भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 782

सातवाँ अध्याय ७३७ अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥ उस देवताकी आराधना करने लगता है; एवं उसको मेरेही निर्माण किये हुए काम- फल मिलते हैं। (२३) परंतु (इन) अल्प-बुद्धि लोगोंको मिलनेवाला यह फल नाशवान् है (मोक्षके समान स्थिर रहनेवाला नहीं है)। देवताओंको भजनेवाले उनके पास जाते हैं, और मेरे भक्त मेरे यहाँ आते हैं। [साधारण मनुष्योंकी समझ होती है, कि यद्यपि परमेश्वर मोक्षदाता है तथापि संसारके लिये आवश्यक अनेक इच्छित वस्तुओंको देनेकी शक्ति देवताओं, मेंही है; और इसीलिये इन्हीं देवताओंकी उपासना करनी चाहिये । इस प्रकार जब यह समझ दृढ़ हो गई, कि देवताओंकी उपासना करनी चाहिये; तब अपनी अपनी स्वाभाविक श्रद्धाके अनुसार (गीता १७. १-६) कोई पीपल पूजते हैं, कोई किसी चबूतरेकी पूजा करते हैं और कोई किसी बड़ी भारी शिलाको सिंदूरसे रँगकर पूजते रहते हैं। इस बातका वर्णन उक्त श्लोकोंमें सुंदर रीतिसे किया गया है। इसमें ध्यान देनेयोग्य पहली बात यह है, कि भिन्न भिन्न देवताओंकी आराधनासे जो फल मिलता है, आराधक समझते हैं, कि उसके देनेवाले वेही देवता हैं; परंतु पर्यायसे वह परमेश्वरकी पूजा हो जाती है (गीता ९. २३) और तात्त्विक दृष्टिसे वह फलभी परमेश्वरही दिया करता है (श्लो. २२); यही नहीं, तो इस देवताकी आराधना करनेकी बुद्धिभी मनुष्यके पूर्वकर्मानुसार परमेश्वरही देता है (श्लोक २१)। क्योंकि इस जगतमें परमेश्वरके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वेदान्तसूत्र (३. २. ३८-४१) और उपनिषदमेंभी (कौषी. ३. ८) यही सिद्धान्त है। इन भिन्न भिन्न देवताओंकी भक्ति करते करते बुद्धि स्थिर और शुद्ध हो जाती है, तथा अंतमें एक एवं नित्य परमेश्वरका ज्ञान होता है - यही इन भिन्न भिन्न उपासनाओंका उपयोग है। परंतु इससे पहले जो फल मिलते हैं, वे सभी अनित्य होते हैं। अतः भगवान्का उपदेश है, कि इन फलोंकी आशामें न उलझकर 'ज्ञानी' भक्त होनेकी उमंग प्रत्येक मनुष्यको रखनी चाहिये । यद्यपि भगवान् सब बातोंके करनेवाले और सब फलोंके दाता हैं, तोभी वे जिसके जैसे कर्म होंगे, तदनुसारही तो फल देंगे (गीता ४. ११), अतः तात्त्विक दृष्टिसे यहभी कहा जाता है, कि वे स्वयं कुछभी नहीं करते (गीता ५. १४)। गीतारहस्यके १० वें (पृ. २६९) और १३ वें प्रकरणमें (पृ. ४२८-४२९) इस विषयका अधिक विवेचन है; उसे देखो। कुछ लोग यह भूल जाते हैं, कि देवताओंकी आराधनाका फलभी परमेश्वरही देता है। और वे प्रकृति-स्वभावके अनुसार इन देवताओंकी धुनमें लग जाते हैं; अब ऊपरके इसी वर्णनका स्पष्टी- करण करते हैं :- ] गी. र. ४७

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