श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय ७३३ बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥ बलं बलवतामस्मि कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥ ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥ § § त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥ योंकी जीवनशक्ति, और तपस्वियोंका तप मैं हूँ। (१०) हे पार्थ ! मुझको सब प्राणियोंका सनातन बीज समझ । बुद्धिमानोंकी बुद्धि और तेजस्वियोंका तेजभी मैं हूँ। (११) काम (वासना) और राग अर्थात् विषयासक्ति (इन दोनोंको) घटाकर बलवान् लोगोंका बल मैं हूँ; और हे भरतश्रेष्ठ ! प्राणियोंमें, धर्मके विरुद्ध न जानेवाला कामभी मैं हूँ। (१२) और यह समझ, कि जो जो कुछ सात्त्विक, राजस या तामस भाव अर्थात् पदार्थ हैं, वे सब मुझसेही हुए हैं। परंतु वे मुझमे हैं, मैं उनमें नहीं हूँ। | [ "वे मुझमें हैं, मैं उनमें नहीं हूँ इसका अर्थ बड़ाही गंभीर है।" पहला | अर्थात् प्रकट अर्थ यह है, कि सभी पदार्थ परमेश्वरसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये | मणियोंके धागेके समान इन पदार्थोंका गुणधर्मभी यद्यपि परमेश्वरही है, | तथापि परमेश्वरकी व्याप्ति इसीमें नहीं चुक जाती, और समझना चाहिये, कि | इनको व्याप्त कर इनके परेभी वही परमेश्वर है; और यही अर्थ आगे "इस | समस्त जगतको मैं एकांशसे व्याप्त कर रहा हूँ" (गीता १०.४२) इस श्लोकमें | वर्णित है। परंतु इसअर्थके अतिरिक्त दूसराभी अर्थ सदैव विवक्षित रहता है। | वह यह, कि त्रिगुणात्मक जगतका नानात्व यद्यपि मुझसे निर्माण हुआ दीख | पड़ता है, तथापि वह नानात्व मेरे निर्गुण स्वरूपमें नहीं रहता; और इस दूसरे | अर्थको मनमें रखकर "भूतभृत् न च भूतस्थः" (९.४, ५) इत्यादि परमे- | श्वरकी अलौकिक शक्तियोंके वर्णन किये गये हैं (गीता १३.१४-१६)। | इस प्रकार यदि परमेश्वरकी व्याप्ति समस्त जगतसेभी अधिक है, तो प्रकट है, | कि परमेश्वरके सच्चे स्वरूपको पहचाननेके लिये इस मायिक जगतसेभी परे | जाना चाहिये; और अब उसी अर्थको स्पष्टतया प्रतिपादन करते हैं :-] (१३) (सत्त्व, रज और तम इन) तीन गुणात्मक भावोंसे अर्थात् पदार्थोंसे