श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सातवाँ अध्याय [ पहले यह प्रतिपादन किया गया, कि कर्मयोग सांख्य-मार्गके समानही मोक्षप्रद है, परंतु स्वतंत्र है और उससे श्रेष्ठ है, और यदि इस मार्गका थोड़ाभी आचरण किया जाय, तो वह व्यर्थ नहीं जाता । अनंतर इस मार्गकी सिद्धिके लिये आवश्यक इंद्रियनिग्रह करनेकी रीतिका वर्णन किया गया है। किंतु इंद्रियनिग्रहसे मतलब निरी बाह्यक्रियासे है, और जिसके लिये इंद्रियोंकी यह कसरत करनी है, उसका अबतक विचार नहीं हुआ । तीसरेही अध्यायमें भगवाननेही अर्जुनको इंद्रियनिग्रहका यह प्रयोजन बतलाया है कि “ काम-क्रोध आदि शत्रु इंद्रियोंमें अपना घर बनाकर ज्ञान-विज्ञानका नाश करते हैं, इसलिये पहले तू इंद्रियनिग्रह करके इन शत्रुओंको मार डाल ” (गीता ३. ४०, ४१) । और पिछले अध्यायमेंभी योगयुक्त पुरुषका यों वर्णन किया है, कि इंद्रियनिग्रहके द्वारा ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त हुआ ” (गीता ६. ८) योगयुक्त पुरुष “ समस्त प्राणियोंमें परमेश्वरको और परमेश्वरमें समस्त प्राणियोंको देखता है ” (गीता ६. २९) । अतः जब इंद्रियनिग्रह करनेकी विधि बतला चुके, तब अब यह बतलाना आवश्यक हो गया, कि 'ज्ञान' और 'विज्ञान' किसे कहते हैं, और परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान होकर कर्मोंको न छोड़ते हुएभी कर्मयोग- मार्गकी किन विधियोंसे अंतमें निःसंदिग्ध मोक्ष मिलता है ? सातवें अध्यायसे लेकर सत्रहवें अध्यायके अंतपर्यंत ग्यारह अध्यायोंमें, इसी विषयका वर्णन है, और अंतके अर्थात् अठारहवें अध्यायमें सब कर्मयोगका उपसंहार किया गया है। सृष्टिके अनेक प्रकारके अनेक विनाशवान् पदार्थोंमें एकही अविनाशी परमेश्वर समा रहा है - इस समझका नाम है 'ज्ञान'; और एकही नित्य परमेश्वरसे विविध नाशवान् पदार्थोंकी उत्पत्तिको समझ लेना 'विज्ञान' कहलाता है” (गीता १३. ३०), एवं इसीको क्षर-अक्षरका विचार कहते हैं। परंतु इसके सिवा अपने शरीरमें अर्थात् क्षेत्रमें जिसे आत्मा कहते हैं, उसके सच्चे स्वरूपको जान लेनेसेभी परमेश्वरके स्वरूपका बोध हो जाता है। इस प्रकारके विचारको क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार कहते हैं। इ नमेसे क्षर-अक्षरके विचारका पहले वर्णन करके फिर तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विचारका वर्णन किया है। यद्यपि परमेश्वर एक है, तथापि उपासनाकी दृष्टिसे तो उसके दो भेद होते हैं। उसका अव्यक्त स्वरूप केवल बुद्धिसे ग्रहण करनेयोग्यहै, व्यक्त स्वरूप प्रत्यक्ष अवगम्य है। अतः इन दोनों मार्गों या विधियोंको इसी निरू- पणमें बतलाना पड़ा, कि बुद्धिसे परमेश्वरको कैसे पहचानें, और श्रद्धा या भक्तिसे व्यक्त स्वरूपकी उपासना करनेसे उसके द्वारा अव्यक्तका ज्ञान कैसे होता है ? तब इस समूचे विवेचनमें यदि ग्यारह अध्याय लग गये, तो कोई आश्चर्य नहीं है । इसके सिवा, इन दो मार्गोंसे परमेश्वरके ज्ञानके साथही इंद्रियनिग्रहभी आप-ही-आप हो