श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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७४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र । मनमें जो बुद्धि प्रबल रहती है, उसके अनुसार उसे आगे जन्म मिलता है; इस । सिद्धान्तको लक्ष्य करके अंतिम श्लोकमें 'मरण-कालमेंभी' शब्द हैं; तथापि उक्त । श्लोकके 'भी' पदसे स्पष्ट होता है, कि मरनेसे पहले परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान । हुए बिना केवल अंतकालमेंही यह ज्ञान नहीं हो सकता (गीता २. ७२) । । विशेष विवरण अगले अध्यायमें है । कह सकते हैं, कि इन दो श्लोकोंमें अधिभूत । आदि शब्दोंसे आगेके अध्यायकी प्रस्तावनाही की गई है । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग-शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, ज्ञानविज्ञानयोग नामक सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।