श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥ § § भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥ | परंतु ऊपरके कथनानुसार हमें ज्ञात होता है, कि परमेश्वरी ज्ञानकेही समष्टि- | रूप (ज्ञान) और व्यष्टिरूप (विज्ञान), ये दो भेद हैं, इस कारण | ज्ञानविज्ञान शब्दसेभी उन्हीका अभिप्राय है (गीता १३. ३०; १८. २०) । | दूसरे श्लोकके ये शब्द "फिर और कुछभी जाननेके लिये शेष नहीं रह जाता" | - उपनिषदके आधारसे लिये गये हैं। छांदोग्य उपनिषदमें श्वेतकेतुसे उसके | पिताने यह प्रश्न किया है, कि "येन...अविज्ञातं विज्ञातं भवति" - वह क्या | है, कि जिस एकके जान लेनेसे सब कुछ जान लिया जाता है? और फिर आगे | उसका इस प्रकार स्पष्टीकरण किया है। "यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं | विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्।" (छां. ६. | १. ४) । - हे तात! जिस प्रकार मिट्टीके एक गोलेके भीतरी भेदको जान | लेनेसे ज्ञात हो जाता है, कि शेष मिट्टीके पदार्थ उसी मृत्तिकाके विभिन्न | नामरूप धारण करनेवाले विकार हैं, और कुछ नहीं है; उसी प्रकार ब्रह्मको | जान लेनेसे दूसरा कुछभी जाननेके लिये नहीं रहता। मुंडक उपनिषदमेंभी | (मुं. १. १. ३) आरंभमेंही यह प्रश्न है, कि "कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं | विज्ञातं भवति" - किसका ज्ञान हो जानेसे अन्य सब वस्तुओंका ज्ञान हो जाता | है? इससे व्यक्त होता है, कि अद्वैत वेदान्तका यही तत्त्व यहांभी अभिप्रेत है, कि | एक परमेश्वरका ज्ञान-विज्ञान हो जानेसे इस जगतमें और कुछभी जाननेके लिये | नहीं रह जाता, क्योंकि जगतका मूल तत्त्व तो एक-ही है, नाम और रूपके | भेदसे वही सर्वत्र समाया हुआ है; । सिवा उसके और कोई दूसरी वस्तु दुनियामें | हैही नहीं, यदि ऐसा न हो तो दूसरे श्लोककी प्रतिज्ञा सार्थक नहीं होती ।] (३) हजारों मनुष्योंमें कोई एक-आधही सिद्धि पानेका यत्न करता है; और प्रयत्न करनेवाले इन (अनेक) सिद्ध पुरुषोंमेंसे एक-आधकोही मेरा सच्चा ज्ञान हो जाता है। | [ध्यान रहे, कि प्रयत्न करनेवालोंको यद्यपि यहाँ सिद्ध पुरुष कह दिया | है, तथापि परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपरही उन्हें सिद्धि प्राप्त होती है, अन्यथा | नहीं। इस परमेश्वर-ज्ञानके क्षर-अक्षर-विचार और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार ये जो | दोन भाग हैं, उनमेंसे क्षर-अक्षर-विचारका अब आरंभ करते हैं:-] (४) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश (ये पांच सूक्ष्म भूत), मन, बुद्धि