श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥ स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥ | इसीसे भागवतमें भक्तिका लक्षण भक्तियोग अर्थात् परमेश्वरकी निर्हेतुक और | निरंतर भक्ति माना है, (भाग. ३. २९. १२; गीतार. प्र. १३, पृ. ४११-४१२)। | १७ वें और १९ वें श्लोकके 'एकभक्तिः' और 'वासुदेवः' पद भागवत धर्मके हैं, | और यहक हनेमें कोई क्षति नहीं, कि भक्तोंका उक्त सभी वर्णन भागवत धर्म- | काही है। क्योंकि महाभारतमें (मभा. शां. ३४१. ३३-३५) इस धर्मके वर्णनमें | चतुर्विध भक्तोंका पहले उल्लेख करके फिर कहा है, कि :- | चतुर्विधा मम जना भक्ता एवं हि मे श्रुतम् । | तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठा ये चैवानन्यदेवताः ।। | अहमेव गतिस्तेषां निराशोःकर्मकारिणाम् ॥ | ये च शिष्टास्त्रयो भक्ताः फलकामा हि ते मताः । | सर्वे च्यवनधर्म्भास्ते प्रतिबुद्धस्तु श्रेष्ठभाक् ।। | अनन्यदैवत और एकान्तिक भक्त जिस प्रकार 'निराशीं:' अर्थात् फलाशारहित | कर्म करता है, उस प्रकार अन्य तीन भक्त नहीं करते, वे कुछ-न-कुछ हेतु मनमें | रखकर भक्ति करते हैं; इसीसे वे तीनों च्यवनशील हैं; और एकान्ती प्रति- | बुद्ध (अर्थात् जानकार) श्रेष्ठ हैं। एवं आगे 'वासुदेव' शब्दकी आध्यात्मिक | व्युत्पत्तियोंकी है - “सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम्” - मैं प्राणिमात्रमें | वास करता हूँ, इसीसे मुझको वासुदेव कहते हैं (मभा. शां. ३४१. ४०)। | अस्तु; अब यह वर्णन करते हैं, कि यदि सर्वत्र एकही परमेश्वर है, तो लोग | भिन्न भिन्न देवताओंकी उपासना क्यों करते हैं, और ऐसे उपासकोंको क्या फल | मिलता है :-] (२०) अपनी-अपनी प्रकृतिके नियमानुसार भिन्न भिन्न (स्वर्ग आदि फलोंकी) कामवासनाओसे पागल हुए लोग, भिन्न भिन्न (उपासनाओंके) नियमोंको पालकर दूसरे (भिन्नभिन्न) देवताओंको भजते रहते हैं। (२१) जो भक्त जिस रूपकी अर्थात् देवताकी श्रद्धासे उपासना करना चाहता है, उसकी उसी श्रद्धाको मैं स्थिर कर देता हूँ। (२२) फिर उस श्रद्धासे युक्त होकर, वह