श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥ पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥ । हैं। इन तेईस तत्त्वोंमेंसे पाँच स्थूल भूत, दस इंद्रियाँ और मन, ये सोलह तत्त्व, । शेष सात तत्त्वोंसे निकले हुए अर्थात् उनके विकार हैं। अतएव यह विचार । करते समय कि 'मूल तत्त्व' कितने हैं, इन सोलह तत्त्वोंको छोड़ देते हैं; और । इन्हें छोड़ देनेसे बुद्धि (महान्), अहंकार और पंचतन्मात्राएँ (सूक्ष्म भूत) । मिलकर सातही मूल तत्त्व बचे रहते हैं। सांख्यशास्त्रमें इन्हीं सातोंको 'प्रकृति- । विकृतियाँ कहते हैं। ये सात प्रकृति-विकृतियाँ और मूल प्रकृति मिलकर । अब आठही प्रकारकी प्रकृति हुई; और महाभारत (शां. ३१०. १०-१५) में । इसीको अष्टधा प्रकृति कहा है। परंतु सात प्रकृति-विकृतियोंके साथही मूल । प्रकृतिकी गिनती कर लेना गीताको योग्य नहीं जँचा। क्योंकि ऐसा करनेसे । यह भेद नहीं दिखलाया जाता, कि एक मूल है और उसके सात विकार हैं। । इसीसे गीताके इस वर्गीकरणमें, कि सात प्रकृति-विकृतियाँ और मन मिलकर । अष्टधा मूल प्रकृति है, और महाभारतके वर्गीकरणमें थोड़ा भेद किया गया है । (गीतार. प्र. ८, पृ. १८४)। सारांश, यद्यपि गीताको सांख्यवालोंकी स्वतंत्र । प्रकृति स्वीकृत नही, तथापि स्मरण रहे, कि उसके अगले विस्तारका निरूपण । दोनोंने वस्तुतः समानही किया है। गीताके समान उपनिषद्में वर्णन है, कि । सामान्यतः परब्रह्मसे ही :- । एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ । इससे (पर पुरुष) प्राण, मन, सब इंद्रियाँ, आकाश, वायु, अग्नि, जल और । विश्वको धारण करनेवाली पृथ्वो - ये (सब) उत्पन्न होते हैं (मुंड. २. १. ३; । कै. १. १५; प्रश्न ६. ४)। अधिक जानना हो, तो गीतारहस्यका ८ वाँ प्रकरण । देखो। चौथे श्लोकमें कहा है, कि पृथ्वी, आप प्रभृति पंचतत्त्व मैंही हूँ; । और अब यह कहकर, कि इन तत्त्वोंमें जो गुण हैं, वेभी मैंही हूँ, ऊपरके इस । कथनकाही स्पष्टीकरण करते हैं, कि ये सब पदार्थ एकही धागेमें मणियोंके । समान पिरोये हुए हैं :-] (८) हे कौन्तेय ! जलमें रस मैं हूँ, चंद्र-सूर्यकी प्रभा मैं हूँ, सब वेदोंका प्रणव अर्थात् ॐकार मैं हूँ। आकाशमें शब्द मैं हूँ, और सब पुरुषोंका पौरुषभी मैं हूँ। (९) पृथ्वीमें पुण्यगंध अर्थात् सुगंधी, एवं अग्निका तेज मैं हूँ। सब प्राणि-