कहा है। परंतु सात प्रकृति-विकृतियोंके साथही मूल । प्रकृतिकी गिनती कर लेना गीताको योग्य नहीं जँचा। क्योंकि ऐसा करनेसे । यह भेद नहीं दिखलाया जाता, कि एक मूल है और उसके सात विकार हैं। । इसीसे गीताके इस वर्गीकरणमें, कि सात प्रकृति-विकृतियाँ और मन मिलकर । अष्टधा मूल प्रकृति है, और महाभारतके वर्गीकरणमें थोड़ा भेद किया गया है । (गीतार. प्र. ८, पृ. १८४)। सारांश, यद्यपि गीताको सांख्यवालोंकी स्वतंत्र । प्रकृति स्वीकृत नही, तथापि स्मरण रहे, कि उसके अगले विस्तारका निरूपण । दोनोंने वस्तुतः समानही किया है। गीताके समान उपनिषद्में वर्णन है, कि । सामान्यतः परब्रह्मसे ही :- । एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ । इससे (पर पुरुष) प्राण, मन, सब इंद्रियाँ, आकाश, वायु, अग्नि, जल और । विश्वको धारण करनेवाली पृथ्वो - ये (सब) उत्पन्न होते हैं (मुंड. २. १. ३; । कै. १. १५; प्रश्न ६. ४)। अधिक जानना हो, तो गीतारहस्यका ८ वाँ प्रकरण । देखो। चौथे श्लोकमें कहा है, कि पृथ्वी, आप प्रभृति पंचतत्त्व मैंही हूँ; । और अब यह कहकर, कि इन तत्त्वोंमें जो गुण हैं, वेभी मैंही हूँ, ऊपरके इस । कथनकाही स्पष्टीकरण करते हैं, कि ये सब पदार्थ एकही धागेमें मणियोंके । समान पिरोये हुए हैं :-] (८) हे कौन्तेय ! जलमें रस मैं हूँ, चंद्र-सूर्यकी प्रभा मैं हूँ, सब वेदोंका प्रणव अर्थात् ॐकार मैं हूँ। आकाशमें शब्द मैं हूँ, और सब पुरुषोंका पौरुषभी मैं हूँ। (९) पृथ्वीमें पुण्यगंध अर्थात् सुगंधी, एवं अग्निका तेज मैं हूँ। सब प्राणि-

सातवाँ अध्याय ७३३ बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥ बलं बलवतामस्मि कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥ ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥ § § त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥ योंकी जीवनशक्ति, और तपस्वियोंका तप मैं हूँ। (१०) हे पार्थ ! मुझको सब प्राणियोंका सनातन बीज समझ । बुद्धिमानोंकी बुद्धि और तेजस्वियोंका तेजभी मैं हूँ। (११) काम (वासना) और राग अर्थात् विषयासक्ति (इन दोनोंको) घटाकर बलवान् लोगोंका बल मैं हूँ; और हे भरतश्रेष्ठ ! प्राणियोंमें, धर्मके विरुद्ध न जानेवाला कामभी मैं हूँ। (१२) और यह समझ, कि जो जो कुछ सात्त्विक, राजस या तामस भाव अर्थात् पदार्थ हैं, वे सब मुझसेही हुए हैं। परंतु वे मुझमे हैं, मैं उनमें नहीं हूँ। | [ "वे मुझमें हैं, मैं उनमें नहीं हूँ इसका अर्थ बड़ाही गंभीर है।" पहला | अर्थात् प्रकट अर्थ यह है, कि सभी पदार्थ परमेश्वरसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये | मणियोंके धागेके समान इन पदार्थोंका गुणधर्मभी यद्यपि परमेश्वरही है, | तथापि परमेश्वरकी व्याप्ति इसीमें नहीं चुक जाती, और समझना चाहिये, कि | इनको व्याप्त कर इनके परेभी वही परमेश्वर है; और यही अर्थ आगे "इस | समस्त जगतको मैं एकांशसे व्याप्त कर रहा हूँ" (गीता १०.४२) इस श्लोकमें | वर्णित है। परंतु इसअर्थके अतिरिक्त दूसराभी अर्थ सदैव विवक्षित रहता है। | वह यह, कि त्रिगुणात्मक जगतका नानात्व यद्यपि मुझसे निर्माण हुआ दीख | पड़ता है, तथापि वह नानात्व मेरे निर्गुण स्वरूपमें नहीं रहता; और इस दूसरे | अर्थको मनमें रखकर "भूतभृत् न च भूतस्थः" (९.४, ५) इत्यादि परमे- | श्वरकी अलौकिक शक्तियोंके वर्णन किये गये हैं (गीता १३.१४-१६)। | इस प्रकार यदि परमेश्वरकी व्याप्ति समस्त जगतसेभी अधिक है, तो प्रकट है, | कि परमेश्वरके सच्चे स्वरूपको पहचाननेके लिये इस मायिक जगतसेभी परे | जाना चाहिये; और अब उसी अर्थको स्पष्टतया प्रतिपादन करते हैं :-] (१३) (सत्त्व, रज और तम इन) तीन गुणात्मक भावोंसे अर्थात् पदार्थोंसे

७३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥ न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥ § § चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥ मोहित होकर यह सारा संसार, इनसे परेके (अर्थात् निर्गुण) मुझ अव्ययको (परमेश्वर) नहीं जानता। [मायाके संबंधमें गीतारहस्यके ९ वें प्रकरणमें यह जो सिद्धान्त है, कि माया अथवा अज्ञान त्रिगुणात्मक देहेंद्रियका धर्म है, न कि आत्माका, आत्मा तो ज्ञानमय और नित्य है, इंद्रियाँ उसको भ्रममें डालती हैं; वही अद्वैती सिद्धान्त ऊपरके श्लोकमें बतलाया है (गीता ७. २४; गीतार. प्र. ९, पृ. २३८-२४८)। (१४) मेरी यह गुणात्मक और दिव्य माया दुस्तर है। अतः इस मायाको वे पारकर जाते हैं, जो मेरीही शरणमें आते हैं। [ इससे प्रकट होता है, कि सांख्यशास्त्रकी त्रिगुणात्मक प्रकृतिकोही गीतामें भगवान् अपनी माया कहते हैं। महाभारतके नारायणीयोपाख्यानमें कहा है, कि नारदको विश्वरूप दिखलाकर अंतमें भगवान् बोले, कि :- माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद । सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैव त्वं ज्ञातुमर्हसि ॥ “हे नारद ! तुम जिसे देख रहे हो, वह मेरी उत्पन्न की हुई माया हैं। तू मुझे सब प्राणियोंके गुणोंसे युक्त मत समझ” (शां. ३३९. ४४)। वही सिद्धान्त अब यहाँभी बतलाया गया है। गीतारहस्यके ९ वें और १० वें प्रकरणमें बतला दिया है, कि माया क्या चीज है] (१५) मायाने जिनका ज्ञान नष्ट कर दिया है, ऐसे मूढ और दुष्कर्मी नराधम आसुरी बुद्धिमें पड़कर मेरी शरणमें नहीं आते। [ यह बतला दिया, कि मायामें डूबे रहनेवाले लोग परमेश्वरको भूल जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं। अब ऐसा न करनेवाले अर्थात् परमेश्वरकी शरणमें जाकर उसकी भक्ति करनेवाले लोगोंका वर्णन करते हैं।] (१६) हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! चार प्रकारके पुण्यात्मा लोग मेरी भक्ति किया करते हैं :- १. आर्त अर्थात् रोगसे पीडित, २. जिज्ञासु अर्थात् ज्ञान प्राप्त- कर लेनेकी इच्छा करनेवाले, ३. अर्थार्थी अर्थात् द्रव्य आदि काम्य वासनाओंको

सातवाँ अध्याय ७३५ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेव नुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सु र्लभः ॥ १९ ॥ मनमें रखनेवाले, और ४. ज्ञानी अर्थात् परमेश्वरका ज्ञान पाकर कृतार्थ हो जानेसे आगे कुछ प्राप्त न करना हो, तोभी निष्काम बुद्धिसे भक्ति करनेवाले । ( १७ ) इसमेंसे एक भक्ति अर्थात् अनन्यभावसे मेरी भक्ति करनेवाले और सदैव युक्त यानी निष्काम बुद्धिसे बर्तनेवाले ज्ञानीकी योग्यता विशेष है, ज्ञानीको मैं अत्यंत प्रिय हूँ, और ज्ञानी मुझे ( अत्यंत ) प्रिय है। ( १८ ) ये सभी भक्त उदार अर्थात् अच्छे हैं; पर मेरा मत है, कि ज्ञानी तो आत्माही है। क्योंकि, वह युक्तचित्त होकर ( सबकी ) उत्तमोत्तम गतिस्वरूप मुझमेंही ( उनमें ) ठहरा रहता है। ( १९ ) अनेक जन्मोंके अनन्तर यह अनुभव हो जानेसे कि जो कुछ है, वह सब वासुदेवही है, ज्ञानवान् मुझे पा लेता है। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है। | [क्षर-अक्षरकी दृष्टिसे भगवानने अपने स्वरूपका यह ज्ञान बतला दिया, | कि प्रकृति और पुरुष, दोनों मेरेही स्वरूप हैं, और चारों ओर मैंही एकतासे | भरा हूँ, इसके साथही भगवानने ऊपर जो यह बतलाया है, कि इस स्वरूपकी | भक्ति करनेसे परमेश्वरकी पहचान हो जाती है, उसके तात्पर्यको भली भाँति | स्मरण रखना चाहिये । उपासना सभीको चाहिये, फिरे चाहे व्यक्तकी करो, | चाहे अव्यक्तकी, परंतु इन दोनोंमें व्यक्तकी उपासना सुलभ होनेके कारण | यहाँ उसीका वर्णन है; और उसीका नाम भक्ति है। तथापि स्वार्थ-बुद्धिको | मनमें रखकर किसी विशेष हेतुके लिये परमेश्वरकी भक्ति करना निम्न- | श्रेणीकी भक्ति है और परमेश्वरका ज्ञान पानेके हेतुसे भक्ति करनेवालेकोभी | ( जिज्ञासु ) कच्चाही समझना चाहिये; क्योंकि उसकी जिज्ञासुत्व-अवस्थासेही | व्यक्त होता है, कि अभीतक उसको परिपूर्ण ज्ञान नहीं हुआ। तथापि | कहा है, कि ये सब भक्ति करनेवाले होनेके कारण सभी उदार अर्थात् | अच्छे मार्गसे जानेवाले हैं ( श्लो. १८ )। परंतु पहले तीन श्लोकोंका तात्पर्य | है, कि इसकेभी आगे जाकर अर्थात् ज्ञान-प्राप्तिसे कृतार्थ हो करके जिन्हें इस | जगतमें करने अथवा पानेके लिये कुछभी शेष नहीं रह जाता ( गीता ३. १७- | १९ ), ऐसे ज्ञानी पुरुष निष्कामबुद्धिसे जो भक्ति करते हैं ( भाग. १. ७. १० ) | वही सब श्रेष्ठ है। प्रल्हाद-नारद आदिकी भक्ति इसी श्रेष्ठ श्रेणीकी है, और

७३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥ स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥ | इसीसे भागवतमें भक्तिका लक्षण भक्तियोग अर्थात् परमेश्वरकी निर्हेतुक और | निरंतर भक्ति माना है, (भाग. ३. २९. १२; गीतार. प्र. १३, पृ. ४११-४१२)। | १७ वें और १९ वें श्लोकके 'एकभक्तिः' और 'वासुदेवः' पद भागवत धर्मके हैं, | और यहक हनेमें कोई क्षति नहीं, कि भक्तोंका उक्त सभी वर्णन भागवत धर्म- | काही है। क्योंकि महाभारतमें (मभा. शां. ३४१. ३३-३५) इस धर्मके वर्णनमें | चतुर्विध भक्तोंका पहले उल्लेख करके फिर कहा है, कि :- | चतुर्विधा मम जना भक्ता एवं हि मे श्रुतम् । | तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठा ये चैवानन्यदेवताः ।। | अहमेव गतिस्तेषां निराशोःकर्मकारिणाम् ॥ | ये च शिष्टास्त्रयो भक्ताः फलकामा हि ते मताः । | सर्वे च्यवनधर्म्भास्ते प्रतिबुद्धस्तु श्रेष्ठभाक् ।। | अनन्यदैवत और एकान्तिक भक्त जिस प्रकार 'निराशीं:' अर्थात् फलाशारहित | कर्म करता है, उस प्रकार अन्य तीन भक्त नहीं करते, वे कुछ-न-कुछ हेतु मनमें | रखकर भक्ति करते हैं; इसीसे वे तीनों च्यवनशील हैं; और एकान्ती प्रति- | बुद्ध (अर्थात् जानकार) श्रेष्ठ हैं। एवं आगे 'वासुदेव' शब्दकी आध्यात्मिक | व्युत्पत्तियोंकी है - “सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम्” - मैं प्राणिमात्रमें | वास करता हूँ, इसीसे मुझको वासुदेव कहते हैं (मभा. शां. ३४१. ४०)। | अस्तु; अब यह वर्णन करते हैं, कि यदि सर्वत्र एकही परमेश्वर है, तो लोग | भिन्न भिन्न देवताओंकी उपासना क्यों करते हैं, और ऐसे उपासकोंको क्या फल | मिलता है :-] (२०) अपनी-अपनी प्रकृतिके नियमानुसार भिन्न भिन्न (स्वर्ग आदि फलोंकी) कामवासनाओसे पागल हुए लोग, भिन्न भिन्न (उपासनाओंके) नियमोंको पालकर दूसरे (भिन्नभिन्न) देवताओंको भजते रहते हैं। (२१) जो भक्त जिस रूपकी अर्थात् देवताकी श्रद्धासे उपासना करना चाहता है, उसकी उसी श्रद्धाको मैं स्थिर कर देता हूँ। (२२) फिर उस श्रद्धासे युक्त होकर, वह

सातवाँ अध्याय ७३७ अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥ उस देवताकी आराधना करने लगता है; एवं उसको मेरेही निर्माण किये हुए काम- फल मिलते हैं। (२३) परंतु (इन) अल्प-बुद्धि लोगोंको मिलनेवाला यह फल नाशवान् है (मोक्षके समान स्थिर रहनेवाला नहीं है)। देवताओंको भजनेवाले उनके पास जाते हैं, और मेरे भक्त मेरे यहाँ आते हैं। [साधारण मनुष्योंकी समझ होती है, कि यद्यपि परमेश्वर मोक्षदाता है तथापि संसारके लिये आवश्यक अनेक इच्छित वस्तुओंको देनेकी शक्ति देवताओं, मेंही है; और इसीलिये इन्हीं देवताओंकी उपासना करनी चाहिये । इस प्रकार जब यह समझ दृढ़ हो गई, कि देवताओंकी उपासना करनी चाहिये; तब अपनी अपनी स्वाभाविक श्रद्धाके अनुसार (गीता १७. १-६) कोई पीपल पूजते हैं, कोई किसी चबूतरेकी पूजा करते हैं और कोई किसी बड़ी भारी शिलाको सिंदूरसे रँगकर पूजते रहते हैं। इस बातका वर्णन उक्त श्लोकोंमें सुंदर रीतिसे किया गया है। इसमें ध्यान देनेयोग्य पहली बात यह है, कि भिन्न भिन्न देवताओंकी आराधनासे जो फल मिलता है, आराधक समझते हैं, कि उसके देनेवाले वेही देवता हैं; परंतु पर्यायसे वह परमेश्वरकी पूजा हो जाती है (गीता ९. २३) और तात्त्विक दृष्टिसे वह फलभी परमेश्वरही दिया करता है (श्लो. २२); यही नहीं, तो इस देवताकी आराधना करनेकी बुद्धिभी मनुष्यके पूर्वकर्मानुसार परमेश्वरही देता है (श्लोक २१)। क्योंकि इस जगतमें परमेश्वरके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वेदान्तसूत्र (३. २. ३८-४१) और उपनिषदमेंभी (कौषी. ३. ८) यही सिद्धान्त है। इन भिन्न भिन्न देवताओंकी भक्ति करते करते बुद्धि स्थिर और शुद्ध हो जाती है, तथा अंतमें एक एवं नित्य परमेश्वरका ज्ञान होता है - यही इन भिन्न भिन्न उपासनाओंका उपयोग है। परंतु इससे पहले जो फल मिलते हैं, वे सभी अनित्य होते हैं। अतः भगवान्का उपदेश है, कि इन फलोंकी आशामें न उलझकर 'ज्ञानी' भक्त होनेकी उमंग प्रत्येक मनुष्यको रखनी चाहिये । यद्यपि भगवान् सब बातोंके करनेवाले और सब फलोंके दाता हैं, तोभी वे जिसके जैसे कर्म होंगे, तदनुसारही तो फल देंगे (गीता ४. ११), अतः तात्त्विक दृष्टिसे यहभी कहा जाता है, कि वे स्वयं कुछभी नहीं करते (गीता ५. १४)। गीतारहस्यके १० वें (पृ. २६९) और १३ वें प्रकरणमें (पृ. ४२८-४२९) इस विषयका अधिक विवेचन है; उसे देखो। कुछ लोग यह भूल जाते हैं, कि देवताओंकी आराधनाका फलभी परमेश्वरही देता है। और वे प्रकृति-स्वभावके अनुसार इन देवताओंकी धुनमें लग जाते हैं; अब ऊपरके इसी वर्णनका स्पष्टी- करण करते हैं :- ] गी. र. ४७

७३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥ नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥ (२४) अबुद्धि अर्थात् मूढ़ लोग, मेरे परं अर्थात् श्रेष्ठ, उत्तमोत्तम और अव्यक्त रूपको न जानकर मुझ अव्यक्तको व्यक्त हुआ मानते हैं। (२५) अपनी योगरूप मायासे आच्छादित रहनेके कारण मैं सबको (अपने स्वरूपसे) प्रकट नहीं दीखता। मूढ लोग नहीं जानते, कि मैं अज और अव्यय हूँ। [ अव्यक्त स्वरूपको छोड़कर व्यक्त स्वरूप धारणकर लेनेकी युक्तिको योग कहते हैं (गीता ४. ६; ७. २५; ९. ७) । वेदान्ती लोग इसीको माया कहते हैं, और इस योगमायासे ढँका हुआ परमेश्वर व्यक्त-स्वरूपधारी होता है। सारांश, इस श्लोकका भावार्थ यह है, कि व्यक्त सृष्टि मायिक अथवा अनित्य है और अव्यक्त परमेश्वर सच्चा या नित्य है। परंतु कुछ लोग इस स्थानपर और अन्य स्थानोंपरभी 'माया' शब्दका 'अलौकिक' अथवा 'विलक्षण शक्ति' अर्थ मानकर प्रतिपादन करते हैं, कि यह माया मिथ्या नहीं है, परमेश्वरके समानही नित्य है। गीतारहस्यके नवें प्रकरणमें मायाके स्वरूपका विस्तारसहित विचार किया है, इस कारण यहाँ इतनाही कह देते हैं, कि यह बात अद्वैत वेदान्त- कोभी मान्य है, कि माया परमेश्वरकीही कोई विलक्षण और अनादि लीला है। क्योंकि, माया यद्यपि इंद्रियोंका उत्पन्न किया हुआ है, तथापि इंद्रियाँभी परमे- श्वरकी सत्तासेही यह काम करती हैं, अतएव अंतमें इस मायाको परमेश्वरकीही लीला कहना पड़ता है। वाद है केवल इसके तत्त्वतः सत्य या मिथ्या होनेमें; सो उक्त श्लोकसे प्रकट होता है, कि विषयमें अद्वैत वेदान्तके समानही गीताकाभी यही सिद्धान्त है, कि जिस नामरूपात्मक मायासे अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त माना जाता है, वह माया, - फिर चाहे उसे अलौकिक शक्ति कहो या और कुछ कहो

  • 'अज्ञानसे' उपजी हुई दिखाऊ वस्तु या 'मोह' है, और सत्य परमेश्वर-तत्त्व इससे पृथक् है। यदि ऐसा न हो, तो 'अबुद्धि' 'मूढ़' शब्दोंके प्रयोग करनेका कोई कारण नहीं दीख पड़ता। सारांश, माया सत्य नहीं है, सत्य है एक परमेश्वरही। किंतु गीताका कथन है, कि इस मायासे भूले रहनेसे लोग अनेक देवताओंके फंदेमें पड़े रहते हैं। बृहदारण्यक उपनिषदमे (बृ. १. ४. १०) इसी प्रकारका वर्णन है; वहाँ कहा है, कि जो लोग आत्मा और ब्रह्मको एकही न जान कर भेदभावसे भिन्न भिन्न देवताओंके फंदेमें पड़े रहते हैं, वे 'देवताओंके पशु' हैं, अर्थात् गाय आदि पशुओसे जैसे मनुष्यको फायदा होता है, वैसेही इन अज्ञानी भक्तोंसे सिर्फ़

सातवाँ अध्याय ७३९ वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥ इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥ २७ ॥ येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥ § § जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥ साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ | देवताओंकाही फायदा है, उनके भक्तोंको मोक्ष नही मिलता । मायामें उलझ | कर भेदभावसे अनेक देवताओंकी उपासना करनेवालोंका वर्णन हो चुका; अब | बतलाते हैं, कि इस मायासे धीरे धीरे छुटकारा क्योंकर होता है :- ] (२६) हे अर्जुन ! भूत, वर्तमान और भविष्यत् ( कालमें जो हो चुके हैं उन्हें, मौजूदा और आगे होनेवाले ) सभी प्राणियोंको मैं जानता हूँ; परंतु मुझे कोईभी नहीं जानता । (२७) क्योंकि हे भारत ! ( इंद्रियोंकी ) इच्छाओं और द्वेषसे उपजनेवाले (सुख-दुःख आदि) द्वंद्वोंके मोहसे समस्त प्राणी, हे परंतप ! इस सृष्टिमें भ्रममें फँस जाते हैं । (२८) परंतु जिन पुण्यात्माओंके पापका अंत हो गया है, वे (सुख-दुःख आदि) द्वंद्वोंके मोहसे छूट कर दृढव्रत ही करके मेरी भक्ति करते हैं । | [ इस प्रकार मायासे छुटकारा हो चुकनेपर, आगे उनकी जो स्थिति | होती है, उसका वर्णन करते हैं :- ] (२९) जो ( इस प्रकार ) मेरा आश्रयकर जरा-मरणसे अर्थात् पुनर्जन्मके चक्करसे छूटनेके लिये प्रयत्न करते हैं, वे (सब) ब्रह्म, (सब) अध्यात्म और सब कर्मको जान लेते हैं । (३०) और अधिभूत, अधिदैव एवं अधियज्ञसहित ( अर्थात् यह इस प्रकार, कि मैंही यह सब हूँ ) जो मुझे जानते हैं, वे युक्तचित्त ( होनेके कारण ) मरण-कालमेंभी मुझे जानते हैं । | [ अगले अध्यायमें अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञका निरूपण | किया है। धर्मशास्त्रका और उपनिषदोंका सिद्धान्त है, कि मरण-कालमें मनुष्यके

७४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । मनमें जो बुद्धि प्रबल रहती है, उसके अनुसार उसे आगे जन्म मिलता है; इस । सिद्धान्तको लक्ष्य करके अंतिम श्लोकमें 'मरण-कालमेंभी' शब्द हैं; तथापि उक्त । श्लोकके 'भी' पदसे स्पष्ट होता है, कि मरनेसे पहले परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान । हुए बिना केवल अंतकालमेंही यह ज्ञान नहीं हो सकता (गीता २. ७२) । । विशेष विवरण अगले अध्यायमें है । कह सकते हैं, कि इन दो श्लोकोंमें अधिभूत । आदि शब्दोंसे आगेके अध्यायकी प्रस्तावनाही की गई है । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग-शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, ज्ञानविज्ञानयोग नामक सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।

आठवाँ अध्याय ७४१ आठवाँ अध्याय [ इस अध्यायमें कर्मयोगके अंतर्गत ज्ञान-विज्ञानका निरूपणही हो रहा है, और पिछले अध्यायमें ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ, ये जो परमेश्वरके स्वरूपके विविध भेद कहे हैं, पहले उनका अर्थ बतलाकर विवेचन किया है, कि उनमें क्या तथ्य है। परंतु यह विवेचन उन शब्दोंकी केवल व्याख्या करके अर्थात् अत्यंत संक्षिप्त रीतिसे किया है, अतः यहाँपर उक्त विषयका कुछ अधिक स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है। बाह्य सृष्टिके अवलोकनसे उसके कर्ताकी कल्पना अनेक लोग अनेक रीतियोंसे किया करते हैं। १. कोई कहते हैं, कि सृष्टिके सब पदार्थ पंचमहाभूतोंकेही विकार हैं और इन पंचमहाभूतोंको छोड़ मूलमें दूसरा कोईभी तत्त्व नहीं है। २. दूसरे कई लोग यह प्रतिपादन करते हैं, कि गीताके चौथे अध्यायके वर्णनके अनुसार समस्त जगत् यज्ञसे हुआ है, इसलिये यह परमेश्वर यज्ञनारायणरूपी है और यज्ञसेही उसकी पूजा होती है। ३. और कुछ लोगोंका कहना है, कि जड़ पदार्थ स्वयं सृष्टिके व्यापार नहीं करते; किंतु उनमेंसे प्रत्येकमें कोई-न-कोई सचेतन पुरुष या देवता रहते हैं; जो कि इन व्यवहारोंको किया करते हैं, और इसीलिये हमें उन देवताओंकी आराधना करनी चाहिये। उदा- हरणार्थ, जड़ पांचभौतिक सूर्यके गोलेमें सूर्य नामका जो पुरुष है, वही प्रकाश देने वगैरेहका काम किया करता है, अतएव वही उपास्य है। ४. चौथे पक्षका कथन है, कि प्रत्येक पदार्थमें उस पदार्थसे भिन्न किसी देवताका निवास मानना ठीक नहीं है। जैसे मनुष्यके शरीरमें आत्मा है, वैसेही प्रत्येक वस्तुमें उसी वस्तुका कुछ-न-कुछ सूक्ष्म रूप अर्थात् आत्माके समान सूक्ष्म शक्ति वास करती है और वही उसका मूल और सच्चा स्वरूप है। उदाहरणार्थ, पंच स्थूल महाभूतोंमें पंच-सूक्ष्म- तन्मात्राएँ, और हाथ-पैर आदि स्थूल इंद्रियोंमें सूक्ष्म इंद्रियाँ मूलभूत रहती हैं। इसी चौथे तत्त्वपर सांख्योंका यह मतभी अवलंबित है, कि प्रत्येक मनुष्यका आत्माभी पृथक् पृथक् है और पुरुष असंख्य हैं; परंतु जान पड़ता है, कि यहाँ इस सांख्य मतका ‘अधिदेह’ वर्गमें समावेश किया गया है। उक्त चार पक्षोंकोही क्रमसे अधिभूत, अधियज्ञ, अधिदैवत और अध्यात्म कहते हैं। किसीभी शब्दके पीछे ‘अधि’ उपसर्ग रहनेसे यह अर्थ होता है - ‘तमधिकृत्य’, ‘तद्विषयक’, ‘उस संबंधका’ या ‘उसमें रहनेवाला’। इस अर्थके अनुसार अधिदैवत अनेक देवताओंमें रहनेवाला तत्त्व है। साधारणतया अध्यात्म उस शास्त्रको कहते हैं, जो यह प्रतिपादन करता है, कि सर्वत्र एकही आत्मा है। किंतु यह अर्थ सिद्धान्त पक्षका है। अर्थात् पूर्वपक्षके इस कथनकी जाँच करके, कि “अनेक वस्तुओं या मनुष्योंमेंभी अनेक आत्मा हैं”, वेदान्तशास्त्रने आत्माकी एकताके इस सिद्धान्तको निश्चित

७४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर दिया है । अतः पूर्वपक्षका जब विचार करना होता है, तब माना जाता है, कि प्रत्येक पदार्थका सूक्ष्म स्वरूप या आत्मा पृथक् पृथक् है; और यहाँपर अध्यात्म शब्दसे यही अर्थ अभिप्रेत है । महाभारतमें मनुष्यकी इंद्रियोंका उदाहरण देकर स्पष्ट कर दिया है, कि अध्यात्म, अधिदैवत और अधिभूत-दृष्टिसे एकही विवेचनके इस प्रकार भिन्न भिन्न भेद क्योंकर होते हैं ? ( मभा. शां. ३१३; अश्व. ४१ ) । महाभारतकार कहते हैं, कि मनुष्यकी इंद्रियोंका विवेचन तीन तरहसे किया जा सकता है, जैसे - अधिभूत, अध्यात्म और अधिदैवत । इन इंद्रियोंके द्वारा जो विषय ग्रहण किये जाते हैं - उदाहरणार्थ, हाथोंसे जो लिया जाता है, कानोंसे जो सुना जाता है, आँखोंसे जो देखा जाता है या मनसे जिसका चिंतन किया जाता है,

  • वे सब अधिभूत हैं; और हाथ-पैर आदिके ( सांख्यशास्त्रोक्त ) सूक्ष्म स्वभाव अर्थात् सूक्ष्म इंद्रियाँ, इन इंद्रियोंके अध्यात्म हैं । परंतु इन दोनों दृष्टियोंको छोड़कर अधिदैवत-दृष्टिसे विचार करनेपर - अर्थात् यह मान करके, कि हाथोंके देवता इंद्र, पैरोंके विष्णु, गुदके मित्र, उपस्थके प्रजापति, वाणीके अग्नि, आँखोंके सूर्य, कानोंके आकाश अथवा दिशा, जीभके जल, नाकके पृथ्वी, त्वचाके वायु, मनके चंद्रमा, अहंकारके बुद्धि, और बुद्धिके देवता पुरुष हैं । - कहा जाता है, कि येही देवता अपनी अपनी इंद्रियोंके व्यापार किया करते हैं; उपनिषदोंमेंभी उपासनाके लिये ब्रह्मस्वरूपके जो प्रतीक वर्णित हैं, उनमें मनको अध्यात्म और सूर्य अथवा आकाशको अधिदैवत प्रतीक कहा है ( छां. ३. १८. १ ) । अध्यात्म और अधिदैवतका यह भेद केवल उपासनाके लियेही नहीं किया गया है, बल्कि जब इस प्रश्नका निर्णय करना पडा, कि वाणी, चक्षु और श्रोत्र प्रभृति इंद्रियों एवं प्राणोंमें श्रेष्ठ कौन है ? तब उपनिषदोंमें ( बृ. १. ५. २१-२३ ; छां. १. २-३ ; कौषी. ४. १२-१३ ) एक बार वाणी, चक्षु और श्रोत्र इन सूक्ष्म इंद्रियोंको लेकर अध्यात्म दृष्टिसे विचार किया गया है, तथा दूसरी बार उन्हीं इंद्रियोंके देवता अग्नि, सूर्य और आकाशको लेकर अधिदैवत-दृष्टिसे विचार किया गया है । सारांश यह है, कि अधिदैवत, अधिभूत और अध्यात्म आदि भेद प्राचीन कालसे चले आ रहे हैं, और यह प्रश्नभी उसी जमानेका है, कि परमेश्वरके स्वरूपकी इन भिन्न भिन्न कल्पनाओंमेंसे सच्ची कौन है अथवा उसका तथ्य क्या है ? बृहदारण्यक उपनिषद्में ( बृ. ३. ७ ) याज्ञवल्क्यने उद्दालक आरुणिसे कहा है, कि सब प्राणियोंमें, सब देवताओंमें, समग्र अध्यात्ममें, सब लोगोंमें, सब यज्ञोंमें और सब देहोंमें व्याप्त होकर, उनके न समझनेपरभी, उनको नचानेवाला एक-ही परमात्मा है । उपनिषदोंका यही सिद्धान्त वेदान्त-सूत्रके अंतर्यामी अधिकरणमें है ( वे. सू. १. २. १८-२० ), और वहीं यह सिद्ध किया है, कि सबके अंतःकरणमें रहनेवाला यह तत्त्व सांख्योंकी प्रकृति या जीवात्मा नहीं है, किंतु पर- मात्मा है । इसी सिद्धान्तके अनुरोधसे भगवान् अब अर्जुनसे कहते हैं, कि मनुष्यकी देहमें, सब प्राणियोंमें ( अधिभूत ), सब यज्ञोंमें ( अधियज्ञ ), सब देवताओंमें