भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 776

सातवाँ अध्याय ७३१ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥ एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥ और अहंकार, इन आठ प्रकारोंमें मेरी प्रकृति विभाजित है। (५) यह अपरा अर्थात् निम्न श्रेणीकी (प्रकृति) है। हे महाबाहु अर्जुन ! यह जान कि इससे भिन्न, इसे जगतको धारण करनेवाली परा अर्थात् उच्च श्रेणीकी जीवस्वरूपी मेरी दूसरी प्रकृति है। (६) समझ रख, कि इन दोनोंसे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं। सारे जगतका प्रभव अर्थात् मूल और प्रलय अर्थात् अंत मैंही हूँ। (७) हे धनंजय ! मुझसे परे और कुछभी नहीं है। धागेमें पिरोयी हुई मणियोंके समान, मुझमें यह सब गुंथा हुआ है। [ इन चारों श्लोकोंमें सब क्षर-अक्षर-ज्ञानका सार आ गया है; और अगले श्लोकोंमें इसीका विस्तार किया है। सांख्यशास्त्रमें सब सृष्टिके अचेतन अर्थात् जड़ प्रकृति और सचेतन पुरुष, ये दो स्वतंत्र तत्त्व बतलाकर प्रतिपादन किया है, कि आगे इन दोनों तत्त्वोंसे सब पदार्थ उत्पन्न हुए, इन दोनोंसे परे तीसरा तत्त्व नहीं है। परंतु गीताको यह द्वैत मंजूर नहीं, अतः प्रकृति और पुरुषको एक-ही परमेश्वरकी दो विभूतियाँ मानकर, चौथे और पाँचवें श्लोकमें वर्णन किया है, कि उनमें जड़ प्रकृति निम्न श्रेणीकी विभूति है, और जीव अर्थात् पुरुष श्रेष्ठ श्रेणीकी विभूति है; और कहा है, कि इन दोनोंसे समस्त स्थावर- जंगम सृष्टि उत्पन्न होती है (गीता १३. २६) इनमेंसे जीवभूत श्रेष्ठ प्रकृतिका विस्तारसहित विचार क्षेत्रज्ञकी दृष्टिसे आगे तेहरवें अध्यायमें किया है। अब रह गई जड़ प्रकृति। सो गीताका सिद्धान्त है (गीता ९. १०), कि वह स्वतंत्र नहीं; परमेश्वरकी अध्यक्षतामें उससे समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि गीतामें प्रकृतिको स्वतंत्र नहीं माना है, तथापि सांख्य- शास्त्रमें प्रकृतिके जो भेद हैं, उन्हींको कुछ हेरफेरसे गीतामें ग्राह्य कर लिया है। (गीतार. प्र. ८, पृ. १८०-१८४) और परमेश्वरसे मायाके द्वारा जड़ प्रकृति उत्पन्न हो चुकनेपर (गीता. ७. १४) सांख्योंका किया हुआ यह वर्णन कि आगे प्रकृतिसे सब पदार्थ कैसे निर्मित हुए अर्थात् गुणोत्कर्षका तत्त्वभी गीताको मान्य है (गीतार. प्र. ९, पृ. २४४)। सांख्योंका कथन है, कि प्रकृति और पुरुष मिलकर कुल पच्चीस तत्त्व हैं। इनमेंसे प्रकृतिसेही तेईस तत्त्व उपजते