श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय ७३५ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेव नुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सु र्लभः ॥ १९ ॥ मनमें रखनेवाले, और ४. ज्ञानी अर्थात् परमेश्वरका ज्ञान पाकर कृतार्थ हो जानेसे आगे कुछ प्राप्त न करना हो, तोभी निष्काम बुद्धिसे भक्ति करनेवाले । ( १७ ) इसमेंसे एक भक्ति अर्थात् अनन्यभावसे मेरी भक्ति करनेवाले और सदैव युक्त यानी निष्काम बुद्धिसे बर्तनेवाले ज्ञानीकी योग्यता विशेष है, ज्ञानीको मैं अत्यंत प्रिय हूँ, और ज्ञानी मुझे ( अत्यंत ) प्रिय है। ( १८ ) ये सभी भक्त उदार अर्थात् अच्छे हैं; पर मेरा मत है, कि ज्ञानी तो आत्माही है। क्योंकि, वह युक्तचित्त होकर ( सबकी ) उत्तमोत्तम गतिस्वरूप मुझमेंही ( उनमें ) ठहरा रहता है। ( १९ ) अनेक जन्मोंके अनन्तर यह अनुभव हो जानेसे कि जो कुछ है, वह सब वासुदेवही है, ज्ञानवान् मुझे पा लेता है। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है। | [क्षर-अक्षरकी दृष्टिसे भगवानने अपने स्वरूपका यह ज्ञान बतला दिया, | कि प्रकृति और पुरुष, दोनों मेरेही स्वरूप हैं, और चारों ओर मैंही एकतासे | भरा हूँ, इसके साथही भगवानने ऊपर जो यह बतलाया है, कि इस स्वरूपकी | भक्ति करनेसे परमेश्वरकी पहचान हो जाती है, उसके तात्पर्यको भली भाँति | स्मरण रखना चाहिये । उपासना सभीको चाहिये, फिरे चाहे व्यक्तकी करो, | चाहे अव्यक्तकी, परंतु इन दोनोंमें व्यक्तकी उपासना सुलभ होनेके कारण | यहाँ उसीका वर्णन है; और उसीका नाम भक्ति है। तथापि स्वार्थ-बुद्धिको | मनमें रखकर किसी विशेष हेतुके लिये परमेश्वरकी भक्ति करना निम्न- | श्रेणीकी भक्ति है और परमेश्वरका ज्ञान पानेके हेतुसे भक्ति करनेवालेकोभी | ( जिज्ञासु ) कच्चाही समझना चाहिये; क्योंकि उसकी जिज्ञासुत्व-अवस्थासेही | व्यक्त होता है, कि अभीतक उसको परिपूर्ण ज्ञान नहीं हुआ। तथापि | कहा है, कि ये सब भक्ति करनेवाले होनेके कारण सभी उदार अर्थात् | अच्छे मार्गसे जानेवाले हैं ( श्लो. १८ )। परंतु पहले तीन श्लोकोंका तात्पर्य | है, कि इसकेभी आगे जाकर अर्थात् ज्ञान-प्राप्तिसे कृतार्थ हो करके जिन्हें इस | जगतमें करने अथवा पानेके लिये कुछभी शेष नहीं रह जाता ( गीता ३. १७- | १९ ), ऐसे ज्ञानी पुरुष निष्कामबुद्धिसे जो भक्ति करते हैं ( भाग. १. ७. १० ) | वही सब श्रेष्ठ है। प्रल्हाद-नारद आदिकी भक्ति इसी श्रेष्ठ श्रेणीकी है, और