भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 783

७३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥ नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥ (२४) अबुद्धि अर्थात् मूढ़ लोग, मेरे परं अर्थात् श्रेष्ठ, उत्तमोत्तम और अव्यक्त रूपको न जानकर मुझ अव्यक्तको व्यक्त हुआ मानते हैं। (२५) अपनी योगरूप मायासे आच्छादित रहनेके कारण मैं सबको (अपने स्वरूपसे) प्रकट नहीं दीखता। मूढ लोग नहीं जानते, कि मैं अज और अव्यय हूँ। [ अव्यक्त स्वरूपको छोड़कर व्यक्त स्वरूप धारणकर लेनेकी युक्तिको योग कहते हैं (गीता ४. ६; ७. २५; ९. ७) । वेदान्ती लोग इसीको माया कहते हैं, और इस योगमायासे ढँका हुआ परमेश्वर व्यक्त-स्वरूपधारी होता है। सारांश, इस श्लोकका भावार्थ यह है, कि व्यक्त सृष्टि मायिक अथवा अनित्य है और अव्यक्त परमेश्वर सच्चा या नित्य है। परंतु कुछ लोग इस स्थानपर और अन्य स्थानोंपरभी 'माया' शब्दका 'अलौकिक' अथवा 'विलक्षण शक्ति' अर्थ मानकर प्रतिपादन करते हैं, कि यह माया मिथ्या नहीं है, परमेश्वरके समानही नित्य है। गीतारहस्यके नवें प्रकरणमें मायाके स्वरूपका विस्तारसहित विचार किया है, इस कारण यहाँ इतनाही कह देते हैं, कि यह बात अद्वैत वेदान्त- कोभी मान्य है, कि माया परमेश्वरकीही कोई विलक्षण और अनादि लीला है। क्योंकि, माया यद्यपि इंद्रियोंका उत्पन्न किया हुआ है, तथापि इंद्रियाँभी परमे- श्वरकी सत्तासेही यह काम करती हैं, अतएव अंतमें इस मायाको परमेश्वरकीही लीला कहना पड़ता है। वाद है केवल इसके तत्त्वतः सत्य या मिथ्या होनेमें; सो उक्त श्लोकसे प्रकट होता है, कि विषयमें अद्वैत वेदान्तके समानही गीताकाभी यही सिद्धान्त है, कि जिस नामरूपात्मक मायासे अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त माना जाता है, वह माया, - फिर चाहे उसे अलौकिक शक्ति कहो या और कुछ कहो

  • 'अज्ञानसे' उपजी हुई दिखाऊ वस्तु या 'मोह' है, और सत्य परमेश्वर-तत्त्व इससे पृथक् है। यदि ऐसा न हो, तो 'अबुद्धि' 'मूढ़' शब्दोंके प्रयोग करनेका कोई कारण नहीं दीख पड़ता। सारांश, माया सत्य नहीं है, सत्य है एक परमेश्वरही। किंतु गीताका कथन है, कि इस मायासे भूले रहनेसे लोग अनेक देवताओंके फंदेमें पड़े रहते हैं। बृहदारण्यक उपनिषदमे (बृ. १. ४. १०) इसी प्रकारका वर्णन है; वहाँ कहा है, कि जो लोग आत्मा और ब्रह्मको एकही न जान कर भेदभावसे भिन्न भिन्न देवताओंके फंदेमें पड़े रहते हैं, वे 'देवताओंके पशु' हैं, अर्थात् गाय आदि पशुओसे जैसे मनुष्यको फायदा होता है, वैसेही इन अज्ञानी भक्तोंसे सिर्फ़