भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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७३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४ ॥ न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥ § § चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६ ॥ मोहित होकर यह सारा संसार, इनसे परेके (अर्थात् निर्गुण) मुझ अव्ययको (परमेश्वर) नहीं जानता। [मायाके संबंधमें गीतारहस्यके ९ वें प्रकरणमें यह जो सिद्धान्त है, कि माया अथवा अज्ञान त्रिगुणात्मक देहेंद्रियका धर्म है, न कि आत्माका, आत्मा तो ज्ञानमय और नित्य है, इंद्रियाँ उसको भ्रममें डालती हैं; वही अद्वैती सिद्धान्त ऊपरके श्लोकमें बतलाया है (गीता ७. २४; गीतार. प्र. ९, पृ. २३८-२४८)। (१४) मेरी यह गुणात्मक और दिव्य माया दुस्तर है। अतः इस मायाको वे पारकर जाते हैं, जो मेरीही शरणमें आते हैं। [ इससे प्रकट होता है, कि सांख्यशास्त्रकी त्रिगुणात्मक प्रकृतिकोही गीतामें भगवान् अपनी माया कहते हैं। महाभारतके नारायणीयोपाख्यानमें कहा है, कि नारदको विश्वरूप दिखलाकर अंतमें भगवान् बोले, कि :- माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद । सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैव त्वं ज्ञातुमर्हसि ॥ “हे नारद ! तुम जिसे देख रहे हो, वह मेरी उत्पन्न की हुई माया हैं। तू मुझे सब प्राणियोंके गुणोंसे युक्त मत समझ” (शां. ३३९. ४४)। वही सिद्धान्त अब यहाँभी बतलाया गया है। गीतारहस्यके ९ वें और १० वें प्रकरणमें बतला दिया है, कि माया क्या चीज है] (१५) मायाने जिनका ज्ञान नष्ट कर दिया है, ऐसे मूढ और दुष्कर्मी नराधम आसुरी बुद्धिमें पड़कर मेरी शरणमें नहीं आते। [ यह बतला दिया, कि मायामें डूबे रहनेवाले लोग परमेश्वरको भूल जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं। अब ऐसा न करनेवाले अर्थात् परमेश्वरकी शरणमें जाकर उसकी भक्ति करनेवाले लोगोंका वर्णन करते हैं।] (१६) हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! चार प्रकारके पुण्यात्मा लोग मेरी भक्ति किया करते हैं :- १. आर्त अर्थात् रोगसे पीडित, २. जिज्ञासु अर्थात् ज्ञान प्राप्त- कर लेनेकी इच्छा करनेवाले, ३. अर्थार्थी अर्थात् द्रव्य आदि काम्य वासनाओंको