श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय ७२९ सप्तमोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥ ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥ जाता है, अतः केवल इंद्रियनिग्रह प्राप्त करा देनेवाले पातंजलयोग-मार्गकी अपेक्षा मोक्ष-धर्ममें ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्गकी योग्यताभी अधिक मानी जाती है। तोभी स्मरण रहे, कि यह सारा विवेचन कर्मयोग-मार्गके उपपादनका एक अंश है, वह स्वतंत्र नहीं है। अर्थात् गीताके पहले छः अध्यायोंमें कर्म, दूसरे षट्कमें भक्ति और तीसरी षडध्यायीमें ज्ञान, इस प्रकार गीताके जो तीन स्वतंत्र विभाग किये जाते हैं, वे तत्त्वतः ठीक नहीं हैं। इस विषयका प्रतिपादन गीतारहस्यके चौदहवें प्रकरणमें (पृ. ४५३-४५८) किया गया है। स्थूलमानसे देखनेसे ये तीनों विषय गीतामें आये हैं सही; परंतु वे स्वतंत्र नहीं हैं, किंतु कर्मयोगके रूपमेंही उनका विवेचन किया गया है, इसलिये यहाँ उसकी पुनरावृत्ति नहीं करते। अब देखना चाहिये, कि सातवें अध्यायका आरंभ भगवान् किस प्रकार करते हैं :-] श्रीभगवानने कहा :—( १ ) हे पार्थ ! मुझमें चित्त लगाकर, और मेराही आश्रय करके (कर्म-)योगका आचरण करते हुए तुझे जिस प्रकारसे या जिस विधिसे मेरा पूर्ण और संशयविहीन ज्ञान होगा, उसे सुन। ( २ ) विज्ञानसमेत इस पूरे ज्ञानको मैं तुझसे कहता हूँ कि जिसके जान लेनेसे इस लोकमें फिर और कुछभी जाननेके लिये शेष नहीं रह जाता । | [ पहले श्लोकके 'मेराही आश्रय करके' इन शब्दोंसे और विशेषकर | 'योग' शब्दसे प्रकट होता है, कि पहलेके अध्यायोंमें वर्णित कर्मयोगकी सिद्धिके | लियेही अगला ज्ञान-विज्ञान कहा है, स्वतंत्र रूपसे नहीं बतलाया है (गीतार. | प्र. १४, पृ. ४५६) । न केवल इसी श्लोकमें, प्रत्युत गीतामें अन्यत्रभी कर्म- | योगको लक्ष्यकर ये शब्द आये हैं—'मय्योगमाश्रितः' (गीता १२. ११), | 'मत्परः' (गीता १८. ५७; ११. ५५); अतः इस विषयमें कोई शंका नहीं | रहती, कि परमेश्वरका आश्रय करके जिस योगका आचरण करनेके लिये | गीता कहती है, वह पीछेके छः अध्यायोंमें प्रतिपादित कर्मयोगही है। कुछ | लोग विज्ञानका अर्थ अनुभविक ब्रह्मज्ञान अथवा ब्रह्मका साक्षात्कार करते हैं,