श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय ७३९ वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥ इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥ २७ ॥ येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥ § § जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥ साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ | देवताओंकाही फायदा है, उनके भक्तोंको मोक्ष नही मिलता । मायामें उलझ | कर भेदभावसे अनेक देवताओंकी उपासना करनेवालोंका वर्णन हो चुका; अब | बतलाते हैं, कि इस मायासे धीरे धीरे छुटकारा क्योंकर होता है :- ] (२६) हे अर्जुन ! भूत, वर्तमान और भविष्यत् ( कालमें जो हो चुके हैं उन्हें, मौजूदा और आगे होनेवाले ) सभी प्राणियोंको मैं जानता हूँ; परंतु मुझे कोईभी नहीं जानता । (२७) क्योंकि हे भारत ! ( इंद्रियोंकी ) इच्छाओं और द्वेषसे उपजनेवाले (सुख-दुःख आदि) द्वंद्वोंके मोहसे समस्त प्राणी, हे परंतप ! इस सृष्टिमें भ्रममें फँस जाते हैं । (२८) परंतु जिन पुण्यात्माओंके पापका अंत हो गया है, वे (सुख-दुःख आदि) द्वंद्वोंके मोहसे छूट कर दृढव्रत ही करके मेरी भक्ति करते हैं । | [ इस प्रकार मायासे छुटकारा हो चुकनेपर, आगे उनकी जो स्थिति | होती है, उसका वर्णन करते हैं :- ] (२९) जो ( इस प्रकार ) मेरा आश्रयकर जरा-मरणसे अर्थात् पुनर्जन्मके चक्करसे छूटनेके लिये प्रयत्न करते हैं, वे (सब) ब्रह्म, (सब) अध्यात्म और सब कर्मको जान लेते हैं । (३०) और अधिभूत, अधिदैव एवं अधियज्ञसहित ( अर्थात् यह इस प्रकार, कि मैंही यह सब हूँ ) जो मुझे जानते हैं, वे युक्तचित्त ( होनेके कारण ) मरण-कालमेंभी मुझे जानते हैं । | [ अगले अध्यायमें अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञका निरूपण | किया है। धर्मशास्त्रका और उपनिषदोंका सिद्धान्त है, कि मरण-कालमें मनुष्यके